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फूलगोभी की उन्नत खेती और उत्पादन तकनीक

फूलगोभी की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

फूलगोभी (Cauliflower) का उत्पादन एवं उपलब्धता भारत में पुरे वर्ष भर रहती हैं और यह भारत की एक प्रमुख फसल हैं।

फूल गोभी की उन्नत खेती

फूलगोभी की प्रमुख उन्नत किस्में

अगेती किस्में

पूसा दीपाली, अर्ली कुंवारी, अर्ली पटना, पंत गोभी-2, पंत गोभी-3, पूसा कार्तिकी, पूसा सिंथेटिक, सेल-327, सेल-328 आदि।

मध्य किस्में

पंत शुभ्रा, कल्याणपुर, मध्यम, इम्प्रुण्ड जापानीज,  हिसार-114, एस-1, नरेंद्र गोभी-1, पंजाब जाएंट, अर्लीस्नोबॉल-2, पूसा हाइब्रिड   इत्यादि।

पिछेती किस्में

स्नोबॉल-16, पूसा स्नोबॉल-1, के-1,दानिया, स्नैकिंग, पूसा सिंथेटिक विश्वभारती इत्यादि।

खेत का चयन एवं तैयारी

फूलगोभी की अगेती फसल के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी तथा पिछेती के लिए दोमट या चिकनी मिट्टी में अच्छी होती हैं। खेत की तैयारी भली भांति जुताई करके एवं पाटा चलाकर कर लेना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

फूलगोभी अगेती फसल की अपेक्षा फसल में खाद एवं उर्वरकों की अधिक आवश्यकता होती हैं। फूलगोभी की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए प्रति हेक्टेयर 300 क्विंटल गोबर की खाद, 120 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फास्फोरस तथा 60 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता होती हैं। गोबर की खाद को रोपाई से पूर्व खेत में डालकर भली भांति मिला देना चाहिए।

पौध तैयार करना

2.5X1.0 मीटर की सात क्यारियों में लगभग 200 ग्राम बीज बोया जा सकता हैं। क्यारियाँ 15 सेमी. ऊँची बनानी चाहिए। क्यारियों के लगभग 8 सेमी. ऊपरी सतह गोबर की सड़ी खाद पर्याप्त मात्रा मिलाना आवश्यक हैं तथा खाद मिलाने के बाद क्यारी को समतल कर लेना चाहिए। बीज 2.5 से 5.0 सेमी. की कतारों में बोना चाहिए।

प्रजाति का नाम

अवधि (दिनों में) बुवाई का समय बीज की मात्रा ग्राम/हेक्टेयर

  उपज क्विंटल/हैक्टेयर

अगेती किस्में

60-80 मध्य जून से जुलाई प्रथम सप्ताह 600-700 100
मध्य किस्में

90-100

मध्य अगस्त               –

200-300

पिछेती किस्में

100-120

अक्टूबर

400-500

200-300

 

3/4 भाग सड़ी गोबर की खाद एवं 1/4 भाग मिट्टी मिलाकर बीज को ढक देना चाहिए। इसके बाद क्यरियों को दिन में धुप से बचाने के लिए ढकना आवश्यक हैं।

तैयार खेत में बुवाई

अगेती किस्म

पंक्ति से पंक्ति की दुरी 45 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 45 से.मी.

पिछेती किस्में

पंक्ति से पंक्ति की दुरी 60 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 60 से.मी.

सिंचाई

दोमट भूमि में अगेती किस्मों में 5-6 दिनों के अंतर से तथा पिछेती किस्मों में पहली सिंचाई पौध रोपण के तुरंत बाद करना आवश्यक हैं।

खरपतवार नियंत्रण

फूलगोभी के खेत की उथली गुड़ाई करते रहना चाहिए। ताकि खरपतवार नष्ट हो जाये। गहरी गुड़ाई न करें क्योंकि इससे जड़ों के कटने का भय रहता हैं। पहली गुड़ाई पौधे जैसे ही भूमि में जम जाये करनी चाहिए। पौध लगाने के 6 सप्ताह बाद पौधे पर मिट्टी चढ़ा देना चाहिए।

फूलगोभी में फसल सुरक्षा

1. रोग नियंत्रण:-

पौध गलन या डम्पिंग ऑफ रोग

इस रोग का जनक पीथियम नामक फफूंद होता हैं। इस रोग के कारण बीज के अंकुरित होते ही पौधे संक्रमित हो जाते हैं। इस अवस्था में अंकुर भूमि से बाहर नहीं निकलता।

नियंत्रण

2-3 ग्राम केप्टान या ब्रेसिकाल प्रति किग्रा. बीज की दर से बोने से पूर्व बीज को शोधित कर लेना चाहिए। फार्मेल्डिहाइड 160-175 मिली. को 2.5 लीटर पानी में मिलाकर प्रति 20 वर्गमीटर भूमि के हिसाब से नर्सरी में भूमि शोधित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त 1 किग्रा. कार्बेन्डाजिम अथवा 2.0 से 2.5 किग्रा. मेंकोजेब या जाइनेब/हैक. की दर से 1000 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। ताकि भूमि तर हो जाए।

जीवाणु काला सड़न या ब्लैक रांट रोग

फूलगोभी एवं बंदगोभी में यह रोग जेंथोमोनास कम्पेस्ट्रिस नामक जीवाणु से उत्पन्न होता हैं। पत्तियों पर सबसे पहले अंग्रेजी के वी आकार के नमी युक्त हरे भाग बनते हैं जो बाद में भूरे तथा कुछ समय बाद काले होकर मुरझा जाते हैं।

नियंत्रण

यह रोग बीज जनित हैं अतः बीज उपचार 10% ब्लीचिंग पाउडर के घोल द्वारा अथवा स्ट्रेप्टोसाइक्लीन या प्लांटोंमाइसीन 100 पी.पी.एम. (एक ग्राम दवा दस लीटर पानी घोलकर) के घोल में बीज डूबा कर उपचार किया जा सकता हैं।

2. किट नियंत्रण:-

गिडार या सुंडी

गोभी कुल की सब्जियों में विभिन्न प्रकार की पत्तियाँ खाने वाली गिडार बहुत हानि पहुंचती हैं। कीटग्रसित पौधों को देखकर झुण्ड में खाने वाली सुंडी जैसे- तम्बाकू की सुंडी या पात गोभी की तितली की सुंडी नष्ट करना चाहिए।

नियंत्रण

इन कीटों के नियंत्रण हेतु 5% मेलाथियान अथवा 10% कार्बारिल धूल का 20-25 किग्रा./हैक. की दर से 2-3 बार प्रकोप अनुसार भुरकाव उस समय करना चाहिए।

कटाई

फूलगोभी की फसल उस समय काटना चाहिए जब फूल उचित आकार के ठोस हो कर परिपक्वता की उचित स्थिति पर पहुंच जाए। फूल को हेड (कार्ड) के काफी निचे से काटा जाता हैं, ताकि ठूंठ का जो भाग हेड से लगा रहें, का परिवहन के दौरान फूल की रक्षा कर सके।

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