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बाईपास वसा की डेयरी पशुओं में उपयोगिता

बाईपास वसा
Written by bheru lal gaderi

विकासशील देशों में अधिक दूध देने वाले दुधारू पशुओं के आहार में कई पोषक तत्वों की कमी पाई जाती है। अधिक दूध देने वाले पशुओं के क्षमता अनुरूप दूध उत्पादन न करने का एक मुख्य कारण अपर्याप्त पाचनीय ग्रहण है, जिसका उनके दूध उत्पादन एवं अन्य शारीरिक क्षमताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पशु आहार में ऊर्जा घनत्व की प्राय कमी होती हैं। इस कमी को अधिक मात्रा में अनाज उपलब्ध का वितरण कर पूरा किया जा सकता है। बाईपास वसा खिलाने से पशुओं के ऊर्जा संतुलन में वृद्धि होती हैं जिससे कि उसकी प्रजनन क्षमता में भी वृद्धि होती है। स्टेपल्स एवं सहयोगी (1997) के अनुसार बाईपास वसा (Bypass Vasa) खिलाने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ती हैं और जिससे प्लाज्मा प्रोजेस्ट्रोन की मात्रा बढ़ती है जो कि पशुओं की प्रजनन क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है।

बाईपास वसा

Image Credit- livestocksupplies.co.uk

लेकिन इसका पशु में कुल शुष्क पदार्थ ग्रहण, रेशा पाचन एवं दुग्ध वसा पर नकारात्मक प्रभाव होता है। इसका एक मुख्य कारण है अधिक ऊर्जा घनत्व वाले दाने की सीमित उपलब्धता। एस. के. रंजन के अनुसार वर्ष 2006-07 में पशुओं के लिए जाने की विकासशील देशों में बढ़ती आबादी की खाद्य आवश्यकता को देखते हुए आने वाले समय में भी इस कमी को दूर कर पाना संभव कार्य नहीं है।

पशु पोषण वैज्ञानिक दुधारू पशुओं के आहार में ऊर्जा घनत्व बढ़ाने के लिए वसा के प्रयोग में अनुसंधान कर रहे हैं। रोमन्थी पशुओं का वसा स्रोत मुख्यत पेड़ पौधे एवं उनके उत्पाद होते हैं।

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इस पादप वसा में ग्लाइकोलिपीड्स मुख्य रूप से पाया जाता है और इसके वसीय अम्लों में 96% लिनोलिक,  2%  लिनोलिक एवं 2% पामिटिक वसा अम्ल होते हैं।

ये सभी वसा अम्ल असंतृप्त होते हैं। रोमन्थ में, किण्वन प्रक्रिया के प्रथम चरण में सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा वसा का इनके अवशेषों में जल अपघटन (Hydroysis) होता है। दूसरे चरण में इन असंतृप्त वसा अम्लों का हाइड्रोजन की उपस्थिति में जैविक सशक्तिकरण (Biohydrogenation) होता है।

सामान्यरूप, से दुधारू पशुओं के आहार में वसा की मात्रा 3.0 से 3.5% से अधिक नहीं बढ़ा सकते हैं। क्योंकि अधिक वसा वाले आहार का रोमन्थ की किण्वन प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अधिक वसा रेशे वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं के लिए विषाक्त होता है। रोमंथ में रहने वाले तथा अन्य खाद्य पदार्थों का सामान्य रूप से किण्वन न हो पाने के कारण पशुओं में शुष्क पदार्थ ग्रहण करने की क्षमता तथा दुग्ध उत्पादन क्षमता कम हो जाती है।

इस प्रकार दुधारू पशुओं के आहार में वसा को उसके स्वभाविक रुप में मिलाकर यदि उसे संरक्षित करके मिलाएं तो अधिक वसा के कारण रोमन की सामान्य प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका कारण है कि संरक्षित या बाईपास वसा रोमन्थ में निष्क्रिय रहेगा अर्थात उस का विघटन आदि नहीं होगा जिससे कि सूक्ष्म जीवों की प्रक्रिया सामान्य रूप से चलती रहेगी।

