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बेर के बगीचे में कीट एवं रोग प्रबंधन

बेर के बगीचे में कीट एवं रोग प्रबंधन
Written by Vijay dhangar

बेर के बगीचे में कीट एवं रोग प्रबंधन

बेर एक ऐसा फल है जो केवल वर्षा के पानी पर निर्भर रह कर भी किसान भाइयों को फल उत्पादन दे सकता है। बेर की पत्तियों का उपयोग पशुओं के लिए पोस्टिक चारा बनाने में भी किया जा सकता है। इसकी टहनियों से बाड़  बनाकर किसान अपने खेत और भंडारित चारे की सुरक्षा भी कर सकता है। बेर का अच्छा उत्पादन लेने के लिए बेर के पौधों की एवं रोगों से रक्षा करना बहुत ही जरूरी होता है। बेर में लगने वाले प्रमुख कीट रोग निम्न प्रकार से हैं

बेर के बगीचे में कीट एवं रोग प्रबंधन

प्रमुख कीट

फल मक्खी

लक्षण :- यह कीट बेर को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाता है। इस मक्खी की वयस्क मादा फलों के लगने के तुरन्त बाद ही फल में अण्डे देती है। ये अण्डे लार्वा में बदल कर फल को अन्दर से नुकसान पहुँचाते है। इसके आक्रमण से फलों की गुठली के चारों ओर एक खाली स्थान हो जाता है तथा इसकी लटे अन्दर से फल खाने के बाद बाहर आ जाती है। इसके बाद में मिट्‌टी में प्यूपा के रूप में छिपी रहती है तथा कुछ दिन बाद व्यस्क बनकर पुनः फलों पर अण्डे देती है। इसका जीवन चक्र इसी प्रकार चलता रहता हैं।

रोकथाम:- फल मटर दाने के समान होने पर क्यूनालफॉस 25 ई.सी. का एक मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव 20 से 25 दिनों के बाद करें। इस प्रकार आप फल मक्खी से अपने बगीचे को बचा सकते हैं।

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चेफर बीटल

लक्षण :- इस कीट का प्रकोप जून-जुलाई के महीने में अधिक होता है। यह पेड़ों की नई पतियों एवं उसके प्ररोहो को नुकसान पहुँचाता है इससे पत्तियों में छेद हो जाते है।

रोकथाम:- क्यूनालफॉस 25 ई.सी का 2.0 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर दे।

छालभक्षी कीट

लक्षण :- यह कीट नई शाखाओं के जोड़ पर छाल के अन्दर घुस कर जोड़ को कमजोर कर देता है फलस्वरूप वह शाखा टूट जाती है, जिससे उस शाखा पर लगे फलों का सीधा नुकसान होता है।

रोकथाम:- इसकी रोकथाम के लिए खेत को साफ सुथरा रखे, गर्मी में पेड़ों के बीच में गहरी जुताई करें। सुरंग को साफ करके पिचकारी की सहायता से केरोसिन 3 से 5 मिलीलीटर प्रति सुरंग डाले अथवा रुई का फोहा बनाकर सुरंग के अंदर रख देवें और बाहर से सुरंग को गिली मिट्टी से बंद कर दे।

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बेर में प्रमुख रोग

सूटी मोल्ड

लक्षण :- इस रोग से ग्रसित पत्तियों की निचली सतह पर काले रंग के धब्बे दिखाई देने लग जाते है, जो कि बाद में पत्ती की पूरी सतह पर फैल जाते है और परिणामस्वरूप सभी पत्तिया गिर जाती हैं।

रोकथाम:- मैनकोज़ेब अथवा कॉपर ऑक्सिक्लोराइड 3.0 ग्राम प्रति लीटर पानी से घोलकर छिड़काव करें।

सूटी मोल्ड

लक्षण :- इस रोग के लक्षण नवम्बर माह में शुरू होते है इस रोग से ग्रस्त पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बे बनते है तथा बाद में यह धब्बे गहरे भूरे रंग हो जाते हैं एवं बाद में पूरी पत्ती पर फैल जाते है। जिससे पत्तियाँ सूख कर गिरने लगती है।

रोकथाम:- मैनकोज़ेब 3.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव करें।

छाछ्या/चूर्णी फफूंदी

लक्षण :- इस रोग का प्रकोप वर्षा ऋतु के तुरंत बाद अक्टूबर-नवम्बर में दिखाई देने लगता है। इससे पत्तियों, टहनियों व फूलों पर सफेद पाउडर सा जम जाता है एवं रोगग्रस्त भागों की बढ़वार रूक जाती है, और फल व पत्तियाँ गिर जाते हैं।

रोकथाम:- इसके नियंत्रण के लिए के केराथॉन 1.0 मिली अथवा घुलनशील गंधक 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

इस प्रकार किसान सही समय पर किट प्रबंधन कर अपने बगीचे को रोगों एवं कीटों से बचा सकते हैं।

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vijay gadari

विजय गाडरी

B.sc Agriculture

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