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बी.टी. कपास की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

बी.टी. कपास
Written by bheru lal gaderi

बी.टी. कपास के नाम से जानी जाने वाली कपास की खेती पंजाब से लेकर केरल तक की जाती है। कपास मुख्य रूप से रेशे के लिए उगाई जाती है। इसके बीजों में भी 15 से 25% तेल होता है। कपास के दानों से तेल निकालने के बाद प्राप्त खल दुधारू पशुओं को खिलाने के काम आती है। आजकल भारत में बी.टी. कपास का क्षेत्रफल दिनों- दिन बढ़ता जा रहा है। बी.टी. शब्द मिट्टी में पाए जाने वाले जीवाणु बेसिलस थूरिजेंसिस से लिया गया है। इस जीवाणु में पाया जाने वाला जीन (बी.टी. जीन) विषैला पदार्थ पैदा करने वाले जिन को इस जीवाणु से निकालकर आनुवंशिक अभियांत्रिकी तकनीक द्वारा कपास की सल में डालकर कीट प्रतिरोधी किस्मों का विकास किया।

बी.टी. कपास

Image Credit- Cotton Australia

जब कीट इन पौधों के आर्थिक महत्व के भागों को खाता है तो विषैले पदार्थ को खाकर मर जाता है। किसानों द्वारा बी.टी. कपास कपास उगाने से उनको कीटनाशक दवाईयों का छिड़काव कम करना पड़ता है। जिससे उनको आर्थिक लाभ भी अधिक होता है। नवीनतम तकनीकी। सस्य क्रियाओं व उन्नतशील किस्म का प्रयोग कर किसान भाई कपास की फसल का बेहतर उत्पादन ले सकते हैं।

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कपास के उत्पादन में कमी के प्रमुख कारण

  • कपास की फसल में जैविक व अजैविक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग उत्पादन में कमी का प्रमुख कारण है। सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे आयरन, जिंक व मेगनीज की मृदा में कमी।
  • गुलरो का असमय गिर जाना।
  • कीटों और रोगों का अधिक प्रकोप प्रमुख रूप से बालवर्म का।
  • कपास की कम अवधि वाली किस्मों का अभाव।
  • कपास की खेती वर्षा आधारित (65% वर्षाधीन) आदि क्षेत्रों में करना। जहां प्रकृति तथा मौसम से उत्पन्न कई जोखिम रहते हैं।
  • उन्नत कृषि यंत्रों व कृषि क्रियाओं को नजरअंदाज करना।
  • स्थानीय एवं देशी किस्मों के सस्ते व परंपरागत बीजों का प्रयोग करना।

भूमि का चयन व खेत की तैयारी

कपास की खेती रेतीली, लवणीय जलभराव वाली मृदा को छोड़कर सभी भूमियों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। वैसे कपास के लिए दोमट व काली मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। जिनकी जलधारण क्षमता को व उपजाऊपन अधिक होता है। कपास के लिए मिट्टी का पी.एच. मान 7 के आस-पास अच्छा माना जाता है। खेत की पहली जुताई गर्मियों में मिट्टी पलटने वाले हल से करें ताकि भूमि में पड़े सभी प्रकार के कीड़े- मकोड़े एवं भूमि में उतपन्न कीटाणु व खरपतवार नष्ट हो जाए। इसके बाद कल्टीवेटर से दो जुताई करके पाटा अवश्य लगाएं।

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बुवाई का समय

उत्तर भारत में कपास की बुवाई का उपयुक्त समय से 15-25 मई के बीच हैं। जबकि मध्य भारत के सिंचित क्षेत्रों में कपास की बुवाई 15 से 30 मई तक अवश्य कर दें। वर्षा आधारित क्षेत्रों में कपास की बुवाई मानसून आने पर ही करें। सिंचित व वर्षाधारित क्षेत्रों में कपास की बुवाई अगस्त-सितंबर में की जाती है।

