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बीज उत्पादन की उन्नत तकनीक कद्दूवर्गीय सब्जियों में

बीज उत्पादन
Written by bheru lal gaderi

भारत में कद्दूवर्गीय कुल की लगभग 20 प्रकार की सब्जियों की जाती है। इनमें घीया/लौकी, तोरई, करेला, खीरा, तरबूज, खरबूज, ककड़ी, कद्दू, चप्पन कद्दू, टिण्डा, परवल, फुट आदि मुख्य है। खीरा वर्गीय  सब्जियों के बीज उत्पादन के लिए सब्जी उत्पादन सम्बन्धी सामान्य क्रियायों के साथ-साथ, निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

बीज उत्पादन

बीज उत्पादन खेत का चयन

बीज उत्पादन के लिए ऐसी भूमि का चुनाव करना चाहिए, जिसमें पानी के निकास की उचित व्यवस्था हो एवं फसल के लिए पर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ उपलब्ध हो। बीज का खेत खरपतवारों व अन्य फसलों के पौधों से मुक्त होना चाहिए। बीज खेत में पिछले एक या दो वर्षों में उसी फसल की कोई दूसरी किस्म नहीं ऊगाई गई हो। यदि वही किस्म उगाई जानी है, है तो यह सुनिश्चित करें कि उसकी अनुवांशिक शुद्धता बीज प्रमाणीकरण के मनको के अनुरूप हो

किस्म का चयन

जिन किस्मों की बाजार में मांग हो या जिन्हे किसान अपने लिए उगाना चाहता है, बीज उत्पादन के लिए उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए। किस्म अछि पैदावार देने वाली हो। किस्म में रोग रोधिता, अगेतापन आदि वांछित गुण होने चाहिए। छांटी गई किस्म उस क्षेत्र विशेष की जलवायु के अनुकूल होनी चाहिए ताकि उत्पादन के समय आनुवंशिक परिवर्तन की संभावना न रहे। चयनित किस्म का शुद्ध बीज किसी अनुसन्धान केंद्र, बीज निगम, कृषि विश्वविद्यालय या सुस्थापित बीज फार्म से प्राप्त करना चाहिए। उन्नत किस्मों की जानकारी तालिका में दी गई है

कद्दूवर्गीय सब्जियों की उन्नत किस्में

फसल किस्म
खीरा पूसा उदय, पोइनसैट, जापानी लोंग ग्रीन, खीरा-75, खीरा-90
तरबूज आर्का माणिक, सुगरबेबी, आसाहि यमातो, इम्प्रूव्ड शिप्पर, दुर्गापुरा मीठा, दुर्गापुरा केसर, दुर्गापुरा लाल, आर्का ज्योति।
पेठा आर्का सूर्यमुखी, आर्का चन्दन, पूसा विश्वास, पूसा विकास, नरेंद्र अमृत, काशी हरित, आजात कद्दू-1
खरबूज पूसा मधुरस, पूसा शरबती, हिसार मधुर, हारामधु, पंजाब सुनहरी, पंजाब रसीला, दुर्गापुरा मधु, काशी मधु, आर्का जीत, आर्का राजहंस, आर.एम.-42 आर.एम.-50, एन.डी.एम.-15
घीया/लौकी पूसा समर प्रोलिफिक राउंड, पूसा समर प्रोलिफिक लोंग, पूसा नवीन, पूसा सन्देश, पूसा समृद्धि, पूसा संतुष्टि, सम्राट लोंग।
करेला पूसा दो मौसमी, पूसा विशेष, आर्का हरित, प्रिया, कोयबंटूर, लोंग ग्रीन, कल्याणपुर बारामासी, पंजाब-15।
तोरई पूसा सुप्रिया, पूसा चिकनी, पूसा स्नेह, पूसा नसदार, पंजाब सदाबहार, आर्का सुमित, कोंकण हरिता, सतपुतिया।

 

पृथककरण

अनुवांशिक रूप से शुद्ध बीज प्राप्त करने के लिए आवश्यक है की दो किस्मों के बीज में एक निर्धारित दुरी अवश्य राखी जाए। अधिकतर बेल वाली सब्जियों के पौधें उभयलिंगाश्रयी/ मोनोप्सिस होने के कारन इनमें पर-परागण आवश्यक है, जिसमें मधुमखियाँ व अन्य कीटों से समुचित मात्रा में परागण होने से इन फसलों में उत्तम गुण वाले फलों एवं बीजों की कुल पैदावार बढ़ जाती है। न्यूनतम पृथक्क़रण दुरी आधार बीज के खेत से 1500 मीटर तथा प्रमाणित बीज की फसल के खेत से 800 मीटर रहनी चाहिए।

