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बागवानी से साकार कर रहे किसान अपने सपने

बागवानी
Written by bheru lal gaderi

जालोर के किसानों ने सपने में भी रेट के धोरो में खजूर, अनार जैसे फल एवं सब्जियों के उत्पादन की कल्पना नहीं की थी। परम्परागत खेती करने वाले किसानों ने जलवायु में परिवर्तन देख वक्त की नजाकत को समझा और बागवानी करने की ठान ली। परिणाम अच्छे रहे और बदलाव की बयार चल पड़ी। अब जिले के दर्जनों किसान साढ़े तीन हजार हेक्टेयर में बागवानी कर रहें हैं। ऐसी ही एक किसान हैं देशु देवी जो अपने पति के साथ मिलकर खजूर से सालाना लाखों की आय कमा रही हैं। वे तकनीक के इस्तेमाल में भी किसानों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन चुकी हैं। 

बागवानी

बागोड़ा उपखण्ड के चेनपुरा गांव की देशु देवी और उनके पति वेनाराम चौधरी बीते कई वर्षों से अरंडी, इसबगोल, जीरा, सरसों जैसी परम्परागत फसले लिया करते थे। जलवायु परिवर्तन की स्थितियाँ बनी तो इन फसलों में घाटा भी होने लगा। ऐसे में किसान ने कृषि विभाग से जानकारी लेकर कुछ साल पहले प्रयोग के तोर पर खजूर की खेती करना शुरू किया। उन्होंने तीन बीघा क्षेत्र में खजूर के 156 पौधे लगाए, जिस पर उन्हें सरकार से अनुदान भी मिला। किसान परिवार की मेहनत सफल हुई और खजूर के पौधे पेड़ बनकर  फल देने लगे। आज वे इन पौधों से सालाना 10 से 15लाख रूपये कमा रहे हैं। इस साल खजूर से वे अभी तक 2,35,00 रूपये की आय कमा चुकी हैं।

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80 साल तक मिलता हैं फल

वेनाराम ने बताया की उन्होंने फार्म हॉउस पर बरही खजूर के पौधे लगा रखे हैं। यह किस्म पांच वर्ष बाद फल देना शुरू करती हैं, जो 80 वर्ष तक जारी रहता हैं। पिले रंग का यह फल मीठा और स्वादिष्ट होता हैं। इसके एक पौधे से40 किलो से 350 किलो तक फल प्राप्त होता हैं। इसके अलावा किसान ने करीब तीन साल पहले पॉलीहाउस लगाकर बागवानी की प्रायोगिक शरुआत की। उन्हें सफलता मिली और वे अब ग्रीन हॉउस में खीरा, टमाटर, बेंगन, प्याज आदि सब्जियों की पैदावार ले रही हैं।

नवाचार के इच्छुक किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन रही एक महिला किसान

  • परम्परागत खेती से हो रहा मोहभंग
  • रेत के धोरो में फल- सब्जियों का उत्पादन
  • खजूर से होती हैं सालाना 15 लाख रूपये तक की आय
  • किसान ने पहले आजमाया, सफलता मिलने पर किया विस्तार

बागवानी में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल

वर्षा जल संरक्षण के लिए खेत में तलाई

वर्षा जल के हर सम्भव इस्तेमाल के लिए किसान ने अपने खेत में तलाई बनवाई। इसमें 500 माइक्रोन पॉलीशीट के इस्तेमाल से जल को संग्रहीत किया जाता हैं और बाद में इसी पानी से सिंचाई की जाती हैं।

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ग्रीनहाउस में ऑटोमेशन सयंत्र

किसान दम्पत्ति ग्रीनहाउस में फसलों का उत्पादन ले रहे हैं। ये हॉउस फोगर्स व माइक्रो स्प्रिंकलर ऑटोमेशन पद्धति से जुड़े हैं। ऑटोमेशन सयंत्र में फोगर्स और मिनी स्प्रिंकलर चलाने का समय निश्चित कर दिया हैं। फसल की जरूरत और वातावरण के अनुसार दोनों सिंचाई प्रणालिया स्वतः ही शुरू और बंद हो जाती  हैं। वही खुले में फसल की सिंचाई के लिए वे सोर ऊर्जा चलित पंप का इस्तेमाल करते हैं।

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कार्बनिक खाद प्रणाली का इस्तेमाल

फसलों में खाद पहुंचाने के लिए वे तरल कार्बनिक खाद प्रणाली का इस्तेमाल करती हैं। बकरी की गोबर खाद को अच्छे से सड़ाकर अर्क के रूप में फिलटर किया जाता हैं। इससे प्राप्त तरल कार्बनिक खाद को फिर से छान कर ड्रिप सिंचाई के जरिए फसल तक पहुचाया जाता हैं। किसान दम्पत्ति वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाकर भी इस्तेमाल करता हैं। इसके प्रयोग से सब्जियों की जैविक बढ़वार अच्छे से हुई हैं।

राज्य स्तर पर मिल चूका हैं सम्मान

किसान देसु देवी चौधरी कृषि के उन्नत तरिके और नवाचारों को लेकर चर्चा में बनी रहती हैं। कृषि में अपने प्रयासों की बदौलत वे वर्ष 2015-16 के लिए राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित हो चुकी हैं।

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स्त्रोत:- राजस्थान पत्रिका

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