बी.टी. कपास की उन्नतशील किस्में

आज कपास की उन्नत किस्में किसानों के लिए उपलब्ध है। परीक्षणों द्वारा पाया गया कि संकर बी.टी. कपास से स्थानीय प्रजातियों की तुलना में 25 से 65% तक की बेहतर प्राप्त की जा सकती है। कपास की खेती वरदान साबित हो रही है। कीटरोधी बी.टी. कपास की खेती अब वरदान साबित हो रही हैं। इन किस्मों में उत्पादन के लिए संकर-ओज की मौजूदगी तथा बोलवर्म जैसे कीटों से बचाव के लिए पर्याप्त मात्रा में कीट- प्रतिरोधी होती है। अतः कपास की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए उन्नतशील और नवीनतम किस्मों का चयन अति आवश्यक है। विभिन्न जलवायुवीय क्षेत्रों के लिए कपास की उन्नत किस्मों का विवरण नीचे दिया गया है।

एम ई सी च – 12, एम ई सी च – 162, एम ई सी च – 184, आर सी एच – 314, आर सी एच- 515, राशि – 2, साही -बीजी,  बी.टी., मोठी बीती, ओटोबिटी इत्यादि।

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बीज की मात्रा उपचार

देशी व स्थानीय कपास के लिए 12 से 15 किग्रा तथा संकर किस्मों के लिए तीन से चार की..ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। बीज जनित बीमारियों से कपास की फसल को बचाने के लिए बीज का उपचार फफूंदनाशी गोल (10 लीटर पानी में 5 ग्राम एमिसन 0.1 ग्राम स्टेप्टोसाइक्लीन) 0.1 ग्राम सक्सिनिक अम्ल 10-15 की.ग्रा. बीज को लगभग 3-4 घंटे तथा छाया में सुखाकर बुवाई कर दें। किसान भाई ध्यान रखे कि उन्होंने बीज किसी विश्वसनीय संस्था से ख़रीदा हैं तो उसे उपचारित करने की जरूरत नहीं है। यह बीज पहले से उपचारित होता है।

बुवाई की विधि

बेहतर उत्पादन के लिए बी.टी. कपास की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75 से.मी. रखनी चाहिए। प्रति इकाई क्षेत्र सामान्य पौध संख्या बनाए रखने के लिए 2 बीज प्रति छिद्र बोने चाहिए। अंकुरण के 20 दिन बाद एक स्थान पर एक ही स्वस्थ पौधा रखें एवं कमजोर को निकाल दे। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। जिससे बीजों का अंकुरण शीघ्र एक समान हो सके। बीज की बुवाई 3 से 4 से.मी. की गहराई पर करनी चाहिए। बुवाई के 8 से 10 दिन बाद यदि किसी स्थान पर पौधे मर गए हो या अंकुरण न हुआ हो तो उस स्थान पर बीज पुनः बोया जा सकता है।

बुवाई पूरब- पश्चिम दिशा में करनी चाहिए जिससे सभी पौधों को सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में और लंबी अवधि तक मिलता रहे। किसान भाइयों को सलाह दी जाती है कि बुवाई कभी भी छिटकवा विधि से न करें। जिन क्षेत्रों में जलभराव की समस्या रहती है वहां पर बुवाई मेड़ों पर करनी चाहिए।

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खाद एवं उर्वरकों की मात्रा

जहां तक संभव हो सके किसान भाइयों को खेत की मिट्टी की जांच और स्थानीय सिफारिश के आधार पर खाद एवं उर्वरकों की मात्रा सुनिश्चित करनी चाहिए। रबी फसलों की कटाई के तुरंत बाद 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह हुई गोबर की खाद को समान रुप से संपूर्ण खेत में बिखेर दें। उत्तर भारत में कपास की सिंचित फसल से अच्छी पैदावार लेने हेतु 80-100 किग्रा नाइट्रोजन, 40 किग्रा फास्फोरस व 30 की.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। जबकि वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए 40 से 50 किग्रा नाइट्रोजन, 20 से 40 किग्रा फास्फोरस का प्रयोग करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों  के लिए 30-40 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति व असिंचित क्षेत्रों के लिए 30-40 की.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक देने का समय 

नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फास्फोरस एवं पोटाश की संपूर्ण मात्रा बुवाई के समय प्रयोग करनी चाहिए। नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा को दो बराबर भागों में बांट कर क्रमशः दुबई के 30 से 35 दिनों व 80 से 85 दिनों बाद खड़ी फसल में समान रुप से छिटक देनी चाहिए। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती कीमतों और उनकी कम उपलब्धता के कारण कपास की फसल में जैविक उर्वरकों का प्रयोग भी बहुत आवश्यक है। जैविक उर्वरकों के प्रयोग से कपास की पैदावार में 15- 20% की बढ़ोतरी की जा सकती है। कपास की फसल में प्रयोग होने वाले जैविक उर्वरकों में एजेक्टोबेक्टर व फास्फेट घुलनशील जीवाणु प्रमुख है।

जैविक उर्वरक सस्ते आसानी से उपलब्ध और पर्यावरण हितैषी भी है। जिन मृदाओं में जिंक सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी पाई जाती है वहां पर 25 किग्रा जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय प्रयोग करना चाहिए। किसान भाई ध्यान रखें कि यदि वे  कपास की फसल में गोबर की खाद, कंपोस्ट या जैविक उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं तो नाइट्रोजन की संस्तुत की गई मात्रा में से 30 कि.ग्रा। नाइट्रोजन कम कर दे।

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सिंचाई प्रबंधन

गहरा जड़ तंत्र होने के कारण कपास के पौधों में काफी गहराई से पानी खींचने की क्षमता होती है। कपास की फसल में अंकुरण, पौधे वृद्धि, पुष्पन व गूलर बनते समय भूमि में नमी की अधिक आवश्यकता होती है। इस समय अनिवार्य रूप से सिंचाई करें। अतः इस समय कपास की फसल में चार से पांच सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं। कपास के साथ उड़द की बुवाई आवश्यक है। फूलने फलने के समय अधिक नमी का कपास की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कपास की फसल स्थिर पानी ज(लभराव) के प्रति अति संवेदनशील है। अतः फालतू पानी को खेतों से बाहर निकाल दे।

खरपतवार नियंत्रण

कपास की फसल में खरपतवार को रोकने के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए जिससे भूमि के अंदर नमी का संरक्षण एवं वायु आवागमन सुचारु रुप से हो सके। वर्षा आधारित कपास की फसल में खरपतवार की समस्या होती है। सिंचित फसल बुवाई के 50-60 दिनों तक खरपतवारों से मुक्त रहनी चाहिए। खरपतवार फसल में दिए गए पोषक तत्वों का अवशोषण कर लेते हैं जिसका फसल की पैदावार व गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अगर निराई-गुड़ाई संभव न हो तो खरपतवारों के नियंत्रण करने के लिए शाकनाशियों का प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए कपास की बुवाई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व पेन्डीमेथिलीन 1.0  की.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करके साठी किस्म के खरपतवारों का पूरी तरह से सफाया किया जा सकता है। किसान भाई ध्यान रखे कि जिस स्प्रे मशीन से 2,4-डी शाकनाशी का छिड़काव से किया गया हो उसे कपास में छिड़काव के लिए प्रयोग ना करें।

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सहफसली खेती

कपास एक लंबी अवधि वाली फसल है। साथ ही कपास की दो पंक्तियों के बीच अधिक फासला होता है। इसकी प्रारंभिक बढ़वार भी बहुत धीरे- धीरे होती है। ऐसी परिस्थितियों में कपास की फसल के साथ अन्य अल्प अवधि वाली फसलों की सहफसली खेती करना लाभदायक पाया गया है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के अनेक भागों में कपास के साथ मूंगफली, सोयाबीन, मूंग, उड़द, रागी, मिर्च व ग्वार की सहफसली खेती बहुतायत में की जाती है। ऐसा करने से किसानों को कपास के साथ अतिरिक्त आमदनी मिल जाती है। जो खाद्द्य, दाल, तेल व् चारे इत्यादि आवश्यकताओं पूर्ति करती है। साथ ही कीटों, बिमारियों, कम वर्षा या अन्य किसी कारण से मुख्य फसल (कपास) के साथ दलहनी फसलों की फसल खेतों को दोबारा उपजाऊ बनाने में सहायक है।