खेत की तैयारी

खेत में एक जुताई के बाद सुहागा लगाएं, ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए। खेत की तैयारी के समय प्रति हैक्टेयर 200-250 क्विंटल की दर से अच्छी पकी हुई गोबर की खाद मिलाई जाती है। इसे बुवाई से 20-25 दिन पहले खेत में मिला दिया जाता है। आखरी जुताई के बाद खेत में पूर्व से पश्चिम की और 45 से.मी. छोड़ी व 30-40 से.मी. गहरी नालियाँ बना लें। एक नाली से दूसरी नाली के बिच की दुरी फसल के आधार पर 1.5-2.0 मीटर (, करेला, खीरा, ककड़ी, चप्पन कद्दू, टिण्डा, परवल, फुट) तथा 3-4 मीटर (घीया/लौकी, तोरई, तरबूज, खरबूज, कद्दू,) रखते है। नालियों के किनारों पर फसल के अनुसार अलग-अलग दुरी (0.5-1.0 मीटर) पर थाले बना लेते है। इसे नाली अथवा थाला विधि कहते है।

बीज की बुवाई

बीजों का अंकुरण जल्दी करने के लिए बीजों को पानी में भिगोते है।  पानी में भिगोने के अवधि फसल के अनुसार 2-4 घंटे (खीरा, तरबूज,खरबूज,ककड़ी) 6-8 घंटे (लौकी,तोरई,सीताफल) 10-12 घंटे (टिण्डा) तथा 20-24 घंटे (करेला) है। बिजाई से पहले बीज को उपुक्त कवकनाशी से उपचारित कर लेना चाहिए। यदि बीज अधिक मात्रा में हो तो उन्हें घूमने वाले ड्रमों में डालकर उपचारित करें। दवाई का रसायन बीजों में समान रूप से मिल जाना चाहिए। बीज की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित मात्रा में उर्वरको का उपयोग तथा समय पर खरपतवारों, कीटों व रोगों का प्रबंधन आवश्यक है।

कद्दूवर्गीय सब्जियों में बीज की बुवाई का समय, बीज दर, फलों एवं बीज की पैदावार

फसल

बीज की बुवाई का समय बीज दर

(प्रति एकड़)

पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे की दुरी

(से.मी.)

फलों की औसत पैदावार प्रति एकड़ (क्विंटल)

बीज औसत पैदावार प्रति एकड़ (किलो)

खीरा फरवरी-मार्च एवं जुलाई 0.5-0.75 150-200×60-90 40-60 40-50
तरबूज फरवरी-मार्च 1.5-2.0 250-350×90-100 120-150 75-80
पेठा फरवरी-मार्च 1.5-2.0 200-300×100-150 120-150 100-150
खरबूज फरवरी-मार्च 0.75-1.0 150-250×60-75 60-80 60-70
घीया/

लौकी

फरवरी-मार्च एवं जुलाई 1.5-2.0 200-300×75-100 100-120 150-200
करेला फरवरी-मार्च 1.5-2.0 150-250×60-90 40-60 100-130
तोरई फरवरी-मार्च एवं जुलाई 1.5-2.0 150-250×60-75 100-120 100-120

 

अवांछित पौधों का निकलना

कोई भी वह पौधा जो लगाई गई किस्म के अनुरूप लक्षण नहीं रखता हो उसे जड़ से उखड कर नष्ट कर देना चाहिए। पौधों में बीमारी खासकर बीजो से उत्पन होने वाली बीमारी हो तो उन्हें खेत से हटाना आवश्यक है। इसके लिए किस्म के लक्षणों का भलीभांति ज्ञान होना चाहिए, जिससे पौधे की विभिन्न अवस्थाओं में इसकी पहचान हो सके। इसके लिए हर अवस्था में जो भी अवांछित पौधे मिले उनको निकलते रहना चाहिए। इससे बीज उत्पादन में गुणवत्ता बनी रहती है और श्रेष्ठ श्रेणी के बीज प्राप्त होते है।

पौध सरंक्षण

कद्दूवर्गीय सब्जियों के प्रमुख कीट एवं रोग एवं उनकी रोकथाम की  जानकारी के लिए पढ़े कद्दूवर्गीय सब्जियों के प्रमुख कीट एवं रोग एवं नियंत्रण

फसल की कटाई

बीज उत्पादन के लिए समय पर फलों को तोड़कर उनमे से बीज निकलना अच्छा रहता है। इसमें असावधानी बरतने पर बीज की गुणवत्ता एवं उपज में कमी आ सकती है। बीजों को निकालने के बाद बीज अनुसार उनकी सफाई कर सुखाकर भंडारण करे।

बीज भंडारण

 भंडारण के दौरान बीजों को कीटों से बचने हेतु थाइरम या कार्बेन्डाजिम चूर्ण 2 ग्राम प्रति किलो के दर से उपचारित करे। बीजों को बजार मांग के अनुसार वंचित मात्रा में पैकेटों में भरा जाता है। बीजों को नमी रहित, ठन्डे स्थानों पर भण्डारण करें।

 

 

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