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फसल चक्र का आधुनिक खेती में उपयोग एवं महत्व

फसल चक्र
Written by bheru lal gaderi

किसी भी व्यवसाय को प्रारम्भ करने के लिए कई प्रकर के आदानों की आवश्यकता पड़ती हैं। जिन्हे दो भागो में विभक्त किया जा सकता हैं, मोद्धिक एवं अमोद्धिक आदान। व्यवसाय की सफलता दोनों के उचित समन्वय पर निर्भर करती हैं। कृषि क्षेत्र में मोद्धिक आदान जैसे बीज, उर्वरक,पादप सरक्षण रसायन, विभिन्न प्रकार के उपकरण व औजार, थ्रेशर आदि एवं अमोद्धिक आदान जैसे उपयुक्त तकनीकी का उपयोग, ग्रीष्म कालीन जुताई, बुवाई का समय, बीज उपचार का क्रम, क्रांतिक अवस्थाओं की जानकारी, उर्वरक एवं रसायन उपयोग का तरीका, फसल चक्र, फसल परिपक्वन की अवस्था आदि।

फसल चक्र

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आधुनिक खेती में फसल चक्र की आवश्यकता

लगातार एक ही फसल को बोने से फसल उत्पादन में कमी, उत्पादन लागत में बढ़ोत्तरी, विभिन कीटों एवं रोगों का प्रकोप, पोषक तत्वों की कमी आदि कई समस्यों के स्थाई निदान के लिए फसल प्रणाली में उचित फसल चक्र का होना आवश्यक हैं जिसे साधारण भाषा में जैविक खेती की तरफ एक कदम कहा जा सकता है। फसल चक्र जैविक खेती का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसे बिना लागत के आदान की संज्ञा दी जा सकती है।

फसल चक्र क्या हैं :-

किसी निश्चित क्षेत्र पर निश्चित समय में निश्चित क्रम में फसलों को हेर-फेर कर बोना है जिससे भूमि की उत्पादकता में वृद्धि एवं उर्वरा शक्ति बरकरार रहती है एवं अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। यह फसल चक्र एक वर्ष या अधिक अवधि के लिए हो सकता है। फसल विविधीकरण समय की मांग है तथा किसानों की जोखिम कम करने एवं टिकाऊ उत्पादन के लिए बहुत आवश्यक है।

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फसल चक्र के सिद्धांत :-

दलहनी एवं अदलहनी फसल चक्र

दलहनी फसलों के साथ अनाज वाली फसलें बोना चाहिए। क्योंकि दलहनी फसलें वायुमंडलीय स्वतंत्र नत्रजन को सहजीवी जीवाणुओं द्धारा स्थिरीकरण करती है जिससे फसल अवशेष (जड़) अगले फसल सत्र में अदलहनी फसल में नत्रजन की आपूर्ति करती है एवं कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढाती हैं। जैसे बाजरा के बाद चना, मुंग व् ग्वार के बाद तिल, बाजरा आदि।

गहरी जड़ों एवं उथली जड़ वाली फसल

गहरी जड़ो वाली फासलों के बाद उथली जड़ों वाली फसलें बोनी चाहिए जिससे की विभिन्न फसलें विभिन्न सतहों से पोषक तत्व एवं नमी प्राप्त करें किसी फसल विशेष में पोषक तत्वों की कमी नहीं रहे एवं जिससे से मृदा में उर्वरा शक्ति बनी रहे जैसे बाजरा के बाद चना, मुंग व मोठ के बाद गेहूं, जीरा आदि।

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ज्यादा एवं कम जल मांग वाली फसलें

ज्यादा जल मांग वाली फसलों के कम जल मांग वाली फसलें जैसे ज्वर/बाजरा के बाद बरसीम/चना आदि जिससे भूमि में वायु संचार की कमी जड़ो के विकास में में बाधा उत्पन न करें।

अधिक एवं कम उर्वरक मांग वाली फसलें

अधिक उर्वरक चाहने वाली फसलों के साथ कम उर्वरक मांग वाली फसलें बोने से मृदा में उर्वरता संतुलन बना रहता है एवं किसान भाई आसानी से उर्वरक का प्रबंधन कर सके।

निराई-गुड़ाई

अधिक निराई-गुड़ाई चाहने वाली फसल के बाद कम निराई-गुड़ाई फैसला बोने से मृदा सरंचना कायम रहती है, एवं उत्पादन लागत में कमी आती है। एक ही गहराई पर भूपरिष्करण क्रियाएं भूमि में के भौतिक गुणों पर प्रभाव डालती है। जैसे बाजरा के बाद गेंहू, चना इत्यादि।

