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बारानी खेती नियोजन एवं फसल उत्पादन

बारानी खेती
Written by bheru lal gaderi

बारानी खेती का तात्पर्य:-

जहां खेती वर्षा पर आधारित हो, उसे बारानी खेती (Dry-farming) कहते हैं। सामान्यतया बारानी क्षेत्र में वर्षा कम होती हैं, परंतु इसकी मात्रा को एक मात्र आधार नहीं माना जा सकता है।

बारानी खेती

Image Credit – DNA India

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बारानी खेती को सफल बनाने के लिए यह बहुत ही आवश्यक है कि वर्षा के पानी को ठीक ढंग से संरक्षित किया जाए और उसके उपयोग वितरण को ध्यान में रखकर फसल उत्पादन हेतु उसकी योजना बनाई जाए। तभी इसके अच्छे परिणाम के साथ साथ अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

जहां तक सिंचित खेती की बात है, इसमें उत्पादन कुछ समय तक तो बढ़ता है, किंतु बाद में उपज कम होने लगती हैं। अन्तत: एक स्थिति ऐसी आती है कि उपज स्थिर हो जाती है।

इसके विपरीत यदि बारानी क्षेत्रों में मृदा एवं जल का संरक्षण ठीक ढंग से करते हुए ऐसी फसलों का चुनाव किया जाए जो क्षेत्र विशेष के लिए उपयोगी सिद्ध हो। मृदा एवं जल का संरक्षण के आधार पर खेती को और अधिक सफल बनाया जा सकता है।

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मृदा संरक्षण:-

वर्तमान में हमारे देश में 70 प्रतिशत खेती वर्षा पर ही आधारित होती हैं। इसके लिए मृदा के साथ साथ जल का प्रबंधन करना अति अत्यावश्यक है। जिस भू-भाग पर खेती की जाती है, उसमें काफी मात्रा में पोषक तत्व विद्यमान होते हैं, जो कि वर्षा के पानी के साथ बह जाते हैं।

उपजाऊ मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए खेतों की मेड़ बंदी की जाए तथा इसके चारों तरफ घास, दलहनी फसलें तथा चारे वाली फसलें विशेषकर नेपियर घास को लगाया जाए। जिससे मिट्टी के कटाव को रोका जा सके और चारे की प्रतिपूर्ति भी की जा सकती हैं।

इसके अतिरिक्त किसान खेत की मेड पर सुबबूल, अरंडी, बांस, नींबू तथा करोंदा लगाकर भी काफी लाभ अर्जित कर सकते हैं। खेती वहीं पर करनी चाहिए जहां ढलान 0.5 से 2% हो।

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नमी/जल संरक्षण:-

मैदानी क्षेत्रों में जहां मृदा संरक्षण का महत्व है, वही सफल खेती के लिए भूमिगत जल का संरक्षण करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसके लिए सर्वप्रथम खेतों को खरपतवार से मुक्त रखा जाए अन्यथा खरपतवार फसलों के सापेक्ष जल एवं पोषक तत्वों का अवशोषण बड़ी शीघ्रता से करते हैं।

जिससे फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। खरीफ मौसम में खरपतवारों का नियंत्रण न होने पर सीमित नमीं का हास होता है। जिसके कारण मिट्टी की ऊपरी सतह में जहां बीज बोया जाता है, नमी नहीं होने के कारण बीज का अंकुरण सही नहीं हो पाता। अतः इससे बचने के लिए यह आवश्यक है, कि खेत का वर्षा उपरांत सतही नमी का हास् कम से कम हो। जिससे बीज का अंकुरण सही ढंग से हो सके।

एक कहावत है तेरह कार्तिक, तीन असाढ़, अर्थात वर्षा आरंभ होने पर जितनी जल्दी हो सके फसल की बुवाई कर देनी चाहिए। जिससे जितना फसल का पानी से संपर्क बढ़ेगा उसी अनुपात में उत्पादन प्राप्त होगा।

विभिन्न परिणामों में साबित हो चुका है, कि एक दिन भी बुवाई देरी से करने पर 25% तक उपज में कमी होती है। अतः बारानी खेती में सामयिक बुवाई का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। इसके लिए खेत की तैयारी एवं बुवाई समय पर करना अति आवश्यक है।

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वांछित पौध संख्या:-

अच्छा उत्पादन लेने के लिए खेतों में पर्याप्त मात्रा में पौधों की संख्या सुनिश्चित होनी अति आवश्यक है। बारानी खेती में पौधों की संख्या मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्व और पानी की उपलब्धता पर निर्भर करती हैं।

वास्तव में बारानी खेती में पौधे उपलब्ध पानी को प्रारंभिक अवस्था में ही वाष्पोत्सर्जन क्रिया द्वारा नष्ट कर देते हैं और पकने की अवस्था पर जब पानी की आवश्यकता होती है, तो उस समय पर पानी नहीं मिल पाता है। अतः पौधों की संख्या उपलब्ध पानी की मात्रा के आधार पर ही रखी जाए।

मृदा वाष्पीकरण व रिसाव प्रक्रिया को रोकने के उपाय:-

पौधे वाष्प उत्सर्जन क्रिया, सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा से भी गर्मी प्राप्त होती हैं से बचने के लिए करते हैं। फसलों में प्रारंभिक अवस्था में ही वाष्पीकरण क्रिया बड़ी तेजी से होती हैं।

अतः इस अवस्था पर ही भूमि की सतह से पानी उड़ने से रोकना अति आवश्यक होता है ताकि उत्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

इसके लिए भूमि से वाष्पीकरण एवं रिसाव क्रिया को रोकने के लिए कई रसायन विकसित किए गए हैं। जो जल संचयन करने की क्षमता रखते हैं। इन रसायनों को स्टार्च पोली एक्रिलोनिटल कहते हैं। जिन्हें बीज व भूमि उपचार दोनों तरह से उपयोग किया जा सकता है।

