प्लास्टिक कल्चर का कृषि में उपयोग एवं महत्व

By | 2017-05-02

आज के युग में प्लास्टिक का उपयोग दैनिक जीवन के हर क्षत्र में बढ़ रहा हैं, कृषि जगत भी इससे अछूता नहीं हैं। लोहे व लकड़ी का उपयोग कम हुआ हैं और इसकी जगह प्लास्टिक ने ले ली हैं। प्लास्टिक में बहुत सी खुबिया पाई जाती हैं, जिसके चलते बढ़ी तेजी से इसका उपयोग बड़ा हैं। इसकी खुबिया निम्न हैं :

  • ज्यादा मजबूत व लचीलापन होता हैं।
  • इसमें जंग नहीं लगता हैं और नहीं किसी तरह की सड़न होती हैं।
  • तरल पदार्थों एवं गैस के रिसाव को रोकने में बेहतर होता हैं।
  • वजन के हिसाब से हल्का होता हैं।

प्लास्टिक कल्चर

यह प्लास्टिक ही हैं जिसके चलते सुदूर उत्तर भारत एवं उत्तर पूर्वी भारत के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र जैसे : श्रीनगर, लेह, लद्दाख, शिलांग आदि क्षेत्रों में भाजी सब्जियों कट फ्लावर की खेती एवं उत्पादन संभव हो सके हैं, रेगिस्तान की बेकार पड़ी जमीन पर किसान दुर्गम भौगोलिक परिस्थियों में न केवल सब्जियों की खेती कर रहा हैं, किन्तु फल एवं फूलों की व्यावसायिक खेती कर रहे हैं। जिसकी पूर्व में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी यह सब अब मुमकिन हो गया हैं। प्लास्टिक के इस्तेमाल से और प्लास्टिक का कृषि जगत में बढ़ते उपयोग को “प्लास्टिक कल्चर” का नाम दिया गया हैं। आज प्लास्टिक ने कृषि जगत एवं किसान की दुनिया ही बदल कर रख दी हैं।

खेती में आज प्लास्टिक का इस्तेमाल कई रूप में हो रहा हैं जैसे : सिंचाई में, कृषि उपकरणों में, पॉली हॉउस, पाली टनल, शेड नेट हॉउस में, पलवार के तोर पर, मल्च के तोर पर, नर्सरी की थैलियों एवं प्लास्टिक ट्रे के रूप में और प्लास्टिक से बने सोलर ड्रॉयर के रूप में।

सिंचाई में प्लास्टिक

पानी की किल्लत प्रति दिन एक प्रकार की गंभीर समस्या बनती जा रही हैं। और ऐसे में किसान वर्ग इस समस्या से अछूता नहीं हैं। हमारे देश में ज्यादातर किसान इस समस्या से जूझ रहे हैं। प्रतिदिन  पानी का स्तर गिरता जा रहा हैं। और ऊपर से पानी का बेकार बहना इस समस्या को और भी जटिल बना देता हैं। प्लास्टिक तकनीक के अंतर्गत HDPE (high density poly ethylene polymer) एव LDPE (low density poly ethylene polymer) पाइपों का इस्तेमाल कर कई तरीकों से सिंचाई की जाती हैं। इससे पानी की बचत के साथ-साथ सिंचित क्षेत्र में भी बढ़ोतरी होती हैं ये तरिके निम्न हैं :

फव्वारा या स्प्रिंकलर सिंचाई

प्लास्टिक कल्चर

इस विधि में पानी पौधों पर पानी बारिश की फुहार के रूप में गिरता हैं। इससे उबड़- खाबड़ जमीनों पर आसानी से खेती की जा सकती हैं क्योंकि इस विधि से पौधों की सिंचाई की जा सकती हैं। खुली सिंचाई की अपेक्षा इस सिंचाई से पानी की बचत होती हैं। इसमें फसल के मुताबिक स्प्रिंकलर को सही दुरी पर लगा दिया जाता हैं। पंप के इस्तेमाल से पानी के तेज बहाव के साथ स्प्रिंकलर के ऊपर लगी नोजल से फुहार बनकर बाहर गिरता हैं। आजकल स्प्रिंकलर, मिनी स्प्रिंकलर, मिस्टर्स एवं पॉप अप आदि चलन में हैं।