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वसा को संरक्षित करने की विधियां

खाद्य को संरक्षित करने की अनेक विधियां विकसित की गई है। इसमें वसा को इस प्रकार संरक्षित करते हैं कि इसका रोमन्थ में वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल में जल अपघटन एवं जैविक संतृप्तीकरण की प्रक्रिया न हो। इस प्रकार बाईपास वसा के रोमन्थ से छोटी आंत में बिना किसी अपघटन के पहुंच जाने से रोमन्थ के सूक्ष्मजीवी वातावरण पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित विभिन्न प्रकार के संरक्षित (बाईपास) अनुसार निम्न प्रकार हैं:-

क्रिस्टलीय दानेदार वसा

यह संतृप्त व असंतृप्त वसा का मिश्रण होता है। इसका गलनांक अधिक होता है अर्थात यह अधिक तापमान पर पिघलता है और रोमन्थ के सामान्य तापमान पर इनका अपघटन नहीं हो पाता है और यह संरक्षित रूप से छोटी आत में पहुंच जाते हैं।

फार्मेल्डिहाइड उपचार वसा

इसमें वसा खाल फॉर्मेल्डिहाइड से उपचारित करने पर प्रोटीन वसा को पूरी तरह से ढक लेता है और रोमन्थ को वातावरण में इसका सामान्य किण्वन नहीं हो पाता है।

प्रिल्ड वसा अम्ल

इसमें वसा अम्लों (जिसमें संतृप्त वसा अम्ल अधिक हो) के मिश्रण को एक निश्चित दाब के साथ किसी ठंडे वातावरण में स्प्रे करते हैं तो इससे सूखी हुई प्रिल्ड वसा अम्ल प्राप्त होते हैं, जो कि रोमन्थ के वातावरण में निष्क्रिय होते हैं।

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वसा अम्लों के कैल्शियम लवण

इन सभी विधियों में वसा अम्लों के कैल्शियम अधिक प्रभावी एवं उपयोगी हैं। इन्हें बनाने की दो प्रमुख विधियां है।

संयोजन विधि

इस विधि में तेल एवं वसा अम्लों को उत्प्रेरक की उपस्थिति में, एक बंद बर्तन में आवश्यक तापमान एवं दाब पर कैल्शियम ऑक्साइड या कैल्शियम हाइड्रोक्साइड के साथ गर्म करते हैं व वसा अम्लों के प्राप्त होते हैं

डबल डीकंपोजीशन विधि

वसा की मात्रा को एक धातु के बर्तन में गर्म करते हैं। अब पिघली हुई वसा को किसी वस्तु से लगा कर हिलाते हुए उसमें सोडियम हाइड्रोक्साइड को तब तक मिलाते हैं जब तक वसा अम्ल पूरी तरह धूल नहीं चाहता। इसका मतलब अब साबुनीकरण प्रक्रिया पूरी हो गई। अब आंच देना बंद कर देते हैं। और सोडियम सौप को लगातार हिलाते हुए कैल्शियम क्लोराइड को धीरे-धीरे मिलाते हैं जिससे वसा अम्लों के कैल्शियम क्लोराइड बन जाते हैं। अधिक पानी को छानकर हटा देते हैं तथा इस कैल्शियम लवण को कम ताप पर सुखाकर पीस लेते हैं तथा इसका प्रयोग बाईपास वसा के रूप में करते हैं।

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दुधारू पशुओं के दूध एवं अन्य उत्पादन क्षमता पर बाईपास वसा का प्रभाव

