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भारतीय गाय की प्रमुख नस्ले एवं विवरण

Written by bheru lal gaderi

दूध उत्पादन किसानों की आर्थिक सुदृढ़ता का परिचायक

भारत में किसानी के साथ-साथ पशुधन आर्थिक सुदृढ़ता का परिचायक है। पशुधन (गाय, भैंस, भेड़, बकरी) भी देश की आर्थिक व्यवस्था का एक घटक है। देश में श्वेत क्रांति के आगाज के साथ अब पशुधन के लिए अनुवांशिक संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन संरक्षण जरूरी हैं। वर्तमान परिपेक्ष्य में बदलती जलवायु वातावरण पशुपालन के लिए ज्वलंत मुद्दा है इसमें सुधार तभी संभव है जब परिवर्तनों से प्रभावित उत्पादन की दशा एवं दिशा का पूर्ण ज्ञान हो पशुधन की वंशावली उनका दूध मांस उत्पादन जनन एवं प्रजनन क्षमता होने वाली बीमारियों आदि का लेखा-जोखा रखा जाना जरूरी हैं।

वर्तमान में अमेरिका, यूरोप एवं ऑस्ट्रेलिया में पशुधन की बहुत सारी प्रजातियों के पहचान नंबर, उनकी गुणवत्ता, उत्पादन क्षमता एवं अनुवांशिकी संरचना पर आंकड़े उपलब्ध हैं इन आंकड़ों पर प्रतिदिन अध्ययन करके आधुनिक बनाया जाता है, जिससे अधिक से अधिक दूध का उत्पादन किया जा सके। भारत में इस तरह की व्यवस्था व प्रबंधन बहुत जरूरी है। इससे ना केवल देश में गोवंश से अधिक दूध उत्पादन किया जा सकता है, बल्कि उचित प्रबंधन कर किसानों की आय भी बढ़ाई जा सकती है, जिससे भविष्य में गोवंश के संरक्षण में सहायता मिलेगी। साथ ही देश में दूध की आपूर्ति वांछित मांग के अनुरूप हो सकेगी।

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हमारे देश के राज्यों में विभिन्न गोवंश की प्रजातियों में प्रमुख रूप से अधिक दूध उत्पादन की कुछ नस्लों का परिचय दिया जा रहा है।

राठी गाय

गाय

 राठी गाय की नस्लें राजस्थान के पश्चिमी भाग में पैदा होने वाली एक बहुत दूध देने वाली नस्ल है। यह नस्ल थार मरुस्थल बीकानेर, जैसलमेर, श्री गंगानगर जिले हैं। इसमें राठ क्षेत्र में धूसर सफेद (ग्रे व्हाइट) रंग की होती है। राठी नस्ल साहिवाल, लाल सिंधी, थारपारकर एवं धानी नस्ल का संकरण है। राठी मध्यम आकार की सुगठित नस्ल है। यह भूरे रंग के साथ सफेद चकत्ते पूरे शरीर पर पाए जाते हैं। शरीर का निचला हिस्सा सामान्यतया हल्के रंग का होता है। चेहरा चौड़ा तस्करी जैसा होता है।

सींग छोटे तथा मध्यम आकार के जो कि बाहर की ओर मुड़े, ऊँचे और अंदर की ओर होते हैं। कान मध्यम आकार के तथा गल कंबल बहुत भारी होता है। थूथन तथा खुर काले होते हैं। भोहे भूरी या काली होती है। नाभी प्रालम्ब बड़ा होता है। कूबड़ नर पशु में बड़ा होता हैं। सीथ लटकी हुई होती है। पूंछ लंबी, पतली, पूंछ गुच्छा काला तथा पूछ घुटने के नीचे तक लटकती रहती है। अयन बहुत अच्छी तरह विकसित होता है। दुग्ध शिराएं सुस्पष्ट होती है। गए बहुत धीमी एवं सीधी एवं औसतन दूध देने वाली होती है। राठी गाय के प्राकृतिक गुण व दुग्ध उत्पादन निम्न प्रकार हैं।