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ड्रिप सिंचाई

प्लास्टिक कल्चर

बून्द- बून्द सिंचाई तकनीक के अंतर्गत पानी को पौधों की जड़ों में उनकी जरूरत के अनुसार बून्द- बून्द गिराकर पहुंचाया जाता हैं। इस तरिके में पानी के स्त्रोत (ट्यूबवेल, प्लास्टिक या सीमेंट के टेंक) से एक छोटी मुख्य पाइप जुडी होती हैं और इसमें सब मेन पाइप लाइन निकलती हैं, उसे लेटरल कहते हैं। जो पुरे खेत में बिछी होती हैं और इन लेटरल पर बारीक़ छेद कुछ अंतराल पर ऊपर या अंदर लगे होते हैं, जिन्हे ड्रिपर्स कहते हैं। जहाँ से बून्द- बून्द पानी निकलता हैं, जो की पोधो की आसपास की जमीन को गीला करते हैं।

ड्रिपर्स दो प्रकार के होते हैं ऑन लाइन ड्रिपर्स एवं इन लाइन ड्रिपर्स। ऑन लाइन ड्रिपर्स फलों के बगीचों में जहाँ पौधों से पौधों की दुरी 1 मीटर से ज्यादा होती हैं, में उपयोग किया जाता हैं और एक मीटर से कम दुरी होने पर इन लाइन ड्रिपर्स लगाए जाते हैं। खास तोर से सब्जियों एवं फूलों के के दौरान इसका प्रयोग किया जाता हैं।

फर्टिगेशन

पानी के साथ खाद या रासायनिक उर्वरक मिलाकर बून्द- बून्द सिंचाई प्रणाली से पौधों की जड़ों के इलाके में जरूरत के अनुसार देना “फर्टिगेशन” कहलाता हैं। इसके लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली के अलावा फर्टिगेशन टैंक या वेनचुरी का प्रयोग किया जाता हैं। इस फर्टिगेशन प्रणाली को अपनाकर किसान अपनी मेहनत, समय एवं पैसे की बचत कर सकता हैं। साथ ही अच्छी गुणवत्ता या अधिक उत्पादन कर सकता हैं वो भी बिना प्रदूषण बढ़ाए।

ड्रम किट ड्रिप सिंचाई

इस तरीके के मुताबिक जगह- जगह 100-150 लीटर वाले मजबूत प्लास्टिक के ड्रमों को 3 मीटर ऊचे सीमेंट के स्टेण्ड पर रख दिया जाता हैं। इन ड्रमों से पानी निकलने के लिए लगाए गए पाइपों में गेट वॉल्व व फ़िल्टर लगाए जाते हैं, ताकि जरूरत नहीं होने पर, गेट वॉल्व को बंद कर पानी सप्लाई रोकी जा सके। जहाँ कम बरसात होती हैं उस क्षेत्र की बागवानी फसलों के लिए यह तरीका कोई देवीय वरदान से कम नहीं हैं।

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प्लास्टिक मल्च

जमीन पर उठी हुई क्यारियाँ बनाकर उस पर प्लास्टिक की काली, दूधिया, चाँदी की रंग वाली या २ रंग वाली फिल्म बिछा दी जाती हैं। इसे “प्लास्टिक मल्च” कहते हैं। आमतौर पर २५ माइक्रोन मोटाई वाली फिल्म मल्च के लिए उपयुक्त रहती हैं। इससे मिट्टी में नमी ज्यादा समय तक बनी रहती हैं। जिससे बून्द-बून्द वाली सिंचाई तकनीक में और भी कम पानी लगता हैं क्योंकि पानी का वाष्पोत्सर्जन रुक जाता हैं। खरपतवार नहीं उग पाती हैं जिससे निराई- गुड़ाई की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं, इस प्रकार समय एवं पैसे की बचत होती हैं। सिल्वरी ब्लेक मल्च का उपयोग करते समय सिल्वरी सतह को ऊपर रखा जाता हैं और काली सरह अंदर की तरफ रखी जाती हैं। इससे पानी की बचत, खरपतवार नियंत्रण में सहायता होती हैं और कीट पतंगों का प्रकोप भी कम पाया जाया हैं इसलिए सिल्वरी ब्लेक मल्च ज्यादा प्रचलन में हैं।

