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फसलों में जैव उत्पाद से रोग नियंत्रण एवं प्रयोग विधि

जैव उत्पाद से रोग नियंत्रण
Written by bheru lal gaderi

फसलों में कवक, जीवाणु, विषाणु एवं सूत्रकृमि द्वारा होने वाले रोगो से प्रतिवर्ष बहुत नुकसान होता है। रसायनो के दुष्प्रभाव को दृष्टिगत रखते हुए फसलों में रोगों के नियंत्रण हेतु जैव उत्पाद (Biological control agents) और इनकी उपयोग विधि  इस प्रकार है :-

ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) जैव उत्पाद :-

एक मित्र फफूंद के रूप में मृदा में उपस्थित हानिकारक शत्रु फफूंदों से फसलों की रक्षा करता है। ट्राइकोडर्मा विरिडी तथा ट्रास्कोडर्मा हरजियेनम अनेक फसलों जैसे – जीरा, मूंगफली, कपास, चना, आदि में भूमि जनित फफूंद रोगों – जड़ गलन, उखटा एवं तना गलन के विरुद्ध प्रभावकारी है।

जैव उत्पाद से रोग नियंत्रण

इनके उपयोग से फ्यूजेरियम, राइजोक्टोनिया, फाइटोफ्थोरा, मेक्रोफोमिना, स्क्लेरोशियम, पीथियम आदि रोग फैलाने वाले कवकों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है।

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उपयोग विधि

जैव फफूंदनाशी ट्राइकोडर्मा से बीज उपचार, मृदा उपचार तथा मृदा ड्रेचिंग कर रोगों से छुटकारा पाया जाता है। 8-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित तथा 2.5 किलोग्राम 100 किग्रा. गोबर की खाद की खाद में 15 दिन तक रख कर, बुवाई के समय खेत की मिट्टी में मिलकर देने से रोग नियंत्रण किया जा सकता है। खड़ी फसल में 10 ग्राम प्रति लीटर पानी में ड्रेचिंग कर उखटा रोग तथा जड़गलन रोगों को नियंत्रित कर सकते है।

बाड़मेर जिले के गुड़ामालानी क्षेत्र के किसान राणाराम ने अपने खेत में जैव उत्पाद ट्राइकोडर्मा विरिडी का 10 ग्राम प्रति किलो बीज से जीरे के बीज को उपचारित किया तथा 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा 100 किलो गोबर की खाद में 15 दिन नमीयुक्त खेत के पेड़ के नीचे छाया में रखकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के पहले भूमि में देने से जीरे की फसल में उखटा रोग पर काबू पाया है। जीरे की फसल में उखटा रोग (फ्यूजेरियम) से फसल चौपट हो जाती थी।

रसायनों के प्रयोग से भी नियंत्रण नहीं होता था। निर्यातकों को रसायनों के दुष्प्रभाव  से खरीदने में भी रुकावट होती थी। राणाराम ने अपने खेत में जैव उत्पाद टरकोडर्मा के प्रयोग से 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर जीरे का उत्पादन लेकर सवा लाख से डेढ़ लाख रूपये प्रति हेक्टेयर की कमाई की है।

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स्यूडोमोनास फ्ल्यूरोसेंस (Pseudomonas fluorescence)

इस जैव उत्पाद का उपयोग फफूंद तथा बैक्टीरिया द्वारा फैलने वाले विभिन्न मृदा, बीज तथा वायु जनित रोगों की रोकथाम में अत्यंत लाभकारी है। इसका उपयोग चना, अरहर, मूंगफली, शाक-सब्जी, बैग-बगीचे सहित अन्य फसलों पर किया जाता है। ये पौधों को खुराक लेने में तथा बढ़वार में भी मदद करते है। इनके उपयोग से फसलों में जड़गलन, तना गलन, कॉलर रॉट, उखटा, विल्ट, ब्लाइट आदि रोग नियंत्रण कर सकते है।