प्रथम ब्यात का समय-141(1104-1581) दिन, दूध उत्पादन-1560(1062-280) किलो, दूध काल-336 (306-431) दिन, शुष्क काल-181 (132-234) दिन, सेवा काल-205 (168-208) दिन, दो ब्यात का अंतर-519 (449-617) दिन, वसा प्रतिशत-3.7 (3-4) प्रतिशत होता है।

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नागौरी गाय 

गाय 

यह एक महत्वपूर्ण प्रसिद्ध भारवाहक गो नस्ल है। यह राजस्थान के नागौर, जोधपुर, बीकानेर जिले में पाई जाती है। नर बछड़े 6 माह में बधिया कर दिए जाते हैं। नागौरी पशु सीधे खड़े होने वाले चैतन्य पशु है। सफेद या हल्के धूसर रंग के पाए जाते हैं। कुछ पशुओं में सिर, चेहरे तथा कंधों कर रंग धूसर पाया जाता है। त्वचा काली तथा ललाट सीधा होता है। चेहरा लंबा, पलकें भारी तथा नीचे की और लटकी हुई होती है। आंखें छोटी, साफ तथा चमकीली पाई जाती है। कान मध्यम आकार के अंदर की तरफ गुलाबी रंग के होते हैं।

सींग मध्यम आकार के पोल से बाहर की ओर निकले रहते हैं जो कि ऊपर की ओर घूमे तथा घुमावदार होते हैं। कंधे के ब्लेड भरे हुए होते हैं। कूबड़ सुविकसित, पीठ सीधी, टांगे लंबी, सीधी एवं खुद छोटे मजबूत एवं गठा होता है। नाभि प्रलम्ब बहुत छोटा तथा ऊपर की ओर शरीर से चिपका/कसा हुआ होता है। पूछ मध्यम आकार की तथा पूछ गुच्छा काला होता है। इस गाय के अयन छोटा एवं उथला होता है। बेल बहुत ताकतवर होते हैं। नागोरी एक भारवाहक नस्ल है जिसके बेल भार ढोने के काम आते हैं। नागोरी गाय के प्राकृतिक गुण व दूध उत्पादन निम्न प्रकार हैं:

प्रथम ब्यात का समय-1440 (1287-1505) दिन, दूध उत्पादन-603 (479-905) किलो, दूध काल-267 (237-299) दिन, शुष्क काल-82-155 दिन, सेवा काल-172 (121-203) दिन, दो ब्यात का अंतर-461 (423-549) दिन होता है।

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मेवाती (कोसी) गाय 

गाय 

अलवर, भरतपुर, राजस्थान, मथुरा, कोसी यू.पी. फरीदाबाद, गुड़गांव- हरियाणा में पाई जाती है। यह नस्ल हरियाणा से मिलती जुलती है। इसमें गिर, कांकरेज एवं मालवीय के गुणों का प्रभाव देखा जा सकता है। यह एक सफेद रंग की नस्ल हैं। कंधे, गर्दन एवं क्वाटर्स का रंग गहरा होता है। चेहरा लम्बा सकरा जिसमे ललाट थोड़ा सा उभरा होता हैं। सींग बड़ी पोल के बाहरी तरफ से निकलते हैं जो पीछे मुड़कर नुकीले होते हैं। आंखें बड़ी तथा काले घेरे से घिरी रहती है। थूथन काला,छोड़ा और चौकोर होता है। कण लटकते हुए पर बहुत बड़े नहीं होते हैं। गलकंबल लटकता हुआ पर अधिक लचीला नहीं होता है। सीथ ढीली पर ढुलती हुई नहीं रहती है। पूंछ लंबी, पूंछ गुच्छ जमीन को छूती हुई होती है। सुविकसित होता है।

