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भारतीय भैसों की प्रमुख नस्लें एवं जानकारी

भारतीय भैसों की प्रमुख नस्लें एवं जानकारी
Written by bheru lal gaderi

भैंस का उत्पत्ति स्थान भारत माना जाता हैं। आधुनिक भैंस का जन्म भारत में प्रारम्भिक ’अर्नी’ नाम की भैंस से हुआ है। भारत में दूधारू पशुओं में भैंस का प्रथम स्थान है। भैसों के दूध में सर्वाधिक मात्रा वसा की होती हैं। भारत के कई राज्यों में गायों की तुलना में भैंसे अधिक पाली जाती हैं। भारत में कुल दूध उत्पादन का 55 प्रतिशत दूध अर्थात 20 मिलियन टन दूध भैंस पालन से मिलता है।

भारत में भैसों की निम्न नस्लें पाई जाती हैं।

मुर्रा

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान पंजाब तथा हरियाणा हैं। मुर्रा नस्ल को भैंसों की प्रमुख नस्ल मानी जाती है। इसका रंग गहरा काला (jet black) होता हैं। सींग जलेबी आकर में मुड़े हुए होते हैं। इस नस्ल की भैसों के अयन सुविकसित तथा शरीर विशाल आकार का होता हैं। यह नस्ल विश्व की सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल मानी जाती हैं। हरियाणा में इसे काला सोना कहा जाता है । दूध में वसा उत्पादन के लिए मुर्रा सबसे अच्छी नस्ल मानी जाती है। इसके दूध में 7% वसा पाई जाती है। मुर्रा भैंस प्रतिदिन (सुबह-शाम) औसतन 8 से 18 लीटर दूध देता है। औसतन एक मुर्रा भैंस की कीमत करीब 60,000 से 90,000 तक होती है जिसमे भैंस की कीमत उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करती हैं। आमतौर पर मुर्रा भैंस 250 दिनों से 300 दिनों तक दूध देती है।

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मेहसाना

 

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान बड़ोदा गुजरात हैं। यह एक संकर नस्ल हैं जो मुर्रा x सुरती के क्रॉस से बनाई गई है। इस नस्ल का शरीर मध्यम आकार का कला या बादामी होता हैं। इस नस्ल की भैसें प्रतिदिन 5 – 8 लीटर तक दूध देती हैं। इस नस्ल की भैंस 1200 से 3500 लीटर दूध एक महीने में देती हैं। मेहसाना नस्ल की भैंस काले, भूरे और सलेटी रंग की होती है इसका शरीर मुर्रा भैसों की तुलना में बड़ा होता है, लेकिन वजन उससे कम होता है।  नर का वजन 560 किलोग्राम और मादा का वजन 480 किलोग्राम के आसपास होता है। सींग आमतौर पर दरांती से आकार के होते हैं और मुर्रा के सींगों से कम गुमे घूमे हुए होते हैं।

सुरति

 

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान बड़ोदा गुजरात हैं। यह एक छोटी नस्ल की भैंस है। इस नस्ल के सींग हसियाकर छोटे होते है। इसके शरीर का रंग हल्का काला होता हैं। इसका नुकीला धड़, लंबा सिर, बाहर की तरफ निकली आंखे होती हैं। इस नस्ल की भैसें एक ब्यात में औसतन 900-1300 लीटर दूध देती है तथा यह एक महीने में 1600 से 1800 लीटर दूध देती है। और इसके दूध में वसा की मात्रा 8-12 प्रतिशत होती है।

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भदावरी

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान आगरा उत्तर प्रदेश हैं। इसके शरीर का रंग तांबे जैसा होता हैं। इस नस्ल का आगे का भाग पतला एवं पीछे से छोड़ा होता हैं। इसका शारीरिक आकार मध्यम एवं  शरीर पर बाल कम होते हैं। सिंग तलवार के आकार के होते हैं। इस नस्ल की भैसें कठिन परिस्थितियों में रहने की क्षमता रखती हैं। यह नस्ल बीमारियों के प्रतिरोधी होती हैं। इस नस्ल के दूध में औसतन 8% वसा पाई जाती हैं। इस नस्ल की भैसों के दूध में सर्वाधिक वसा (13%) पाया जाता हैं।

जाफराबादी

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान काठियावाड़ गुजरात हैं। इसका शरीर लम्बा एवं ढीलाढाला होता हैं। इस नस्ल की भैंस को ‘मिनी एलिफेंट’ के नाम से भी जाना जाता हैं। इस नस्ल की भैसों में गलकंबल पाई जाती हैं। इसके सींग गर्दन के दोनों और निचे लटककर अंतिम सिरे से ऊपर की और मुड़े हुए होते हैं। इसका शरीर लंबा होता है। इस नस्ल के सिर और गर्दन का आकार बड़ा होता हैं। यह नस्ल भैसों की सबसे भारी नस्ल हैं। इनके माथे गुंबद के आकार के होते है जो कि देखने में बहुत ही आकर्षक लगते हैं। यह अच्छी दूध उत्पादक नस्ल है। जाफराबादी भैंस का रंग आमतौर पर काला होता है। इस नस्ल की भैसें प्रतिदिन 8-12 लीटर दूध देती हैं। इसका वार्षिक दुग्ध उत्पादन 3,000- 3,500 लीटर तक होता है। इस नस्ल के पशु अधिक दूध देने के लिए मशहूर है।

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नीली-रावी

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान फिरोजपुर पाकिस्तान हैं। इसका चेहरा आँखों की जगह से धसा रहता हैं। इसकी आँखें सफेद होती हैं जिन्हे ‘बॉल आइस’ कहा जाता हैं। इसके सिर के बिच व टांगों के निचले हिस्से एवं पुच्छ पर सफेद बालों का गुच्छा पाया जाता हैं। इस नस्ल का शरीर काला, माथा सफेद, बिल्ली जैसी आंखें मध्यम आकार की होती है और भारी सींग होते हैं। नर का औसतन वजन 600 किलो और मादा का औसतन वजन 450 किलो होता है।  इस नस्ल की भैसें एक ब्यांत में औसतन 1600-1800 लीटर दूध देती है और इसके दूध में वसा की मात्रा 7 प्रतिशत होती है। इस नस्ल का उपयोग, भारी सामान खींचने के लिए किया जाता है।

टोडा

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थल तामिलनाडू, आंध्रप्रदेश है। इस नस्ल का रंग हल्का या गहरे सलेटी रंग का शरीर, माथा चौड़ा, छोटा और चौड़ा मुंह, लंबे सींग, लंबी पूंछ और छोटी और मजबूत टांगे होती हैं। यह एक ब्यांत में औसतन 500 लीटर दूध देती है।

नागपुरी

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान महाराष्ट्र हैं। इसे इलिचपुरी या बरारी के नाम से भी जाना जाता है। इस नस्ल का रंग काला, पूंछ ,टांगों और मुंह पर सफेद धब्बे होते हैं। इसके लंबे, चपटे और मुड़े हुए सींग होते हैं, जो कि तलवार के आकार के होते हैं। लंबा और पतला मुंह और गर्दन कुछ लंबी होती है। इस नस्ल की भैसें एक ब्यांत में औसतन 700-1200 लीटर दूध देती है।

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