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फसल सुरक्षा पद्धति की विधिया एवं उपयोग

फसल सुरक्षा पद्धति
Written by bheru lal gaderi

विश्व के अनेकों देशों में उगने वाली फसलों को कीट नुकसान से बचाने के लिए किए जाने वाले विचारों पर विचार करके फसल सुरक्षा को पांच भागों में बांटा जा सकता है।

फसल सुरक्षा पद्धति

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  1. जीवन उपाय अवस्था
  2. स्वार्थ पूर्ण अवस्था
  3. संदेहपूर्ण अवस्था
  4. विपत्ति अवस्था
  5. संबंधित नियंत्रण अवस्था

जीवन उपाय अवस्था

इस अवस्था में वे किसान आते हैं जो अपनी फसलों में फसल सुरक्षा के लिए कीट नियंत्रण को शैक्षिक क्रियाओं, प्राकृतिक शत्रुओं, फसल प्रतिरोधक क्षमता और मशीनी तरीके या भाग्य के भरोसे होते हैं। कीटनाशी उपचार कभी-कभार ही होता है।

स्वार्थ पूर्ण अवस्था

नई- नई किस्मों के विकास क्षेत्र और बाजार की व्यवस्था के बढ़ने के साथ ही कीट नुकसान भी बढ़ जाता है, जिससे बचने के लिए फसल सुरक्षा प्रणाली भी बन जाती हैं। ऐसी अवस्था में कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल होता है और कीट नियंत्रण रसायनों पर ही पूरी तरह से निर्भर रहता है। ज्यादातर इसका इस्तेमाल निश्चित कार्यक्रम या बचाव के तौर पर होता है। कीट संख्या होने या ना होने से फसल सुरक्षा पद्धति यही रहती है। शुरुआती दौर में ऐसे कार्यक्रम सफल रहते हैं जिसकी वजह से अनाज,फल, सब्जी और चारे की पैदावार बढ़ती जिससे रसायनों का इस्तेमाल भी खुलकर होने लगता है।

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संदेह/ भ्रम की अवस्था

कीटनाशकों के गलत व अंधाधुंध इस्तेमाल से बहुत सी समस्याएं पैदा होती है। कीट नियंत्रण के लिए जल्दी-जल्दी और ज्यादा मात्रा में कीटनाशकों का इस्तेमाल करने से फसल की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। साथ ही कीटों के नई-नई जातियां आर्थिक नुकसान के स्तर के पास पहुंचने लगती हैं और उपचारित कीट की संख्या भी घटने की बजाय बढ़ने लगती है। जीव जंतु और पशु उत्पादन में भी  रसायन थोड़ी सी मात्रा में मौजूद रहते हैं। जो इस्तेमाल के लायक नहीं रहते हैं।

विपरीत की अवस्था

इस अवस्था में रसायनों का इस्तेमाल इस हद तक बढ़ जाता है कि खेती करना लाभदायक नहीं रहता या फिर ऐसी जगह फसल पैदा करना नामुमकिन हो जाता है। क्योंकि रसायनों के नुकसान दायक अवशेष मिट्टी में इस मात्रा में मिल जाते हैं, कि यहां फसल सफलतापूर्वक नहीं उगाई जा सकती। ऐसी जगह में उगी हुई फसलों/ फसलोत्पादो को ग्राहक इस्तेमाल करने में भी झिझकता जाता है और यहां पर कीट नियंत्रण पद्धति खत्म हो जाती है।

समन्वित नियंत्रण/ प्रबंध अवस्था

ऊपर दी गई सभी अवस्थाओं से बचने का केवल एक ही तरीका है- समन्वित नाशीजीव प्रबंध फसल सुरक्षा पद्धति में पृथ्वी में पाए जाने वाले मित्र कीटों को पहचानकर कीट नियंत्रण के दूसरे तरीकों के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाए। साथ ही कीटनाशकों के सही इस्तेमाल पर जोर दिया जाए। इन सब का नतीजा यह होगा कि कीटनाशकों का पर लोग कम निर्भर होंगे, वातावरण में प्रदूषण नहीं होगा, नुकसानदायक अवशेषों से होने वाले गलत असर से बचने में मदद मिलेगी, पैदावार का स्तर बना रहेगा और प्रभावी कीट प्रबूंध व्यवस्था भी विकसित हो जाएगी।

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आर्थिक निर्णय स्तर

कीट जातियां कुदरत में हमेशा मौजूद रहती हैं। और फसलों पर ही अपना जीवन काटती हैं। इनके  द्वारा होने वाला प्रत्येक क्षति आर्थिक रुप में नुकसानदायक नहीं होती। कीटों की संख्या जब इतनी ज्यादा हो जाए की उनसे फसल को आर्थिक नुकसान होने लगे तभी रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करना चाहिए। कीटों की मात्रा के हिसाब से आर्थिक स्तर को चार भागों में बांट सकते हैं।