मेवाती शक्तिशाली एवं सीधे पशु है। भारी हल, बैलगाड़ी तथा गहरे कुएं से पानी खींचने के काम में बहुत उपयोगी है।

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मालवी गाय 

गाय 

इस नस्ल का “मालवी” नाम मालवा भूभाग के नाम पर पड़ा है, जिसे मालवा राजाओं के कुल के नाम पर मालवा कहा जाता है। भौगोलिक रूप से मालवा भू भाग में मध्यप्रदेश और राजस्थान का कुछ भाग सम्मिलित हैं। इस नस्ल का मूल आवास क्षेत्र प्रमुखतः मध्यप्रदेश में हैं। मालवी नस्ल के पशु मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले की तहसील आगर, उज्जैन जिले की तहसील महिदपुर और तराना, रतलाम जिले की तहसील आलोट और राजस्थान में झालावाड़ जिले की तहसील गंगधार और पिंडवाड़ा के आसपास पाए जाते हैं।

प्रमुख क्षेत्र

यह नस्ल विशेष रूप से संपूर्ण मालवा भूभाग में फैली हुई है। इस मालवा प्रदेश में मध्यप्रदेश के इंदौर, देवास, उज्जैन, शाजापुर, राजगढ़ गुना मंदसौर रतलाम भोपाल सीहोर रायसेन नामक जिले और धारा शिवपुरी का कुछ भाग तथा राजस्थान के झालावाड़ से कोटा जिले सम्मिलित है।

सामान्यता निम्नलिखित दो प्रकार की मालवी नस्ल पाई जाती है।

आगर किस्म

मंदसौर या भोपाल किस्म

आगर किस्म

अपेक्षाकृत बड़े आकार की होती हैं और इसके पशु मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले में आगर के निकटवर्ती स्थान तथा राजस्थान के झालावाड़ जिले में पाए जाते हैं।

मंदसौर या भोपाल किस्म

यह किस्म अपेक्षाकृत छोटी होती है और मंदसौर या भोपाल जिले में पाई जाती है।

मालवी नस्ल की विशेषताएं

मालवी नस्ल भार वाहन क्षमता के कारण विख्यात है। बेल सक्रिय और मजबूत होते हैं, और हल चलाने, भरी बोझ वाली गाड़ी को खींचने के लिए बहुत अच्छे सिद्ध होते हैं। गाय कम दूध देती है किंतु अच्छी तरह से अनुरक्षित युथों में गाय का प्रति दुग्धस्त्रवण काल में 910-1 से 225 किलोग्राम दूध देती है। पहली बार ब्याते समय 3-3.5 किग्रा. दूध देती है और इसके बाद 18 महीने के अंतर से ब्याती है।

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शारीरिक गठन

मालवी मध्यम आकर का, शक्तिशाली और हष्ट-पुष्ट पशु है। देह सुगठित सुडोल होती हैं। स्थूल नहीं होती हैं और पाद उचित अनुपात में होते हैं। यह पशु देखने में सुंदर और समझदार लगते हैं। सांड की चाल गर्वीली होती हैं। देह का रंग सफेद से लेकर हल्का धूसर  होता है। लौह धूसर रंग भी पाया जाता है। गाय और बैल सांडों की अपेक्षा हल्के रंग के होते हैं।

इस नस्ल को धूसर रंग की अन्य नस्लों से अलग करने वाले शरीर की बनावट संबंधी सभी लक्षणों में छोटा सिर चौड़ा और तश्तरीनुमा ललाट, सुद्रढ़ छोड़ा मोटा और उठा हुआ थूथन, छोटे नुकीले कान और मध्यम आकार के पार्श्व की ओर, ऊपर की तथा आगे की ओर बढ़े हुए सींघ आते हैं। मालवी नस्ल के पशु सीधे होते हैं। शीर्ष रेखा छोटी होती है। प्ररूपी पशुओं में चाँद होता है। यधपि यह बहुत स्पष्ट नहीं होती। यह नर पुरुषों की अपेक्षा मादाओं में अपेक्षाकृत अधिक होती हैं।

