बाजरा उत्पादन की वैज्ञानिक खेती एवं उन्नत पद्धति

By | 2017-07-02

अनाज वाली फसलों में से बाजरा की फसल सूखा सहन करने की सर्वाधिक क्षमता रखती हैं। बाजरा के इस गुणधर्म के कारण कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती मुख्यतः दाने एवं पशु चारे के लिए की जाती हैं। बाजरा की फसल वृद्धि के लिए शुष्क एवं गर्म जलवायु की आवश्यकता होती हैं। इसकी वृद्धि एवं विकास के लिए 28 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती हैं।

बाजरा की फसल

राजस्थान प्रदेश बाजरा उत्पादन में अग्रणी हैं। जो भारत में कुल बाजरा उत्पादन का 47% एवं कुल उत्पादन का 32% उत्पादन करता हैं। बाजरा की खेती पूर्णतया वर्षा पर आधारित हैं, जो वर्षा की अनियमितता, देरी, अतिवृष्टि एवं अनावृष्टि से प्रभावित होती हैं। इन्ही समस्याओं को ध्यान में रखकर बाजरा की खेती करनी चाहिए। जिससे उत्पादन बढ़ाने की अपार संभावनाए हैं।

भूमि एवं उसकी तैयारी :-

बाजरा की खेती कई प्रकार की भूमि में की जाती हैं लेकिन इसके लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती हैं। ग्रीष्मकाल में गहरी जुताई करें। उपलब्ध होने पर 20-22 टन गोबर की अच्छी पकी हुई खाद पहली जुताई के समय खेत में डालें। अच्छी वर्षा होने के बाद 2-3 बार हेरो चलाकर खेत तैयार करें। एवं भूमि को समतल करें जिससे वर्षाकाल में जल का निकास अच्छी तरह से हो सकें।

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भूमि उपचार :-

खेत में दीमक की समस्या हो तो अंतिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5% चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव कर मिट्टी में मिलायें।

बाजरा की उन्नत किस्में :-

अधिक पैदावार के लिए बाजरा की संकर एवं संकुल किस्मों के प्रमाणित बीजो का प्रयोग करें। संकर का बीज प्रत्येक साल बदले जिससे अच्छी पैदावार मिल सके। प्रमुख किस्मों का विवरण सरणी में दिया जा रहा हैं। इनके अलावा कुछ प्राइवेट कंपनियों के बीज भी अच्छे आते हैं जो अच्छा उत्पादन देते हैं जैसे महिको, रासी, पाइनियर एवं जे. के. आदि।

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बीजोपचार :-

वर्तमान समय में ज्यादातर बीज उपचारित होते हैं फिर भी यदि उपचारित न होतो निम्न प्रकार से बीजों को उपचारित कर बोये जिससे ज्यादा से ज्यादा उत्पादन लिया जा सके। बीज जनित रोगो से बचाव के लिए ३ ग्राम थाइरम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करे। हरित बाली रोग से बचाव के लिए एप्रोन एसडी ३५ फफूंदनाशक दवा ६ ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें जिससे १५-२० किलो नत्रजन एवं फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की मात्रा बच जाती हैं।

बीज दर एवं बुवाई:-

वैज्ञानिकों द्धारा बाजरा का 4-5 किलो बीज प्रति हेक्टेयर सिफारिश किया जाता हैं। बाजरा की बुवाई कतारों में करनी चाहिए जो बहुत  लाभकारी होती हैं एवं कतारों में बुवाई से फसल को कम पानी की आवश्यकता होती हैं तथा पोषक तत्व भी सही मात्रा में पौधे को  उपलब्ध होते हैं। बुवाई 45 सेमी. कतार से कतार की दुरी और 10-12 सेमि. पौधे से पौधे की दुरी रखनी चाहिए तथा 2-3 सेमी. गहराई पर बुवाई करें। इस प्रकार पौने दो लाख से दो लाख पौधे प्रति हेक्टेयर होने चाहिए।

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बुवाई का समय:-

बाजरा की बुवाई जून से जुलाई माह में की जाती हैं जो वर्षा पर निर्भर है। उपयुक्त समय 15 जून से 15 जुलाई है। अतः जून के माह में अच्छी वर्षा होने के अवसर पर बुवाई कर देनी चाहिए। यदि वर्षा देरी से या लगातार भारी वर्षा हो तो ऐसी स्थिति में बाजरा की सीधी बुवाई न कर पौध तैयार कर मुख्य खेत में रोपित किया जा सकता है।

रोपण:-

एक हेक्टेयर क्षेत्र में रोपण के लिए पौधे तैयार करने हेतु लगभग 2 किग्रा. बीज 500-600 वर्गमीटर उठी हुई क्यारियों में बोते है। नर्सरी से 2-3 सप्ताह बाद पौधों को सावधानी पूर्वक उखाड़ कर जुलाई के तीसरे सप्ताह तक मुख्य खेत में रोपाई कर दें। रोपाई यथा संभव वर्षा वाले दिनों में करें।

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पोषक तत्व प्रबंधन

बाजरा की खेती हल्की भूमि में की जाती हैं। अतः 10-15 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर उपयोग में ली जानी चाहिए। रासायनिक खादों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के बाद ही करना चाहिए।  अनुमान के अनुसार 80-90 किलोग्राम नत्रजन एवं 30 किलोग्राम फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।इन तत्वों की पूर्ति के लिए बुवाई से पहले 65 किलोग्राम डीएपी, 40 किलोग्राम यूरिया या 190 किलोग्राम एसएसपी व 65 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से 8-10 से.मी. गहरा प्रयोग करना चाहिए।