जैव उत्पाद से रोग नियंत्रण

Image Credit – TARI Bio-Tech

उपयोग विधि

इसका उपयोग 5 से 10 ग्राम प्रति किलो से बीज उपचार, 2.5 किलो प्रति 100 किलो गोबर की खाद में मिलाकर प्रति हेक्टेयरi भूमि उपचार, 10 ग्राम या 10 मिली. प्रति लीटर पानी से ड्रेचिंग तथा 1 किग्रा. प्रति एकड़ सिंचाई के साथ दे सकते है।

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बेसिलस सबटिलिस (Bacillus subtilis)

इसका उपयोग डाउनी मिल्ड्यू, पाउडरी मिल्ड्यू, फलगलन, सहित ब्लाइट, काली रुसी, स्कैब जैसी बिमारियों के नियंत्रण में किया जा है। उक्त रोग धान, टमाटर, आलू, शिमला मिर्च, अंगूर, सेब तथा विभिन्न फूलों में होते है। ये बढ़वार के लिए भी प्रभावी है।

जैव उत्पाद से रोग नियंत्रण

Image Credit – OMICS International

उपयोग विधि

इस जैव उत्पाद का उपयोग 10 ग्राम प्रति किलो बीज से बीजोपचार तथा 1 किग्रा. प्रति 200 लीटर पानी में घोल कर एक एकड़ फसल पर छिड़काव प्रातःकाल या सांयकाल प्रभावी रहता है।

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एमपीलोमाईसिस क्विसक्वैलिस (Amphilomasis quisqualysis)

फसलों में लगने वाली पाउडरी मिल्ड्यू, चूर्णी फफूंदी को ये जैव उत्पाद नियंत्रित करता है। फसलें जैसे – बेर, अंगूर, प्याज, मटर, बेलवाली फसलें एवं फूलों में लगने वाला चूर्णी आसिता रोग में लाभकारी है।

उपयोग विधि

500 मिली. से 1 लीटर पानी एकड़ ले। रोग की शरुआत में लक्षण दिखाई देते ही एक लीटर या एक किग्रा. उक्त जैव उत्पाद प्रति 150-200 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव कर छछिया रोग नियंत्रित कर सकते है।

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वर्टिसिलियस लेकानी (Verticillium Lecanii)

यह जीव फफूंद विषाणु रोग फैलाने वाले कीटों को नियंत्रित करती है। इस जैव उत्पाद के उपयोग से एफिडी , मिलीबग, ट्रिप्स, सफेद मक्खी, शल्क कीट कीड़ों की विविध अवस्थाओं को प्रभावकारी ढंग से  नियंत्रित किया जाता है।

जैव उत्पाद से रोग नियंत्रण

उपयोग विधि

एक से दो किलोग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से कीट निष्क्रिय होकर मर जायेंगे तथा विष्णु बीमारी रोकने में मदद मिलती है।

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पेसिलोमाइसिस लिलेसिक्स

यह जैव उत्पाद (फफूंद) फसलों में होने वे सूत्रकृमि रोगों को नियंत्रित करता है। खरपतवार मूलग्रंथि सूत्रकृमि (रुत-वॉट निमोटेड) मिर्च, टमाटर, बेंगन, भिंडी, गुलाब, पपीता, अनार, पर आक्रमण करता है।

उपयोग विधि

10 ग्राम प्रति किलो बीजोपचार, 50 ग्राम प्रति वर्ग मीटर नर्सरी उपचार, 2 किग्रा. प्रति एकड़ से भूमि उपचार कर सकते है।

बाड़मेर जिले के नरसाराम ने अनार का बगीचा लगाया। उसमे मूलग्रंथि सूत्रकृमि से पौधे मरने लगे तब इस जैव उत्पाद (फफूंदनाशी) का 2 किग्रा. प्रति एकड़  की खेती में कम गोबर की खाद में मिलाकर प्रति पौधा दिया। इससे पौधे मरने से रुक गए और रोग पर काबू पा लिया।

इसे देखकर पडोसी गांवों बुड़ीवाड़ा, जागसा, जनमीठाखेड़ा के किसानों की अनार की खेती में निमोटेड रोग में कमी आ रही है।

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Author:-

डॉ – तख्तसिंह राजपुरोहित

कृषि वैज्ञानिक

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