चेहरा सुड़ौल होता है और उसके अंतिम सिरे पर उठा हुआ और प्रायः काला थूथन होता है। आंखे एक दूसरे से काफी दूर होती हैं। वह स्पष्ट होती है। जिससे पशु चुस्त दिखाई देते है। आंखों के चारों ओर काले घेरे होते हैं। कान चौकन्ने  और छोटे आकार के होते हैं। सिंघ मध्यम आकार के पार्श्व की ओर उपर व आगे की ओर मोटे तथा नोक रहित सिरे एक शुण्डाकार होते हैं।

गर्दन छोटी, मोटी और मजबूत होती हैं। गलकंबल प्रायः पतला होता है और लटकता हुआ नहीं होता है। वक्ष सुविकसित गहरा और चौड़ा होता है। टांगें छोटी सीधी मजबूत और पेशीय होती हैं। पिंडलियां सीधी और अच्छी हड्डियों वाली होती है।

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टखना संधियां मध्यम और मजबूत होती हैं। गुमची सुव्यवस्थित होती हैं। खुर कड़े और काले होते हैं। उंगलियां सुस्थित होती हैं। धड़ छोटा गहरा और चौड़ा होता है, जिससे पशु की आकृति वर्गाकार सी मालूम पड़ती है। पीठ सुदृढ़ सीधी और वक्रता में कूबड़ से मिली हुई होती है।

कूबड़ मध्यम आकार का और सीधा होता है। झुके हुए कूबड़ को पसंद नहीं किया जाता है। पसलियां मजबूत और काफी उठी हुई होती है। नाभि-प्रलम्ब छोटा होता है। मुतन छोटा और कसा हुआ होता है। पूंछ मध्यम लंबी, देह में सुस्थित होती है और इसके अंतिम सिरे पर टखने तक लटकता हुआ काले बालों वाला गुच्छा होता है।

त्वचा मुतान और गुदा की त्वचा रंगहीन होती हैं। बाल छोटे और बारीक होते हैं। शुक्ति- चंचुगर्त, विस्तृत और सुस्पष्ट नहीं होता है। अयन छोटा होता है। थन छोटे और बराबर दूरी पर स्थित होते हैं। दुग्ध शिराओं सुस्पष्ट नहीं होती हैं।

प्राकृतिक गुण एवं दुग्ध उत्पादन :-

इस वंश के प्राकृतिक गुण एवं दुग्ध उत्पादन निम्न प्रकार है।

प्रथम ब्यात का समय-1430(1175-2010) दिन, दुग्ध उत्पादन-1075 किलो(625-1230), दुग्ध काल-306 दिन, ब्यात का अंतर-420 दिन।

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निमाड़ी गाय 

गाय 

निमाड़ी नस्ल का मूल आवास क्षेत्र मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी का भूभाग है। इसमें हरसूद, खंडवा के तालुके और पूर्वी निमाड़ जिले के (खंडवा) एवं बुरहानपुर तथा धार और पश्चिमी निमाड़ (खरगोन) जिलों के कुछ भाग सम्मिलित हैं। इस नस्ल को खरगोनी नस्ल भी कहा जाता है। इन पशुओं का निमाड़ी क्षेत्र में भारवाड़ तथा अहीर अर्ध घुमंतू व्यवसायी परिजनकों द्वारा प्रजनन किया जाता है। अभिजात युथों का अनुरक्षण महाराष्ट्र राज्य में गीलीगांव गोपशु प्रजनन फार्म पिपली (जिला-जलगांव), गंगापुरी गोपशु प्रजनन फार्म जामनगर (जिला-जलगांव) तथा शाहदा तालुका जिला धुलिया के तिलवाड़ा फार्म में किया गया है।