बीजोपचार के लिए 10-12 ग्राम रसायन 1 कि.ग्रा। बीज के लिए पर्याप्त होता है। परंतु भूमि उपचार के लिए 6-7 कि.ग्रा। रसायन प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई करने से पूर्व खेत में बिखेर देना चाहिए। जिससे वाष्पोत्सर्जन की क्रिया भी कम हो जाती हैं।

जिससे मिट्टी की भौतिक अवस्था में सुधार होकर फसलों की खेती सीमित पानी में ही सफल हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कई  और रसायन उपलब्ध हैं।

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उपयुक्त फसलों एवं किस्मों का चुनाव:-

बारानी खेती के लिए उपयुक्त फसलें वह हैं जिनकी जड़ों का फैलाव अधिक से अधिक हो तथा साथ ही सूखा सहन करने की क्षमता हो।

कुछ फसलों में तो पानी की कमी से फूल ही नहीं निकलते हैं, परंतु कुछ फसलें और उनकी ऐसी प्रजाति भी हैं। जिनमें पानी की कमी होने से पहले फूल एवं बालियाँ निकल आती हैं और शुष्क पदार्थ का आधा भाग दाने में परिवर्तित होता है।

इसमें चना व जौ को मिलाकर बोना तथा सरसों, अलसी की फसलें अधिक लाभकारी होती हैं। खरीफ के लिए तुअर, ग्वार, मुंग, तिल, अरंडी व बाजरे की फसलें अधिक उपयोगी रहती हैं।

सूखा रोधकता यहीं तक सीमित नहीं होती हैं। दाना भरते समय हवा के कारण फसलें पूरी तरह नष्ट हो जाती हैं। फिलहाल इसका कोई तत्कालिक समाधान नहीं हो सकता है परंतु इसके बचाव हेतु लंबी योजना बनाना लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

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कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उत्पादन का स्थरीकरण:-

ऐसा क्षेत्र जहां सूखे की निरंतर संभावना रहती हैं। में कुल खेती योग्य भूमि में फसल उगाना वास्तविकता से परे है। ऐसी स्थिति में विभिन्न क्षमता वाली भूमि में फसल उगाना लाभकारी होता है और शेष भूमि में स्थाई वृक्ष व अन्य पौधे लगाना लाभकारी होता है।

जिन क्षेत्रों में तेज हवा चलती हैं। वहां पर भूमि का कटाव पर अधिक होता है इसके लिए चारा प्रजाति की किस्मों के साथ-साथ लकड़ी या ईंधन वाले पेड़ लगाए जाएँ। फसलों का चयन उस क्षेत्र विशेष की जलवायु के आधार पर करना चाहिए। इसके अन्य छोटे-छोटे स्थानों पर वृक्ष लगाने चाहिए और खेती समोच्य रेखाओं के सहारे ढलान 0.5 के पश्चात ना आ जाए।

इस तरह इन क्षेत्रों में खेती करने से 5 साल के पश्चात आय लगातार मिलती रहेगी और बिच वाले क्षेत्रों के ऊपर से पानी भरकर आ जाएगा जिससे खेती के आसार अधिक बढ़ जाएंगे।

बारानी खेती समय की मांग है और यदि हमने खेती नई तकनीक अपनाकर नहीं की तो सूखापन बढ़ने के साथ-साथ हमारे देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो सकती हैं।

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मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखना:-

उर्वरकों का उपयोग सिंचाई से जुड़ा है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए मिट्टी से वाष्पीकरण को रोकना होता है। अन्यथा फलोत्पादन पर पानी की कमी का प्रतिकूल असर पड़ेगा दूसरी तरफ यदि पौधों/फसलों में उर्वरकों का प्रयोग न किया जाए तो वह पानी का उपयोग किस तरह से करेंगे।

इसके लिए यह आवश्यक है कि बारानी खेती में बुवाई के समय उर्वरक और देशी खाद डाली जाए। परंतु इसकी मात्रा उस क्षेत्र में उपलब्ध पानी की मात्रा पर निर्भर करती हैं। इस तरह यदि फसलों में प्रारंभिक अवस्था में उर्वरक का प्रयोग किया जाए तो बाद में पौधों को इनका पूरा लाभ मिलता है।

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वर्षा जल को एकत्र करना:-

कभी-कभी अत्यधिक वर्षा के कारण शुष्क और अत्यधिक शुष्क क्षेत्रों में मिट्टी पानी को रोक नहीं पाती। फलतः पानी के बहाव के साथ-साथ उपजाऊ मिट्टी बहकर अन्य स्थानों पर चली जाती हैं।

साथ ही उस क्षेत्र को पानी से वंचित होना पड़ता है। अतः इसके बचाव के लिए आवश्यकता से अधिक वर्षा जल को निचले स्थान पर एवं तालाब बना कर इकट्ठा किया जाए तो बाद में फसलों को पानी की कमी होने पर उपयोग में लाया जा सकता है।

निष्कर्ष:-

अंत में यदि उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर बारानी खेती की जाए तो बारानी क्षेत्रों में ली जाने वाली फसलों की उत्पादकता को स्थिर किया जा सकता है और सूखे के समय मनुष्य और पशुओं को प्यास और भुखमरी से बचाया जा सकता है।

प्रस्तुति:-

डॉ. एल. एल. पंवार, एल. के. छाता एवं डॉक्टर जे. के. बालियान, बारानी कृषि अनुसंधान केंद्र,

आरजिया,

भीलवाड़ा (राजस्थान)

स्रोत:-

विश्व कृषि संचार

वर्ष-21,  अंक-01, अगस्त- 2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

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