विज्ञानिकों ने बाईपास का दूध एवं उत्पादन क्षमता पर अध्ययन किया है। बाईपास वसा को दैनिक पशु आहार में सम्मिलित करने पर दूध की मात्रा एवं वसा दोनों में वृद्धि होती हैं। गर्ग एवं सहयोगी (2003) तथा मिश्रा एवं ठाकुर (1999) दुधारू पशुओं पर बाईपास वसा का प्रभाव देखा एवं बताया की इससे दुग्ध मात्रा एवं वसा दोनों में वृद्धि हुई। पुरुषोत्तम 2004 में संकरित गायों में पाम वसीय अम्लों के खिलाने पर 4% FCM में प्रभावी वृद्धि बताई। बिसेन (2004) ने दुधारू बकरी में वसा अम्लों के कैल्शियम लवणों का प्रभाव देखा एवं बताया की इससे दूध की मात्रा एवं दुग्ध वसा प्रभावी ढंग से बढ़ता है, जबकि दूध प्रोटीन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और कुछ माध्यमिक वसा अम्लों की मात्रा कम होती है। सिरोही एवं वली (2005) ने संकरित गायों को 300 ग्राम प्रति दिन बाईपास वसा खिलने पर प्रभावी वृद्धि देखी गई।

इससे दूध उत्पादन 11.40 किलोग्राम प्रति दिन पाया गया। केलिन एवं सहयोगी (1989) ने पाया कि क्रिस्टलीय वसा को आहार में सम्मिलित करने पर दूध वसा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता जब की C8-C16  वसा अम्लों की मात्रा कम होती है तथा स्टीरिक एवं ओलिक अम्लों की मात्रा बढ़ती है।

शिंग फिल्ड एवं सहयोगी (2004) के अनुसार दुधारू पशुओं को बाईपास संयुक्त लिनोलिक अम्ल (CLA- 10 एवं सीस- 12) का मिश्रण खिलाने से दूध में वसा की कम मात्रा पाई गई और दूध उत्पादन क्षमता में प्रभावी वृद्धि देखी गई। एक अन्य प्रयोग में बाईपास CLA (10 ग्रा।/ दिन ट्रांस एवं सीस-12 आइसोमोर का मिश्रण) को 15 दिन तक जाफराबादी भैंस को खिलाने पर दूध वसा में 27% की कमी तथा दूध की मात्रा में 22% की वृद्धि पाई गई।

बाईपास वसा खिलाने से पशुओं के ऊर्जा संतुलन में वृद्धि होती हैं जिससे कि उसकी प्रजनन क्षमता में भी वृद्धि होती है। स्टेपल्स एवं सहयोगी (1997) के अनुसार बाईपास वसा खिलाने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ती हैं और जिससे प्लाज्मा प्रोजेस्ट्रोन की मात्रा बढ़ती है जो कि पशुओं की प्रजनन क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है।

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बाईपास वसा खिलाने के फायदे

  • दूध काल के प्रथम चरण में खिलाने से पशुओं की ऊर्जा की आवश्यकता आसानी से पूरी हो जाती हैं। कीटोसिस के लक्षण भी नहीं आते।
  • दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होती हैं।
  • आवश्यक वसीय अम्लों की मात्रा दुग्ध एवं मांस में बढ़ाई जा सकती है।
  • पशुओं की प्रजनन क्षमता में सकारात्मक वृद्धि होती हैं तथा पशु समय से गर्मी में आते हैं।

इस प्रकार देखते हैं कि पशुओं की दूध एवं अन्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने में बाईपास वसा कारगर रूप से उपयोगी हैं। अब यहां पर आवश्यकता इस बात की है कि इस तकनीक को और सरल तरीके से विकसित करके किसानों के लिए उपयोगी बनाया जाए बाईपास वसा बनाने के लिए व्यवहारिक रूप से प्रयोग में आने वाले वसा स्रोत के साथ-साथ बहुत से अव्यवहारिक खाद्य/ अखाद्य वसा स्रोत का भी प्रयोग हो सकता है। इस क्षेत्र में आगे के अनुसंधान के लिए अन्य अव्यवहारिक वसा स्रोतों को संरक्षित करके उसका दूध एवं अन्य उत्पादन क्षमता पर प्रभाव देखने की आवश्यकता है।

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Author:-

महेंद्र सिंह मनोहर

जोबनेर

साभार :-

कृषि भारती

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