कपास की दो पंक्तियों के मध्य में उड़द, मुंग, सोयाबीन व मूंगफली की दो पंक्तिया बोना लाभदायक पाया गया हैं। इससे न केवल फार्म संसाधनों का उचित उपयोग होता है। बल्कि प्रति इकाई क्षेत्र शुद्ध मुनाफा भी बढ़ता है। सहः फसली खेती में खरपतवारों को भी पनपने का मौका नहीं मिलता है।

प्रमुख कीट एवं उनका नियंत्रण

कपास की फसल में कीटों का अत्यधिक प्रकोप होता है। कपास की फसल में निम्न एकीकृत कीट प्रबंधन की सिफारिश की जाती है। इसके लिए गर्मी के मौसम में खेतों की गहरी जुदाई करें। जिससे मिट्टी में छिपे कीट- पतंगे और उनके अंडे व लार्वा नष्ट हो जाए। खेतों के आसपास साफ- सफाई रखें। मेड़ों पर उगे खरपतवारों को नष्ट कर दे। बी.टी. कपास की संकर प्रजातियों को उगाना चाहिए क्योंकि इन पर कीटों का कम प्रकोप होता है। इसके अलावा कीट नियंत्रण के लिए ट्रेप क्रॉप, फेरोमोन ट्रैप, प्राकृतिक शत्रुओं का उपयोग जैविक कीटनाशक आदि का कपास की खेती में प्रयोग किया जा सकता है।

रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप आर्थिक स्तर के नुकसान को पार कर जाए तो फसल वृद्धि की किसी भी अवस्था में सिफारिश किए गए कीटनाशकों का छिड़काव करें। गूलर की सुंडियों से बचाव के लिए इमिडाक्लोप्रिड 1 मि.ली. मात्रा प्रति 3 लीटर या मोनोक्रोटोफॉस की 2 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर एक से दो बार छिड़काव करें। 1 हेक्टेयर क्षेत्र में छिड़काव के लिए 500 से 700 लीटर घोल प्राप्त होता है। एक ही प्रकार छिड़काव के कीटनाशक का पुनः छिड़काव न करें।

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प्रमुख रोग एवं उनका नियंत्रण

कपास का पट्टी मरोड़ रोग, कपास का मुरझाना, सूखा जड़ गलन, पत्तियों का झुलसा रोग प्रमुख है। कपास के बीज व मृदा जनित रोगों से बचाव हेतु बीज उपचार अवश्य करें। स्वस्थ बीज व रोग रोधी प्रजातियों की बुवाई करें। इसके अलावा रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दे। पत्ती मरोड़ एक विषाणु रोग हैं। यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है। रोगग्रसित पौधों की बढ़वार धीमी हो जाती है। साथ ही पौधों पर फूल व गुलरों की संख्या कम हो जाती है। बुवाई से पूर्व अप्रैल माह में खेत व आस-पास खड़ी कंधी बूटी व पिली बूटी के पौधों को उखाड़कर फेंक दें। जुलाई-अगस्त माह में रोग ग्रसित इक्के-दुक्के पौधों को उखाड़कर जला दे।

उपज

कपास की फसल में उन्नतशील प्रजातियां तथा उपयुक्त दी गई विधियों को अपनाने पर 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टर पैदावार की जा सकती है। जबकि बी.टी. कपास की फसल से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है। किसान भाई ध्यान रखें कि बी.टी. कपास की खेती में हर बार प्रयोग करें।

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प्रस्तुति:-

गणपत लाल यादव, मुकेश कुमार यादव,

अर्जुन लाल यादव, शंकर लाल यादव एवं कानाराम यादव,

विद्द्यावास्पति उद्यान विज्ञान विभाग, कृषि, कीट विज्ञान विभाग,

पौध व्याधि विभाग, मृदा विज्ञान कृषि रसायन विज्ञान विभाग (स्नातकोत्तर),

श्री कर्ण नरेंद्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर

स्त्रोत:-

हरित क्रान्ति 

कपास विशेषांक वर्ष-2017

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