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बायोचार का फसल उत्पादन में योगदान

Written by bheru lal gaderi

बायोचार (Biochar) उच्च कार्बन युक्त ठोस पदार्थ है। वह उच्च तापमान पर तैयार किया जाता है, जिसमें ऑक्सीजन अनुपस्थित रहती है या कम मात्रा में होती हैं। यह कहा जा सकता है कि यह एक आंशिक अवायवीय प्रक्रिया है। जिसमें किसी भी कार्बनिक पदार्थ को भिन्न-भिन्न तापमान पर रखकर बायोचार को तैयार किया जाता है। बायोचार एक बहुत ही प्रभावशाली उर्वरक है जो कि अवशिष्ट कार्बनिक पदार्थों की पायरोलिसिस की प्रक्रिया द्वारा तैयार किया जाता है।

बायोचार

यह एक उभरती हुई तकनीक है। जो कि आधुनिक कृषि उत्पादन के लिए अति आवश्यक है। बायोचार मृदा उर्वरक शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ फसल की उत्पादकता को भी बढ़ाता है। यह किसानों के लिए एक बहुत ही किफायती और बहुउपयोगी तकनीक साबित हो चुकी है। बायोचार कृषि के साथ-साथ पर्यावरण की दृष्टि से भी उपयोगी साबित हुआ है। क्योंकि इसके अनेक पर्यावरणीय महत्व है।

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बायोचार की कृषि के क्षेत्र में उपयोगिता:-

मृदा उर्वरता बढ़ाने में:

मृदा की उर्वरा शक्ति बायोचार के द्वारा अलग-अलग प्रकार से बढ़ती है। जैसे की मृदा की नमी को रोकने की क्षमता बढ़ना, मृदा घनत्व कम हो जाना, मृदा के भौतिक रासायनिक एवं जैविक गुणों का बढ़ जाना इत्यादि मापदंडों पर सकारात्मक प्रभाव होता है। और साथ ही साथ के द्वारा उपचारित मृदा की उर्वरा शक्ति अन्य की तुलना में अधिक मापी गई है। वह फसल की उच्च उत्पादन क्षमता को दर्शाता है।

बायोचार की उर्वरा शक्ति उसके तापमान पर आधारित है सामान्यता बायोचार 300, 400, 500, 600, 700, 800 और 1000 डिग्री सेंटीग्रेड पर तैयार किया जाता है। परंतु विभिन्न प्रकार के अनुसंधानों से पता चलता है कि 500- 600 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर तैयार किया गया बायोचार मृदा की उर्वरा शक्ति के लिए ज्यादा प्रभावशाली होता है। क्योंकि इस तापमान पर बायोचार के पोषक तत्व खत्म नहीं होते हैं।

बायोचार के पोषक तत्व उसके आंतरिक गुणों पर निर्भर करते हैं। परंतु जब उसको उच्च तापमान पर तैयार किया जाता है तो उसके पोषक तत्वों में कमी आ जाती है। इसलिए 500-600 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर तैयार किया गया बायोचार कृषि उपयोग के लिए उच्च कोटि का माना जाता है।

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सूक्ष्म जीवों का वासस्थान:-

बायोचार का उपयोग मृदा में लगा उपयोगी सूक्ष्मजीवों की संख्या को बढ़ाने में बहुत ही मददगार साबित हो चुका है क्योंकि इसकी छिद्रयुक्त आंतरिक संरचना सूक्ष्मजीवों के वास स्थान और जनन के लिए बहुत ही उपयोगी होती है।

मृदा में उपस्थित अनेक प्रकार के जीव जैसे कि निमेटोड, प्रोटोजोआ और अन्य मृदा जीव उन सभी कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीवों को अपनी खाद्य श्रंखला का हिस्सा बना लेते हैं जिससे की मृदा की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है जिसके फलस्वरुप फसल उत्पादन कम हो जाता है और साथ ही साथ मृदा में सूक्ष्मजैव विविधता भी घट जाती है।

फसल उत्पादन क्षमता:-

अनेक प्रकार के अनुसंधानों से पता चला है कि बायोचार एक बहुउपयोगी उर्वरक है। जो उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिससे किसानों की आय बढ़ती है और साथ ही साथ पर्यावरण सुरक्षित रहता है। यह मृदा सूक्ष्मजीवों के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करता हैं।

