agriculture

बीजोपचार आधुनिक खेती में उपयोग एवं महत्व

बीजोपचार
Written by bheru lal gaderi

आज के जमाने में फसलों में इतनी बीमारियां फेल रही हैं की उनका प्रबंधन करना दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा हैं। इस समस्या से काफी हद तक छुटकारा पाने के लिए बुवाई के लिए समय बीजोपचार करना महत्वपूर्ण हो गया हैं। बीजोपचार से फसलों में 10 से 15 प्रतिशत तक उत्पादन में बढ़ोतरी की जा सकती हैं। फसल उत्पादन में जलवायु, मिट्टी व बीज पर किसी का नियंत्रण नहीं होता तथा मिट्टी को भी नहीं बदला जा सकता, इसमें केवल खाद, उर्वरक आदि डालकर उपज बधाई जा सकती हैं। लेकिन बीज का ऐसा आदान हैं जिसका सही चयन कर आसानी से उपज बढ़ाई जा सकती हैं। बीज के सही चुनाव के बाद उसका उचित उपचार भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि बहुत से रोग बीजों से ही फैलते हैं। अतः रोग कारकों, कीटों व असामान्य परिस्थितियों से बचने के लिए बीज का बीजोपचार करना ही जरूरी होता हैं।

बीजोपचार

बीजोपचार(Seed-treatment) के लाभ

  • बीज से फैलने वाले रोगों से आसानी से बचा जा सकता हैं।
  • फसलों का अंकुरण सही तरिके से होता हैं।
  • पौधों को पोषक तत्व आसानी से मिल पाते हैं।
  • काफी हद तक कीटों का नियंत्रण हो जाता हैं।
  • भंडारण में रखने से पूर्व बीज का बीजोपचार करके उसे लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता हैं।

Read also – स्टीविया की उन्नत खेती और उत्पादन तकनीक

बीज को उपचारित करने की विधियां

बीजोपचार

नमक के घोल से उपचार करना

इस उपचार के लिए पानी व नमक का 2% का घोल बनाते हैं, मतलब एक लीटर पानी में 20 ग्राम नमक मिलाकर उसे अच्छी तरह हिलाते हैं, जब तक की पूरा नमक घुल न जाये। इसके बाद घोल में आवश्यकतानुसार बीज डालते हैं। हल्के व रोगी बीज तैरकर पानी की सतह पर आ जाते हैं, जबकि स्वस्थ बीज बर्तन के पेंदे में बैठ जाते हैं। तैरते हुए बीजों को हाथ से निथारकर अलग कर देना चाहिए। पेंदे में बैठे बीजों को अलग करके साफ पानी से धोकर उन्हें छाया में सूखा देना चाहिए। अच्छी तरह सूखने के बाद बीज को बुवाई में काम ले सकते हैं। इस उपचार से बाजरे की फसल को अरगट जैसी बीमारी से बचा सकते हैं।

ताप से उपचार

कुछ रोगों के जीवाणु बीजों के अंदर रहते हैं उनके नियंत्रण के लिए बीजों को मई-जून के महीने में (जब दिन का तापमान लगभग 40-50 डिग्रिसेन्टीग्रेट होता हैं) 6 से 7 घंटे के लिए पक्के फर्श पर फैला देना चाहिए।

Read also – गुलदाउदी की व्यवसायिक उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

जीवाणु कल्चर से उपचार

बीजोपचार

कई प्रकार के जीवाणु कल्चर से बीज का उपचार करके पौधों के लिए मृदा में पोषक तत्वों की उपलब्धता बनाये रख सकते हैं। मुख्य रूप से बीजोपचार में काम आने वाले जीवाणु कल्चर निम्न हैं:

राइजोबियम जीवाणु

बीजोपचार

इन फसलों का दलहनी फसलों के साथ सहजीवता का सम्बन्ध पाया जाता हैं। ये जीवाणु फसलों की जड़ों में ग्रन्थियाँ बनाते हैं एवं प्राकृतिक नत्रजन को स्थिर करते हैं। दलहन सहजीवता से लगभग 40-50 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष स्थिर होती हैं। अलग-अलग फसलों में राइजोबियम जीवाणु की अलग-अलग प्रजातियां पाई जाती हैं। अतः अलग-अलग जीवाणु कल्चर की आवश्यकता पड़ती हैं। इनकी अलग-अलग प्रजातियां निम्न प्रकार हैं:

जीवाणु

फसल के उपयोग

राइजोबियम मेलिलोटाई रिजका, मेथी
राइजोबियम लेगुमिनोसेरम मटर
राइजोबियम जपोनिकम सोयाबीन
राइजोबियम फेसियोलाई दाल वाली फसलें

