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भारतीय बकरियों की प्रमुख नस्लें एवं जानकारी

भारतीय बकरियों की प्रमुख नस्लें एवं जानकारी
Written by bheru lal gaderi

भारत में किसानी के साथ-साथ पशुधन आर्थिक सुदृढ़ता का परिचायक है। पशुधन (गाय, भैंस, भेड़, बकरी/बकरियों) भी देश की आर्थिक व्यवस्था का एक घटक है। किसानों की आजीविका इन्हीं दोनों के आस-पास घूमती है। खेती कम होने की दशा में किसानों की आजीविका का मुख्य साधन पशुपालन हो जाता है। वर्तमान परिपेक्ष्य में बदलती जलवायु वातावरण पशुपालन के लिए ज्वलंत मुद्दा है इसमें सुधार तभी संभव है जब परिवर्तनों से प्रभावित उत्पादन की दशा एवं दिशा का पूर्ण ज्ञान हो पशुधन की वंशावली उनका दूध, मांस उत्पादन जनन एवं प्रजनन क्षमता होने वाली बीमारियों आदि का लेखा-जोखा रखा जाना जरूरी हैं।

भारतीय बकरियों की प्रमुख नस्लें एवं जानकारी

गरीब की गाय के नाम से मशहूर बकरी हमेशा ही आजीविका के सुरक्षित स्रोत के रूप में पहचानी जाती है। बकरी छोटा पशु होने के कारण इसके रख-रखाव का खर्च भी कम होता है। सूखा पड़ने पर इसके आहार का प्रबंधन करना भी आसान होता हैं, इसके रख-रखाव का कार्य बच्चे एवं महिलाएं भी कर सकते हैं। राजस्थान में संपूर्ण भारत की लगभग 28 प्रतिशत बकरियां पाई जाती है।

भारत में बकरियों की निम्न नस्लें पाई जाती है।

जमुनापारी   

इस नस्ल की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश का इटावा जिला है। यह एक प्रियोजनीय नस्ल हैं यह बकरियों की सबसे छोटी नस्ल है। इसके लंबे कान घड़ी के पेंडुलम की तरह लटके हुए रहते हैं। गोमन नाक एवं तोते जैसा मुंह एवं पिछली टांगों पर सघन बाल इस नस्ल की प्रमुख विशेषता हैं। इस नस्ल की बकरिया अन्य नस्ल की बकरियों की तुलना में अच्छा दूध देती हैं। इस नस्ल की बकरी वर्ष में एक ही बार प्रजनन देती हैं। सींग छोटे एवं चौड़े होते है। वयस्क नर का औसत वजन 70-90 किलो ग्राम तथा मादा का वजन 50-60 किलो ग्राम होता है। इस जाति की बकरियाँ मुख्य रूप से झाड़ियाँ एवं वृक्ष के पत्तों पर निर्भर रहती है।

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बारबरी

इस नस्ल की उत्पत्ति सोमालिया क्षेत्र माना जाता है। यह उत्तर प्रदेश के आगरा, मथुरा एवं इससे लगे क्षेत्रों में काफी संख्या में उपलब्ध है।यह एक दूध प्रयोजनीय हैं एवं शहरों में पालने हेतु उपयुक्त नस्ल हैं। यह कद में छोटी होती है परन्तु इसका शरीर काफी गठीला होता है। शरीर पर छोटे-छोटे बाल पाये जाते हैं। शरीर पर काले धब्बे पाए जाते है। इसके कान बहुत ही छोटे होते है। थन अच्छे विकसित होते है। वयस्क नर का औसत वजन 35-40 किलो ग्राम तथा मादा का वजन 25-30 किलो ग्राम होता है।

यह घर में बांध कर गाय की तरह रखी जा सकती है। इसकी प्रजनन क्षमता भी काफी अच्छी होती है। यह 2 वर्ष में तीन बार बच्चों को जन्म देती है तथा एक ब्यात में औसतन 2 बच्चों को जन्म देती है। इस नस्ल की बकरियाँ मांस तथा दूध उत्पादन हेतु उपयुक्त है। बकरियाँ औसतन 1.0 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है।