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विभिन्न कुल की फसलों की बुवाई

एक ही कुल की फसलों को लगातार बुवाई करने से फसलों पर कीटों एवं बिमारियों का आक्रमण बढ़ता हैं, पोषक तत्वों की सामान मांग होने से तत्व विशेष की कमी एवं असंतुलन उत्पन होता है। अतः एक ही कुल की फसलें बार-बार नहीं बोये जैसे बाजरा के गेंहू, मुंग, मोठ के बाद चना आदि।

मृदा क्षरण

मृदा क्षरण करने वाली फसलों के बाद मृदा क्षरण रोकने वाली फसलें (चना, मुंग, मोठ) की बुवाई करनी चाहिए, तथा फसलों का चयन मृदा व जलवायु को देखते हुए करनी चाहिए।

उपलब्ध संसाधन का पूर्ण एवं समुचित उपयोग

फसल चक्र बनते समय उन सभी फसलों का समावेश करना चाहिए जिससे किसान के पास उपलब्ध सभी संसाधन जैसे – श्रम, बीज, सिंचाई, खाद, धन आदि का पूर्ण एवं समुचित उपयोग हो सके साथ ही साथ कृषक की विभिन्न आवश्यकताओं जैसे- अनाज, दलहन पशुओं के लिए चारा, नकद रुपया आदि प्राप्त होता रहे। विशेष तोर से कृषि उत्पाद बेचने की सुविधा का ध्यान रखना चाहिए।

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फसल चक्र के लाभ :-

  1. उपयुक्त फसल चक्र अपनाने से कृषकों को निम्नलिखित लाभ होते है।
  2. भूमि की उर्वरक शक्ति का हास नहीं होता है तथा उर्वकता बानी रहती है।
  3. भूमि की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशा में सुधार होता है। दलहनी फसलों के कारण मृदा की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशा ठीक बनी रहती है तथा जैव पदार्थ की कमी नहीं हो पाती हैं।
  4. फसलों की बिमारियों जैसे बाजरे में ग्रीन ईयर, स्मट, रस्ट, तथा किट जैसे वाइट ग्रब के नियंत्रण में मदद मिलती है। जिससे विभिन्न पौध सरंक्षण रसायनों पर निर्भरता कम होने से पर्यावरण प्रदुषण रोकने में मदद करता है एवं उत्पादन लागत में सार्थक कमी आती है। कुछ फसलों की जड़ों से निकलने वाले रिसाव हानिकारक मृदा जीवों जैसे सूत्रकृमि व अन्य सूक्ष्म जीवों की वृद्धि आगामी फसल के लिए व विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है। जो आगामी फसल के लिए लाभदायक होते है।
  5. दूसरी फसल के लिए खेत तैयारी का प्रयाप्त समय मिल जाता है।
  6. फसल उत्पादन में लागत कम आती है।
  7. फसलों की पैदावार/उपज में वृद्धि होती है।
  8. कृषकों के पास उपलब्ध साधनों का समुचित उपयोग होता है।
  9. मृदा कटाव रोकने में मदद मिलती है।
  10. भूमि उपलब्ध पोषक तत्वों का समुचित उपयोग हो जाता है।
  11. उचित फसल चक्र अपनाने से घरेलु तथा बाजार आवश्यकताए पूरी होती है।
  12. भूमि को मृदा जनित रोगों व् कीटों के प्रकोप से से बचने में मदद मिलती है।
  13. खरपतवार के नियंत्रण में सहायता मिलती है। पादप परजीवी रुखड़ी को विभिन प्रकार की फसलों के फसल चक्र से नियंत्रित किया जा सकता है।
  14. भूमि कटाव रोकने में सहायक।
  15. उपलब्ध संसाधनों का पूर्ण क्षमता के साथ उपयोग से फसल उत्पादन में स्थायित्व प्राप्त होता है जिससे से उत्पादन लागत में कमी आती है।
  16. जोखिम कम होती है। जिससे आय में निश्चितता रहती है।
  17. जल व वायु अपरदन से होने वाली मृदा हास को रोका जा सकता है।
  18. फसल चक्र से घरेलु श्रम का वितरण होता हैं एवं श्रम संसाधनों पर जोर नहीं पड़ता है।

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