इस नस्ल को मोटे तौर पर दो विभेदों में विभाजित किया जा सकता है। क्षेत्र के पश्चिमी भागों में गौ पशु कुछ-कुछ भारी और ढीली त्वचा वाले होते हैं। यह सोनिया कबरे (सफेद चित्तियों सहित लाल रंग की देह) रंग के होते हैं। उनकी दूध देने की क्षमता अपेक्षाकृत अधिक होती हैं। इस नस्ल का दूसरा विभेद आवास क्षेत्र के पूर्वी भाग में पाया जाता है। इस विभेद के को पशु पूरी तरह से लाल से चित्तीदार लाल रंग तक भिन्न-भिन्न रंग के होते हैं। यह हल्के रंग के और हल्की त्वचा वाले होते हैं यह भार वाहन के लिए उपयोगी होते हैं। निमाड़ी बेल अच्छे भारवाही पशु होते हैं।

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दूध उत्पादन

यह गाय प्रायः चार – साढ़े चार वर्ष की आयु में ब्याती है। एक दुग्धस्त्रवण  काल में दूध का उत्पादन कम होता है। यह उत्पादन 270 से 410 किलोग्राम परिसर में होता है। किंतु गीलीगांव के पशु प्रजनन फार्म पिपली में इस नस्ल के पशुओं ने अपने गोवत्सों को दूध पिलाने के बाद एक दुग्ध स्त्रवण काल में औसत 910 किलोग्राम दूध तक दिया है। इस नस्ल की गाय 16 महीने के अंतराल से ब्याती है।

शारीरिक गठन

निमाड़ी गोपशु दिखने में गठीले होते हैं। वह मध्यम आकार के होते हैं और उनकी हड्डी सुडोल होती है। प्रारूपी वयस्क नर पशु की ऊंचाई कूबड़ के पीछे 122 से 130 सेंटीमीटर और देह भार 386 से 523 किलोग्राम होता है। जबकि मादा पशुओं की ऊंचाई 109 से 137 सेंटीमीटर और देह भार औसतन 282 किलोग्राम होता है। यह पशु हुष्ट-पुष्ट ओजस्वी होते हैं और अजनबी को देखकर उत्तेजित और अधीर हो जाते हैं।

निमाड़ी नस्ल के गोपशु सामान्य रूप से लाल रंग के होते हैं और इनके देह के विभिन्न भागों पर सफेद रंग के धब्बे होते हैं। कुछ पशुओं का रंग पूर्ण लाल से लेकर सफेद धब्बेदार लाल तक भिन्न-भिन्न होता है। जिसकी अधिकतम सीमा 50% तक बढ़ सकती है। सिर मध्यम आकार का सुडौल और सामान्य रूप से कुछ लंबा होता है। ललाट कुछ-कुछ उभरा हुआ होता है। निंबोरी या चाँद अनेक पशुओं में सुस्पष्ट होती हैं।

चेहरा थोड़ा लंबा होता है। थूथन काली आभा लिए हुए गुलाबी सफेद होता है। आंखें चमकीली और गुलाबी रंग की होती हैं। वे कुछ धसी हुई लगती हैं। बरोनिया हल्की लाल होती है। पूर्णत व्यस्त पशुओं में पलकों के ऊपर त्वचा की स्पष्ट सलवटें होती हैं। कान मध्यम आकार के और समानुपात में चौड़े होते हैं। उनके अंदर की त्वचा गुलाबी रंग की होती है।

सींगों की संरचना में काफी विभिन्नता होती है।  सींग पतले मध्यम आकार के होते हैं। अधिकांश पशुओं में भी ऊपर की ओर होते हैं। कुछ पशुओं में नीचे की ओर बढ़ कर पीछे की ओर मुड़ जाते हैं। सींगों का रंग हल्का गुलाबी से लेकर हल्के नीले तक अलग-अलग होता हैं।