फसल की कार्यिक अवस्था से लेकर उसके परिपक्व होने तक महत्वपूर्ण योगदान देता है। फसल को मौसम के अनुकूल बनाता है तथा फसल अपने कार्यिक अवस्था में ही उच्च स्तरीय वृद्धि को दर्शाती है। जिसमें कि पौधे की जड़ से लेकर तना स्तंभ तक सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।

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मृदा पोषक तत्वों के हास्य में सुधार:-

मृदा में बायोचार का उपयोग करने से मृदा बनावट, छिद्रण, कण आकार, वितरण और घनत्व प्रभावित होता है। बायोचार का उपयोग मृदा की उर्वरता को कम कर रहा है। इसके अलावा मृदा की विद्युत चालकता धनायन विनिमय क्षमता को बढ़ाता है।

मिट्टी की अम्लता के बढ़ने से बायोचार की उपयोगिता मृदा में पोषक तत्व की उपलब्धता को पूरा करता है। वह मृदा में पोषक तत्वों की कमी को दूर करता है। बायोचार मृदा कणों से बंधे रहते हैं, इस प्रकार मृदा में बायोचार 100 से 1000 वर्ष तक उपस्थित रह सकता है, जोकि मृदा की उर्वरा शक्ति को दर्शाता है।

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि बायोचार 100 से 1000 वर्ष तक उपस्थित रह सकता है, जोकि मृदा की उर्वरा शक्ति को दर्शाता है। बायोचार 100 से 1000 वर्षों तक पोषक तत्वो को अपने अंदर समाहित कर सकता है एवं मृदा को एक लंबे समय तक उपजाऊ बना सकता है।

बायोचार के रूप में कृषि अपशिष्ट का उपयोग:-

विश्व में प्रत्येक वर्ष मिलियन टन के हिसाब से कृषि अवशिष्ट निकलता है जिसको कि ज्यादातर देशों में आग के द्वारा जला दिया जाता है। वह बाद में एक अनावश्यक उत्पाद के रुप में प्राप्त होता है, क्योंकि उसके ज्यादातर पोषक तत्व वाष्पीकृत हो जाते हैं कुछ मात्रा में कार्बन एवं अन्य तत्व शेष बचते हैं।

बायोचार आधारित कृषि पर्यावरणीय स्वच्छता कृषि पर आधारित है, लेकिन भारत में इस तकनीकी के अभाव में किसान कृषि अपशिष्ट को जिसके द्वारा पर्यावरण भी प्रभावित होता है और जिस अवशिष्ट को जानकारी के अभाव में जलाया जाता है, उसको बायोचार के रूप में अच्छी फसल उत्पादन लेने के लिए कृषि में प्रयोग किया जा सकता हैं।

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रासायनिक उर्वरक के उपयोग में कमी :-

इसके प्रयोग से विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरक के प्रयोग से बचा जा सकता है वह कृषि मृदा के लिए बहुत हानिकारक होते हैं इस प्रकार से अच्छी फसल प्राप्त करके अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है। दिन पर दिन रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से मृदा के भौतिक, रासायनिक और साथ-साथ जैविक गुणों पर भी नकारात्मक प्रभाव होता है जिससे कि मृदा की उर्वरता आंशिक अथवा पूर्ण रूप से प्रभावित होती है। जिससे कि फसल का उत्पादन कम हो जाता है इसलिए किसानों की आय भी प्रभावित होती है।

यदि वर्तमान में कृषि फसल उत्पादन को देखते हैं तो 15 वर्ष पहले की उत्पादन याद आती है जो कि वर्तमान दर से लगभग 2 गुना ज्यादा होती थी। इसलिए किसान का जीवन भी खुशहाल था परंतु आज में दिन-प्रतिदिन अच्छे उत्पादन की लालसा अपने किसानों को विभिन्न प्रकार के रासायनिक गुणों का उपयोग करने के लिए मजबूर कर दिया है, जिसके परिणाम आज हमारे सामने हैं।

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प्रस्तुति:-

डॉ. पार्वती दीवान, असिस्टेंट प्रोफेसर,

डॉ. दिनेश कुमार यादव, प्रोफेसर एवं प्रभारी अधिकारी,

कृषि अनुसंधान उप केंद्र, गोनेड़ा-कोटपूतली,

डॉ. राजहंस वर्मा असिस्टेंट प्रोफेसर,

श्री कर्ण नरेंद्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर, जयपुर (राज.)

स्रोत:-

विश्व कृषि संचार

वर्ष -20, अंक-12, मई-2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

मोब. नो.- 9425081638

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