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बीटल

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान पंजाब का गुरदासपुर जिला हैं। पंजाब से लगे पाकिस्तान के क्षेत्रों में भी इस नस्ल की बकरियाँ बाई जाती है। इसके शरीर का रंग होता हैं जिस पर सफेद धब्बे या काले रंग पर सफेद धब्बे पाए जाते है। इस नस्ल की बकरिया देखने में जमुनापारी जैसी लगती है परन्तु ऊँचाई एवं वजन की तुलना में जमुनापारी से छोटी होती है। इस नस्ल के कान लम्बे, चौड़े तथा लटकते हुआ होते है। नाक उभरा हुआ होता है। कान की लम्बाई एवं नाक का उभरापन जमुनापारी की तुलना में कम होता है। सींग बाहर एवं पीछे की ओर घूमे हुए होते है।

वयस्क मादा का वजन 45-55 किलोग्राम तथा नर का वजन 55-65 किलोग्राम होता है। इसका शरीर गठीला होता है। जाँघ के पिछले भाग में कम घने बाल होते है। इस नस्ल की बकरियाँ औसतन 1.25-2.0 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है। इस नस्ल की बकरियाँ सलाना दो बच्चे पैदा करती है। इस नस्ल की बकरिया सभी प्रकार की जलवायु हेतु उपयुक्त होती है। इसके नर में दाढ़ी पाई जाती हैं।

सिरोही

इस नस्ल का उतपत्ति स्थान राजस्थान का सिरोही जिला है। यह बकरिया राजस्थान में मुख्यतः उदयपुर, सिरोही एवं डूंगरपुर जिलों में पाई जाती हैं। यह एक द्विपरियोजनीय नस्ल हैं। इस नस्ल की बकरियां गुजरात एवं राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी पाई जाती है। इस नस्ल की बकरियाँ दूध एवं मांस उत्पादन के लिए पाली जाती है। इसका शरीर गठीला एवं रंग सफेद एवं भूरा होता है। इसका नाक छोटा परन्तु उभरा रहता है। कान लम्बे होते है। पूंछ मुड़ी हुई होती है। इस नस्ल की बकरियों को बिना चराये भी पाला जा सकता है।

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ब्लैक बंगाल

इस नस्ल का उतपत्ति स्थान पश्चिम बंगाल हैं। यह बकरिया असम, उत्तरी उड़ीसा, बंगाल एवं झारखण्ड में पायी जाती है। इसके शरीर का काला, भूरा तथा सफेद रंग के रोए होते है। अधिकांश बकरियों में काले रोए होता है। यह छोटे कद की होती है वयस्क नर का वजन करीब 18-20 किलोग्राम तथा मादा का वजन 15-18 किलोग्राम होता है। इसमें 3-4 इंच का आगे की ओर सीधे निकले हुए सींग पाए जाते है। इसका शरीर गठीला होने के साथ आगे से पीछे की ओर ज्यादा चौड़ा तथा बीच में अधिक मोटा होता है। इसके कान छोटे एवं आगे की और निकले हुए होते हैं।

इस नस्ल की प्रजनन क्षमता काफी अच्छी है। यह एक ब्यात में 2-3 बच्चों को जन्म देती है। कुछ बकरियाँ एक वर्ष में दो बार बच्चे पैदा करती है तथा एक बार में 4-4 बच्चे देती है। इस नस्ल की मेमना 8-10 माह की उम्र में वयस्कता प्राप्त कर लेती है। प्रजनन क्षमता काफी अच्छी होने के कारण इसकी आबादी में वृद्धि दर अन्य नस्लों की तुलना में अधिक है। इस नस्ल की बकरियाँ मांस उत्पादन हेतु बहुत उपयोगी है। परन्तु इस नस्ल की बकरियाँ बहुत कम मात्रा में दूध देती है।

मारवाड़ी

इस नस्ल का उतपत्ति स्थान मारवाड़ राजस्थान हैं। मारवाड़ी नस्ल की बकरी गर्म जगह में रहती है और यह काले रंग की होती है।  इस नस्ल का दूध और मांस का उत्पादन औसत होता है और यह बकरियां एक माह में ही बड़ी हो जाती हैं और इस नस्ल की बकरियां डेढ़ साल की उम्र में पहला बच्चा देती हैं। इनके ब्यात अवधि छह से आठ माह का होता है। मारवाड़ी नस्ल की व्यस्क बकरी का वजन 30- 35 किलोग्राम होता है, जबकि बकरे का वजन 40- 45 किलोग्राम होता है।

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