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फाइटोरेमेडिएशन जैव निदान – पर्यावरण को साफ करने की एक योजना

फाइटोरेमेडिएशन जैव निदान
Written by bheru lal gaderi

तेज गति से विकास और औद्योगीकरण प्रदूषण की समस्या के लिए मुख्य जिम्मेदार कारक है। विभिन्न प्रदूषकों में, भारी धातुओं के प्रदूषण बहुत गंभीर है। क्योंकि यह बहुत कम सांद्रता में भी विषाक्त होते हैं। सुधार के पारंपरिक तरीके बहुत मुश्किल और व्यवहारिक नहीं है। इस तरह की तकनीकी में लागत और कठिनाइयों के कारण स्वस्थानी विकल्पों में विकास किया है। इसलिए प्रभावी मिट्टी उपचार तकनीकियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। जो मिट्टी से धानुओ को हटाने का प्रयास करती है इस जीव निदान, बायोरेडिएशन और फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremedicine Bio-Diagnosis) विकल्प उपलब्ध है।

Image Credit – commons.wikimedia.org

फाइटोरेमेडिएशन एक व्यापक शब्द है, जिसका प्रयोग वर्ष 1991 से किया जा रहा है। प्रदूषित मिट्टी, भूजल और अन्य दूषित मीडिया में प्रदूषकों की मात्रा, गतिशीलता और विषाक्तता को कम करने के लिए पौधों का उपयोग फाइटोरेमेडिएशन कहलाता है। पौधों के द्वारा धातु, कीटनाशक, खरपतवारनाशक, विस्फोटक और तेल सहित कई प्रकार के पदार्थों से होने वाले प्रदूषण को साफ किया जा सकता है। फाइटोरेमेडिएशन एक गैर विनाशकारी और लगत प्रभावी स्वस्थानी तकनीकी है। जिसका प्रयोग प्रदूषित खेतों की सफाई के लिए किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में तकनीकी संभावना अधिक है। जो पौधे के विकास में सहायक और जीवाणुओं की गतिविधियों को उत्तेजित करती हैं।

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जिन पौधों का उपयोग फाइटोरेमेडिएशन में किया जाता है। आमतौर पर उनका चुनाव निम्न आधार पर किया जाता है:-

  • पौधे की वृद्धि और जैव मात्रा या सहंति (बायोमास) उत्पादन करने की दर।
  • पौधे द्वारा प्रदूषकों को जमा करने और उनके प्रति प्रतिरोध करने की क्षमता।
  • पौधों के जड़ क्षेत्र की गहराई।
  • पौधों द्वारा भूजल को वाष्पोत्सर्जन करने की क्षमता।

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फाइटोरेमेडिएशन में प्रयुक्त पौधे प्रदूषित जगहों से प्रदूषकों को कम, संग्रहित या वाष्पोत्सर्जन करने वाले होने के साथ-साथ अलग-अलग स्थिति की विस्तृत श्रंखलाओं में तेजी से बढ़ने में सक्षम होने चाहिए। इनके उदाहरण सूरजमुखी, सरसों, तंबाकू, राइ, पालक, चिनार के पेड़ और अरबिडोप्सिस प्रजातियां आदि हैं।

पौधों की जड़ें विशाल सतह प्रदान करती हैं जो अन्य गैर- आवश्यक प्रदूषकों के साथ-साथ विकास के लिए आवश्यक पानी और पोषक तत्वों को जमा और अवशोषित करती हैं। पौधों की जड़ें, मिट्टी-जड़  संपर्क में भी बदलाव करती है। क्योंकि ये मूल परिवेश में कार्बनिक और अकार्बनिक यौगिकों (रूट रिसाव) का रिसाव करती हैं। ये जड़ रिसाव जड़ और जड़ के आसपास के क्षेत्र में सूक्ष्मजीवों की संख्या और गतिविधियों को प्रभावित करते हैं और साथ ही मिट्टी कणों का एकत्रीकरण और स्थिरता तथा प्रदूषकों की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं।

पादप उत्तकों के प्रदूषकों का उपापचय क्रियाओं के द्वारा जटिल कार्बनिक अणुओं से सरल अणुओं में अपघटन फाइटोरेमेडिएशन की निम्न प्रक्रियाओं द्वारा होता हैं।

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पादप निष्कासन (फाइटोएक्सट्रेशन)