  • सामान्य सम्यक अवस्था
  • आर्थिक चेतावनी/ देहली
  • आर्थिक नुकसान स्तर
  • परिवर्तित साम्यक व्यवस्था

कीटों की कुल संख्या पद्धति में हमेशा मिलती है

कीट नियंत्रण के स्थाई तरीकों में यह संख्या घटती बढ़ती रहती है। लेकिन आर्थिक देहली के पास कभी नहीं पहुंच पाती। उनके द्वारा होने वाले नुकसान का कोई महत्व नहीं होता है।

आर्थिक चेतावनी

कीटों की वह संख्या जिस पर नियंत्रण तरीकों खासकर कीटनाशकों का इस्तेमाल करना जरूरी हो जाता है आर्थिक चेतावनी स्तर कहलाता है। यह स्तर साम्यक अवस्था से हमेशा ऊपर ही रहता है और अगर यहां पर कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता तो कीटों की यह मात्रा आर्थिक नुकसान स्तर तक पहुंच सकती है।

आर्थिक नुकसान स्तर

कीटों की वह मात्रा जिनके द्वारा होने वाला नुकसान आर्थिक रुप से नुकसानदायक होता है आर्थिक नुकसान स्तर कहलाता है। कीटों की इतनी अधिक मात्रा को फसल जेल नहीं पाती और प्रभावशाली कीट नियंत्रण जरूरी हो जाता है। यह इस तरह फसल की प्रति, कीमत, पैदावार और स्थान विशेष के हिसाब बदलता रहता है। इसलिए हर जगह के लिए यह स्तर अलग- अलग होगा।

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परिवर्तित साम्यक अवस्था

कुछ कीटों की बहुत कम संख्या ही चेतावनी का सूचक होती है और यह कीट अचानक किसी खास इलाके से आते हैं और नुकसान/ फसल नष्ट करके आगे बढ़ जाते हैं। जैसे टिड्डी दल। इसलिए ऐसे कीटों की संख्या सामान्य स्तर से कम रखी जाती है।

हानिकारक जीव

इस शब्द का इस्तेमाल उन जीवों के लिए किया जाता है जिनसे मनुष्य का नुकसान होता है। इसलिए इस शब्द का इस्तेमाल कीट, फफूंद, जीवाणु, विषाणु, निमेटोड चूहा, प्रोटोजोआ, चिड़िया और मनुष्य सभी के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के लिए किसान द्वारा बोई गई फसल को कीट द्वारा नुकसान हो या फिर चोर के द्वारा या दोनों के द्वारा आर्थिक नुकसान हो रहा है। इसलिए नुकसानदायक जीव समय के साथ बदल जाते हैं। आर्थिक निर्णय स्तर के अनुसार नुकसानदायक कीटों को चार भागों में बांटा जा सकता है।

  • मुख्य नुकसानदायक किट
  • संभावित नुकसानदायक कीट
  • समर्थ नुकसानदायक कीट
  • एक जगह बदल कर रहने वाले नुकसानदायक कीट

मुख्य नुकसानदायक कीट

खेती के पारिस्थितिक तंत्र में कई तरह के कीट जातियां पाई जाती है। लेकिन इनमें से एक या दो ही हर साल फसल को आर्थिक नुकसान पहुंचाती है जो कि काबू करने पर ही सामान्य साम्यक अवस्था में आती है।

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संभावित नुकसानदायक कीट

इस तरह के कीट खास जगह और समय पर ही आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे कीटों के नष्ट होने पर इस तरह के नुकसानदायक कीट आर्थिक चेतावनी या नुकसान के स्तर पर पहुंच जाते हैं।

समर्थ नुकसानदायक कीट

कुदरत में कीटों की कई तरह की जातियां होती है जो अपने भोजन और ठिकाने के लिए आपस में लड़ती रहती है और अपनी सारी ताकत यहीं खत्म कर देती है। लेकिन कीटनाशकों में अचानक होने वाले परिवर्तन से यह लड़ाई खत्म हो जाती है या कम हो जाती हैं क्योंकि कीटों की एक या कुछ प्रजातियां नष्ट होती है जिससे बची हुई केट जातियां आर्थिक नुकसान करने लगती है।

जगह बदल कर रहने वाले नुकसानदायक केट

इस तरह के कीट दूसरे इलाकों से भारी मात्रा में आते हैं वह नुकसान करके चले जाते हैं। जैसे की टिड्डी

प्रस्तुति

के.सी. मीणा जयपुर,

डॉ. शंभू लाल सोनी, जोबनेर

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