उन पर गहरे रंग की धारियां होती हैं। गर्दन मध्यम आकार की और पतली होती हैं। सांडों में मोटाई और कूबड़ के विकास का कारण छोटी लगती है। गलकंबल पतला होता है और उत्तम सलवटों के रूप में में अधिक अच्छी तरह लटका होता है।

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गिर गाय 

गाय 

गिर नस्ल का मूल आवास क्षेत्र काठियावाड़ (गुजरात) के दक्षिण में गिर पहाड़ियां और जंगल है। इस नस्ल के गौ पशु प्रमुखतः गुजरात राज्य के जूनागढ़, भावनगर और अमरेली जिलो में पाए जाते हैं। मिश्रित नस्ल के रूप में इस नस्ल के गौपशु राजस्थान के एक बड़े भाग में, महाराष्ट्र के उत्तरी और महाराष्ट्र के उत्तरी और उत्तरी गुजरात के कच्छ तक के बहुत बड़े क्षेत्र में देखे जा सकते हैं। गिर को मुंबई की निकटवर्ती कुछ गौशालाओं में पाला जा रहा है।

गिर-नस्ल के बैल भारी शक्तिशाली भारवाही पशु है और वे मंदगति से कार्य करते हैं। इस नस्ल की गाय अच्छी दूध देने वाली होती है। 325 दिन के दूध स्त्रवण काल में 3182 कि.ग्रा। दूध प्राप्त हुआ है। दूध का अधिकतम उत्पादन 26.8 किलोग्राम में 4.5 प्रतिशत वसा पाई गई है। प्रथम ब्यात के समय औसतन 51 महीने और उसके बाद 14 से 16 महीने के अंदर से ब्याती है। गिर-नस्ल के सांडो को पश्चिमी भारत में स्थानीय गौ पशुओं की उच्च कोटि-निर्धारण के लिए प्रयुक्त किया जा चुका है।गिर नस्ल ने मेवाती, देवनी और निमाड़ी की तरह कि बहुत से अन्य नस्लों के विकास में योगदान दिया है।

गीर देखने में अत्यधिक आकर्षक लगती है। पशु मध्यम आकार के सुडोल, सुस्पष्ट रूपरेखा वाले व हष्ट-पुष्ट होते हैं। वयस्क मादा पशु का देह भार 386 कि.ग्रा. तथा नर पशु का 546 कि.ग्रा. होता है। विशिष्ट पशु का आकार भव्य और मुखाकृति सुंदर होती है। उसकी चाल सहज और गर्वीली तथा स्वभाव सीधा होता है। गिर गोवंश के प्राकृतिक गुण व दूध उत्पादन निम्न प्रकार हैं।

दूध उत्पादन 3182 किलो, दूध का 325 दिन, वसा प्रतिशत 45%, दो ब्यात का अंतर 14 से 16 महीने।

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कंगामय गाय 

गाय 

कंगामय नस्ल का मूल आवास तमिलनाडु राज्य के कोयंबटूर जिले के दक्षिणी और दक्षिणी पूर्वी भूभाग हैं,जिसमे जिसमें धारापुरम, उदामालपेट, पेल्लीदाम, पोल्लाची और इरोद ताल्लुका सम्मिलित है। अनेक वर्षों से पालायाकोट्टाई का पट्टागर क्षेत्र इस नस्ल का सबसे बड़ा प्रजनन क्षेत्र रहा है जहां नस्ल के पशुओं का शुद्धतम रूप मिलता है और समेल जिले में पशुधन अनुसंधान केंद्र, होसूर में भी देखे जा सकते हैं।

कंगायम नस्ल के बैल मध्यम आकार के तथा शक्तिशाली भारवाहक होते हैं, और तेजी से कार्य करने के लिए प्रसिद्ध है। गाय कम दूध देने वाली होती है और वे एक दुग्ध स्रवण काल में औसतन 682 किग्रा दूध देती है। इनकी दुग्ध स्रवण अवधि औसतन 289 दिन होती हैं। सर्वप्रथम औसतन 39 महीने की आयु में और उसके बाद 15 महीने के अंतर में ब्याते आते हैं।