यह मिट्टी से प्रदूषकों को हटाने की प्रक्रिया है। जिसे पादप संचयन/संग्रहण भी कहा जाता है। जिसमें पौधे जड़ों द्वारा मिट्टी से धातुओं के प्रदूषक पदार्थों का अवशोषण करने के बाद जमीन से ऊपरी भागों में स्थांतरण कर देते हैं। जिससे फसल एवं पादप बायोमास की कटाई के बाद अंतिम निराकरण हो जाता है।

जैसे की सीसा,केडियम, तांबा, निकल अधिक प्रदूषक पदार्थों को पादप निष्कासन द्वारा अस्थाई रूप से मिट्टी से निकाल दिया जाता है। उदाहरण सूरजमुखी और सरसों।

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मूल निस्पंदन (राइजोफिल्ट्रेशन)

मूल निस्पंदन जड़ क्षेत्र के आसपास सतही और अपशिष्ट जल से पौधों की जड़ों द्वारा उचित एवं जोड़ों पर अवक्षेपण प्रदूषित को हटाने की क्रिया के लिए उपयुक्त पौधा तेजी से विषाक्त धातुओं को विलियन से निकलता है। यह प्रक्रिया पारा, केडियम, ताम्बा,निकल, जस्ता और क्रोमियम के लिए इस्तेमाल की जा सकती है, जो मूल रूप  से जड़ों के भीतर धारण किये जाते है। उदाहरण डकवीड, सूरजमुखी, तम्बाकू, राइ, पालक और मक्का।

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पादप वाष्पीकरण (फाइटोवोल्टेलाइजेशन)

पादप वाष्पीकरण में पौधे कार्बनिक प्रदूषक युक्त पानी लेते हैं और प्रदूषक को अपगठन के बाद वाष्प  के रूप में पत्तियों के माध्यम से हवा में छोड़ देते हैं, जो प्रारंभिक प्रदूषक से कम विषैला होता है। चिनार के पेड़, तंबाकू और अरबिडोप्सिस, पारा एवं  जातियों के पौधे सेलेनियम पारा एवं ट्राइक्लोरोथाइलिन के निष्पादन के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

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फाइटोस्टेबिलाइजेशन (पादप स्थिरीकरण)

पादप स्थिरीकरण में जड़ों द्वारा अवशोषण या संचयन ( रूट जोन के भीतर जड़ों पर सोखना) के माध्यम से मिट्टी और पानी में प्रदूषक को स्थिर करने के लिए कुछ पौधों की प्रजातियों का उपयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया प्रदूषण पदार्थ की गतिशीलता को कम और भूजल में प्रवेश को रोकती है। जिससे खाद्य श्रंखला में धातु प्रदूषक की जैव उपलब्धता कम हो जाती हैं। यह सीसा के साथ-साथ आर्सेनिक, करोडियम, तांबा और जस्ता के उपचार के लिए उपयोगी है।

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फाइटोग्रेडेशन/फाइटोट्रांसफॉर्मेशन (पादप अपघटन/पादप परिवर्तन)

पादप अपघटन/पादप परिवर्तन प्रक्रिया में पौधे के द्वारा अवशोषण, उपापचय और दूषित पदार्थों का अपघटन शामिल है। इस में कुछ कार्बनिक दूषित पदार्थों जैसे क्लोरीनयुक्त विलायक और खरपतवार नाशक आदि जो कि m बोतल में मौजूद मिट्टी, तलछट या भूजल में मौजूद हैं को कम किया जाता है।  उदाहरण चिनार के पेड़ आदि।

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जड़ अपघटन/जड़ विघटन (राईजोडीग्रेडेशन)

जड़ क्षेत्र या रेजोरिस्फयर के अंदर प्रदूषकों का टूटना जड़ विघटन कहलाता है। मिट्टी में कार्बनिक प्रदूषक अक्सर सह-उत्पादों में टूट जाते हैं या बुरी तरह से मिट्टी सूक्ष्म जीव द्वारा अकार्बनिक खनिज  उत्पादों में बदल दिया जाता है। जिसके परिणाम स्वरुप कार्बनिक प्रदूषकों के विषहण (डिटॉक्सिफिकेशन) को बढ़ावा मिलता है। पौधों की जड़ों में उपस्थित (अमीनो एसिड, एंजाइम और जड़ रिसाव) अक्सर जड़ों के आसपास के क्षेत्रों में सूक्ष्मजीवों की संख्या और गतिविधियों में वृद्धि करती हैं।