कम वर्षा वाले क्षेत्रो में उपरोक्त मात्राओं की आधी दर से उर्वरक प्रयोग करना चाहिए। जिंक की कमी वाले क्षेत्रो में 25 किलोग्राम जिंकसल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के पहले भूमि में अंतिम जुताई के समय जमीन में मिलाना चाहिए। यदि रबी फसल में फॉस्फोरस दिया गया है तो बाजरे में देने की आवश्यकता नहीं है। सूखा वाली स्थिति में यूरिया का ३ प्रतिशत घोल बनाकर फसल पर छिड़कना लाभकारी पाया गया है। जिंक की कमी होने पर यूरिया के घोल के साथ 0.5 प्रतिशत की दर से जिंक का छिड़काव करना चाहिए।

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निराई-गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण:-

फसल की बुवाई के बाद एक माह तक खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। इसके लिए बाजरा की शुद्ध फसल में बुवाई के बाद एवं अंकुरण से पहले एट्राजिन 0.5 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 007-800लीटर पानी में घोल बनाकर भूमि पर छिड़काव करना चाहिए। बुवाई के 30-35 दिन बाद निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकलना आवश्यक है। रुखड़ी नियंत्रण के लिए 2.5 किलोग्राम 2-4, डी सोडियम लवण 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 3-4 सप्ताह बाद छिड़काव करें एवं दवा को 1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर 8-10 दिन के अंतराल से दुबारा छिड़काव करें। तथा मिश्रित फसल में खरपतवार नाशकों का प्रयोग न करें।

सिंचाई प्रबंधन:-

बाजरा की फसल में अच्छी पैदावार लेने हेतु फुटन अवस्था, सिट्टे लिकलते समय एवं दाना बनते समय पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। अतः वर्षा का आभाव हो तो इन क्रांतिक अवस्थाओं पर पर्याप्त सिंचाई जल की व्यवस्था करनी आवश्यक है।

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थायोयूरिया का प्रयोग:-

बाजरा की फसल में थायोयूरिया जो एक पादप वृद्धि नियामक है का ०.१ का घोल १ ग्राम थायोयूरिया लीटर पानी का घोल बनाकर बुवाई के ३०-३५ दिन बाद एवं सिट्टे बनते समय दूसरा छिड़काव करने से उपज में १०-१५% वृद्धि बढ़ाई जा सकती है। इससे फसल में सूखा सहन करने की क्षमता में वृद्धि होती है।

प्रमुख रोग एवं कीट प्रबंधन बाजरा की फसल में :-

हरित बाली रोग:-

रोग रोधी किस्म बोये बीज को ऐस्प्रों एस -डी-35 दवा 6 ग्राम प्रति किलो की दर से उपचारित करके बोयें। खड़ी फसल में रोग दिखने पर बुवाई के 21 दिन बाद मेंकोजेब 2-2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें।

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अरगट रोग:-

सिट्टे बनते समय मेंकोजेब 2-2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें  अरगट ग्रसित दानों को 20 प्रतिशत ढोल में 5 मिनट तक डुबोकर रखें।

कातरा नियंत्रण:-

वर्षा के प्रारम्भ होते ही कातरे के पतंगों का जमीन से निकलना शुरू हो जाता है। इन पतंगो को प्रकाश पाश का प्रयोग कर नष्ट कर देना चाहिए जिससे लट का प्रकोप कम हो जाता है। तथा कातरे की लट का नियंत्रण के लिए मिथायल पैराथियान 2 प्रतिशत या मेलाथियान 5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। अन्यथा क्यूनालाफॉस  25 ई. सी. 625 मिलीलीटर या क्लोरोपेरिफॉस 20 ई.सी. एक लीटर या मिथायल पैराथियान 750 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

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सफेद लट:-

मानसून की वर्षा शुरू होते ही जमीन से भृंगों का निकलना शुरू हो जाता है। भृंग रात के समय परपोषी वृक्षों जैसे खेजड़ी, नीम, बेर आदि पर आते है। ऐसे वृक्षों पर मोनोक्रोटोफॉस 36 डब्ल्यू. एस. सी. 25 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए फेरमोनट्रेप  का प्रयोग करें।

रूट बग:-

रूट बग का प्रकोप देखते ही 25 किलो क्यूनोलोफॉस 1.5 प्रतिशत का प्रयोग करें।

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बाजरा की उन्नत किस्में

किस्म

पकने की

अवधि(दिन)

औसत पैदावार (क्विं./हेक्टेयर)

अन्य विशेषताएं

आई.सी.एम.एच. – 356 68-75 20-26 सूखे के लिए मध्यम सहनशील,

हरित बाली रोग रोधी

आई.सी.टी.पी. – 8503 70-75 15-20 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी
राज – 171 80-85 22-25 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी
आर.एच.बी. – 121 75-80 20-25 संकर किस्म, दाना पीला सलेटी व घोल
आर.एच. – 179 80-85 15-20 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी
आर.एच.बी. – 90 75-80 20-25 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी
आर.एच.बी. – 58 75-80 20-27 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी
आर.एच.बी. – 30 70-75 20-25 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी
डब्ल्यू.सी.सी. – 75 85-90 18-20 सूखे के लिए मध्यम सहनशील ,तुलसिता, अरगट व कंडवा रोग रोधी
एच.एच.बी.(इम्प्रवूड) – 67 65-70 25-30 तुलसिता रोग रोधी
आर.एच.बी. – 173 78-80 30-33 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी
आर.एच.बी. – 154 72-73 23-29 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी
आर.एच.बी. – 177 74 18-20 सूखे के लिए मध्यम सहनशील, हरित बाली रोग रोधी

 

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