शारीरिक गठन

कंगायम मध्यम आकार का पशु है, यद्यपि कभी-कभी बड़े आकार के पशु देखे गए हैं। सांड का देहभार 470 से 546 किग्रा तथा वयस्क गाय का 318 से 384 किग्रा होता है। यह शुद्ध रूप से भारवाही नस्ल हैं। पशु देखने में चुस्त सक्रिय और फुर्तीले लगते हैं। इसकी देह गठी हुई और सुदृढ़ होती है। बैल अत्यधिक हष्ट-पुष्ट और सक्रिय होते हैं। सांड का रंग धूसर होता है तथा सिर, गर्दन कूबड़, कंधे और धड पर गहरे धूसर होता है तथा सिर, गर्दन, कूबड़, कंधे और धड पर गहरे धूसर या काले निशान होते हैं। गाय सफेद रंग की होती है और उसकी सभी चारों टांगों पर टखनों के बिल्कुल सामने कभी-कभी घुटनों पर काले निशान होते हैं। कुछ गायों के चेहरे और देह पर गहरे भूरे रंग के निशान होते हैं, जो दोष नहीं है।

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गोवत्स जन्म के समय आमतौर पर लाल रंग के होते हैं और तीन चार महीने की आयु में यह रंग बदलकर सफेद और धूसर हो जाता है। ललाट चौड़ा और समतल सांडों में कुछ-कुछ स्थूल होता है, जिस के बीचो-बीच खांचा होता है। चेहरा छोटा और सीधा होता है। थूथन चौड़ा और काले रंग का होता है। आंखे सुस्पष्ट और चमकीली और अंडाकार काली पलकों वाली होती है। कण छोटे और सीधे होते हैं। बेलों के सींग कड़े और मोटे होते हैं।वे बाहर की ओर मुड़कर पीछे की ओर मुड़े हुए होते हैं। और सिरों तक पहुंचते-पहुंचते हुए वे करीब-करीब गोलाकार हो जाते हैं। गर्दन छोटी, मोटी तथा देह मैं सुगठित होती है। कूबड़ कुविकसित और सांडों में सीधा होता है।

गलकंबल पतला वह छोटा होता है और केवल वक्षास्थि तक फैला होता है। उसमे मांसल सलवटे नहीं होती है। वक्ष भारी चौड़ा और आगे की ओर होता है। टांगे छोटी और देह में वर्गाकार रूप में सुस्थित होती हैं। कंधे चौड़े और पेशीय होते हैं। पैर कठोर, छोटे, सुगठित और काले रंग के होते हैं तथा खुरों के बीच संकरी दरार होती है। नाभी-प्रालम्ब गाय में बहुत छोटा होता है। मुतांत देह से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ होता है, लटकता हुआ नहीं होता है। कुछ देह में होती है, चौड़ी और शुण्डाकार होती है। यह सामान्यतः लंबी होती है और अंतिम सिरे पर अच्छे काले बालों का गुच्छा होता है, जो पिछले घुटनों के काफी नीचे तक लटकता है। त्वचा कोमल लचीली और काले रंग की होती हैं। बाल बारीक़ छोटे और सफेद होते हैं। शक्ति- चंचुगर्त मामूली होता है।

अयन बहुत अच्छी तरह विकसित होता है। थन काफी छोटे और एक दूसरे से दूर-दूर होते हैं दुग्ध शिराएँ सुस्पष्ट नहीं होती है। अयन का गठन सुंदर व लचीला होता है।

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प्रस्तुति

डॉ. अशोक सिंह, पूर्व डीन,

मध्य प्रदेश पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय,

महू इंदौर (म.प्र.)

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