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फाइटोरेमेडिएशन  के लाभ:-

  • फाइटोरेमेडिएशन अन्य पारंपरिक तरीकों की तुलना में एक गैर विनाशकारी और लागत प्रभावी स्वास्थनी तकनीक है।
  • फाइटो रेमेडिएशन पर्यावरण के अनुकूल है क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से उत्पन्न पौधों/जीवो का उपयोग करता है और प्राकृतिक अवस्था में पर्यावरण को बरकरार रखता है।
  • फाइटोरेमेडिएशन को प्रदूषित उथली मिट्टी और भूमिगत जल के उपचार के लिए स्वस्थानी तकनीक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • फाइटो रेमेडिएशन द्वारा न्यूनतम भूमि विघ्न के कारण मिट्टी की उर्वरता और संरचना पर इसका विनाशकारी प्रभाव नहीं होता है।
  • फाइटोरेमेडिएशन में पौधों के उपयोग से मृदा क्षरण और धातुओं का निक्षालन कम होता है।
  • फाइटो रेमेडिएशन मृदा स्वास्थ्य, फसल उपज और फाइटोकेमिकल्स में वृद्धि करता है।

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फाइटोरेमेडिएशन के दोष या हानियां

  • फाइटोरेमेडिएशन प्रदूषकों के परिशोधन की गति धीमी और स्वीकार्य स्तर को प्राप्त करने में मुश्किल तकनीकी है।
  • फाइटो रेमेडिएशन में अधिक सांद्रता वाले खतरनाक प्रदूषक पदार्थ पौधों के लिए विषाक्त हो सकता है।
  • पादप वाष्पीकरण प्रक्रिया में पौधे प्रदूषकों को बिना अपघटन के वाष्प के रूप में पतियों के माध्यम से हवा में छोड़ देते हैं जो पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा देने में सहायक होता है।
  • फाइटो रेमेडिएशन में जलवायु और मौसम की स्थिति, पौधों की वृद्धि, प्रदूषकों के परिशोधन की गति और परिशोधन की अवधि को बढ़ा देती हैं।
  • फाइटोरेमेडिएशन प्रदूषण के परिशोधन की एक लंबी अवधि की स्वस्थानी तकनीकी है।

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फाइटोरेमेडिएशन पर शोध के परिणाम

पाल्मरोज लेमन और खस घास के शीर्ष में केडियम की सांद्रता 1.5 से २३.०, 1.2 से 11.48 6.0 से 4.2 मिलीग्राम क्रमशः पाई गई। मिट्टी और वर्मी कंपोस्ट में केडियम, जस्ता, तांबा, निकल और सीसा की सांद्रता में वृद्धि करने पर सूरजमुखी पौधे द्वारा इन का अवशोषण जस्ता, तांबा, केडियम, निकल, सीसा क्रम में बढ़ जाता है। जाडिया और फूलकर (2008)

अपशिष्ट जल को 15 दिनों के लिए डकवेड (लेम्ना माइनर) से उपचारित करने पर अपशिष्ट जल में विभिन्न मानक जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, ताम्बा, जस्ता,  निकल, सीसा में में सार्थक रूप से कमी पाई गई।

जलकुम्भी पोधों की जड़, पत्तियों और प्रणवृंत की तुलना में प्रदूषकों का अधिक क्षमता से अवशोषण करती है।

निष्कर्ष

फाइटोरेमेडिएशन एक कम लागत, और सौर ऊर्जा संचालित और प्रदूषकों के परिशोधन की प्राकृतिक स्वस्थानी तकनीक है, जो निम्न स्तर के प्रदूषित जगहों के लिए सबसे उपयोगी हैं। फाइटोरेमेडिएशन, को लागू करना और क्रियान्वित बनाए रखना आसान है क्योंकि इसमें महंगे उपकरण और अति विशिष्ट अनुभव कर्मियों की आवश्यकता नहीं होती है और साथ ही पर्यावरण के अनुकूल हैं।

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प्रस्तुति

हरिकेश जाट, डॉ. मनोज कुमार कौशिक,

डॉ. जगदीश लाल चौधरी एवं डॉ. प्रताप भान सिंह,

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)

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