Read also – गेंदे की उन्नत एवं व्यवसायिक खेती से अधिक आय

एजेक्टोबेक्टर जीवाणु

ये जीवाणु गैर दलहनी फसलों जैसे गेहू, जौ, बाजरा, मक्का, ज्वार, गन्ना, आदि के लिए फायदेमंद होते हैं। ये जीवाणु लगभग 20 से 30 किलोग्राम प्राकृतिक नत्रजन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष स्थिर करते हैं।

फास्फोरस विलेयकारी जीवाणु

ये जीवाणु मृदा में उपस्थित अविलय, स्थिर, अप्राप्य फास्फोरस की विलेयता को बढ़ाकर पौधों को उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं। इनका उपयोग लगभग सभी फसलों में किया जा सकता हैं।

जीवाणु कल्चर से बीजोपचार करने का तरीका

जीवाणु कल्चर से बीजोपचार के अच्छे परिणाम के लिए सही विधि का ज्ञान होना जरूरी हैं। इसके लिए 200 ग्राम जीवाणु को गुड़ के10% घोल (एक लीटर पानी में 100 ग्राम गुड़) में अच्छी तरह मिलाया जाना चाहिए और इस घोल से एक एकड़ में काम आने वाले बीज के ऊपर छिड़ककर अच्छी तरह से लेप करना चाहिए तथा बीज को छाया में सूखा दें। बीज सूखने पर बिजाई कर सकते हैं।

Read also – प्रॉम खाद – एक प्रमुख जैविक खाद स्रोत एवं निर्माण विधि

कीटनाशी उपचार

मृदा में फसलों को दीमक व अन्य किट हानि पहुंचते हैं। बीज को इनसे मुक्त रखने के लिए कीटनाशकों से बीजोपचार कर सकते हैं। इसके लिए मुख्य रूप से क्लोरपायरीफास 20 इ.सी. तथा गाउचो इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू.एस. तथा थाइमिथोक्जाम का 4 से 5 एम.एल. व 5 ग्राम प्रति किलोग्राम के लिए प्रयोग कर सकते हैं। इसके आलावा बीज को कीटनाशकों से उपचारित करके भंडारित में भी सुरक्षित रख सकते हैं। गोदामों में एल्यूमीयम फॉस्फाइड (सेल्फॉस) की दो से 3 गोलिया (प्रत्येक तीन ग्राम) प्रति टन बीज या 140 गोलियां 100 मीटर स्क्वायर के हिसाब से 7 से 14 दिन के लिए प्रधुमित कर देते हैं।

फफूंदनाशक दवाओं से उपचार

बीज के ऊपर व अंदर पायी जाने वाली फफूंद से बचाने के लिए लिए बीज को निम्न दवाओं से उपचारित किया जा सकता हैं।:

ऊपरी फफूंद के लिए मेंकोजेब, थाइरम, केप्टान, फिनाइल मर्क्युरी एसिटेट, मिथोक्सी इथाइल मरक्युरी क्लोराइड आदि। 3.0 से 4.0 ग्राम प्रति किलो बीज
भीतरी फफूंद के लिए कार्बेन्डाजिम, स्टेप्टोसाइक्लीन, कार्बोक्सीबेलेट आदि।  1.5 से 2.0 ग्राम प्रति किलो बीज

Read also – जरबेरा की पॉलीहाउस में व्यावसायिक खेती

बीजोपचार करते समय निम्न सावधानियां रखें:

  • जितने बीज की बिजाई करनी हो उतने ही बीज को उपचारित करें।
  • दवा के खाली डिब्बे को जमीन में दबा दे अथवा जलाकर नष्ट कर देवें।
  • दवाइयों के उपयोग करने का क्रम (पहले फफूंदनाशी,फिर कीटनाशी और अंत में जीवाणु कल्चर) होना चाहिए।
  • जिस व्यक्ति के हाथ में चोट का घाव या खरोंच हो तो उससे बीजोपचार नहीं करवाये।
  • बीजोपचार करते समय हाथों में दस्ताने व मुँह पर कपड़ा रखें।
  • यदि उपचारित बीज बच जाता हैं तो उसे न खुद खावे न ही किसी जानवरों को खिलावें।
  • गोदामों में दवाई का प्रयोग करते समय किसी आदमी को साथ रखें जो की दवाइयों का अच्छा ज्ञान रखता हो।

Read aslo – नर्सरी में मौसमी फूलों के पौधे तैयार करने की उन्नत तकनीक

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.