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फसल विविधीकरण आधुनिक कृषि में महत्व एवं उपयोग

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Written by bheru lal gaderi

शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में जहां निश्चय ही कृषि करना और कृषि से उचित मात्रा में लाभ कमाना अत्यंत जटिल कार्य है। जिस पर भी कृषि पूर्णतया जलवायु मौसम पर आधारित होती हैं। अतिवृष्टि अतिवृष्टि के कारण कृषक चाह कर भी इतना मुनाफा नहीं कमा पाता जितनी उसने मेहनत की होती है। एक फसल की विफलता पर उसके घर की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती हैं। ऐसे में कृषक को परंपरागत कृषि से हटकर कुछ और सोचना ही पड़ेगा। यह समय की मांग है। मौसम की अनियमितताओं जैसे:- अतिवृष्टि, अनावृष्टि, पानी की कमी आदि के कारण फसल विविधीकरण (Crop diversification) अत्यंत आवश्यक है।

फसल विविधीकरण

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फसल विविधीकरण:-

कृषक द्वारा अपने क्षेत्र में सिर्फ परंपरागत फसल लेने की बजाए दो या दो से अधिक फसलें उगाने अथवा मांग अनुसार नकदी फसल उगाना। यूं कहें कि लाभकारी फसलें उगाना। इस प्रकार की फसल प्रणाली फसल विविधीकरण कहलाती है।

फसल विविधीकरण अपनाते समय अनुसार मुख्य बिंदुओं को ध्यान में रखना चाहिए:-

  1. कृषि क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप फसलों का चुनाव करें।
  2. कृषक मृदा का स्वास्थ्य परीक्षण अवश्यम्भावी करावे।
  3. कृषक परंपरागत फसलों का चुनाव बाजार मांग के अनुसार करें।
  4. कम समय में तैयार होने वाली दो या दो से अधिक फसलों का चुनाव करें।
  5. अधिक जल आवश्यकता वाली फसलों के बजाय कम जल आवश्यकता वाली फसलों का चयन करें। उदाहरण के लिए पानी की बचत के लिए गेहूं की फसल के बजाय सरसों की फसल उगाकर अधिक लाभ अर्जित कर सकता है।
  6. खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा के अनुरूप सब्जियों की खेती करें।
  7. सब्जियों के अतिरिक्त मौसमी फूलों की खेती करके भी अतिरिक्त लाभ कमा सकता है।
  8. फसल विविधीकरण के साथ उन्नत कृषि तकनीकी का प्रयोग करके भी अतिरिक्त लाभ प्राप्त कर सकता है।
  9. परम्परागत कृषि तरीको में बदलाव करके नवाचारों को कृषि में आवश्यक रूप से अपनाएं।

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फसल विविधीकरण के लाभ:-

  1. लघु और सीमांत कृषकों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं। कृषक इसके द्वारा अपने छोटे जोत से बेहतर मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं।
  2. प्रतिकूल परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव से बचाव।
  3. मौसम के प्रतिकूल प्रभाव से बचाव।
  4. आर्थिक संकट से छुटकारा।
  5. कम व छोटी जोत का बेहतर उपयोग।
  6. बाहरी कारकों पर निर्भरता में कमी।
  7. कम निवेश में अधिक लाभ प्राप्त करना।
  8. कृषक का जीवन स्तर ऊपर उठाना तथा आर्थिक सुदृढ़ीकरण।
  9. मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता में वृद्धि।
  10. आत्मनिर्भरता में वृद्धि एवं रोजगारोन्मुखी एवं विकास।

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प्रस्तुति:-

शंकुतला पालीवाल
सहायक कृषि अधिकारी
कृषि विभाग, उदयपुर (राज.)

स्रोत:-

विश्व कृषि संचार

वर्ष-21,  अंक-01, जून – 2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

मोब. नो.- 9425081638

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