नालियों व नहरों में प्लास्टिक

कच्ची नालियों से काफी पानी बेकार बह जाता हैं। अगर नहरों व नालियों में प्लास्टिक की परत बिछा दी जाए तो बड़ी आसानी से रिसाव को रोका जा सकता हैं। भारत में नहरों और नालियों से पानी के रिसाव को रोकने के लिए प्लास्टिक की परत बिछाने की शुरुआत साल 1959 में हो गई थी।

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प्लास्टिक थैलिया एवं नर्सरी लगाने वाली प्लास्टिक ट्रे (प्रो- ट्रेज)

प्लास्टिक कल्चर

आज बागवानी या दूसरी फसलों की नर्सरी तैयार करते समय फूलों व सब्जियों के लिए 10-15 सेमि. व फलों के लिए 15-20 सेमी. आकार की थैलियां इस्तेमाल की जाती हैं। साथ ही आजकल नर्सरी उगाने वाली प्लास्टिक ट्रे का उपयोग साग- सब्जियों की नर्सरी (पौध) तैयार करने के लिए किया जाता हैं।

लाभ

पौधे में अगर कोई बीमारी लग जाती हैं तो पूरी नर्सरी के पौधों पर असर होता हैं, परन्तु पॉलीथिन बेग के पौधों में अगर बीमारी लगे तो उसी पौधे पर असर होता हैं और उसे आसानी से हटाया जा सकता हैं। इसके अलावा पौधों को आसानी से कई भी लाया जा सकता हैं। नर्सरी ट्रे में सभी पौधों की बढ़वार बहत अच्छी एवं समान रूप से होती हैं। पौधों की जड़ों का विकास बहुत अच्छा होता हैं, जिससे ये तुरंत जमीन में स्थापित हो जाते हैं। इस तरिके से बीजों का अंकुरण भी बढ़िया तरिके से होता हैं और पौधे कम मरते हैं।

कृषि उपकरण

प्लास्टिक कल्चर

आज ज्यादातर कृषि उपकरण प्लास्टिक के बन रहे हैं। जैसे ट्रे टंकी,स्प्रे करने वाले उपकरण, लोन मोवर, ट्रेक्टर के कल पुर्जे आदि।

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पॉलीहाउस हाउस

प्लास्टिक कल्चर

ग्रीन हाउस लोहे के पाइपों या लकड़ी से बना ऐसा ढांचा हैं, जो की एक पारदर्शी आवरण से ढका होता हैं जिसमे से सूर्य की किरणे जो की पोधो के लिए उपयुक्त पाई गई हैं अंदर आ सकती हैं। विशेषतौर से 400-700 नैनोमीटर वेललेंथ वाली किरणे जिसको की हम विजिबल लाइट कहते हैं। पोधो की संश्लेषण क्रिया के लिए उपयुक्त होती हैं। अगर यह पारदर्शी ढंकने की सामग्री पॉलीथिन फिल्म या शीट काम में ली जाती हैं तो इसे पॉलीहाउस कहते हैं। पॉलीहाउस में काट फ्लावर की खेती डच गुलाब, जरबेरा, कारनेशन, गुलदावदी और रंगीन शिमला मिर्च की खेती की जानी हैं।

शेड नेट हाउस

प्लास्टिक कल्चर

अगर यह पारदर्शी ढकने की सामग्री शेड नेट की जाली हैं तो उसे शेड नेट हॉउस कहाँ जाता हैं। शेड नेट में रंगीन शिमला मिर्च, चेरी, टमाटर, जुकनी, ब्रोकली, लेट्यूस, लाल गोभी, हरा धनिया और सब्जियों की पौध, फलों के पोधो एवं जंगली पौधों की नर्सरी तैयार करने के लिए उपयोग किया जाता हैं। पॉलीहाउस शेडनेट हॉउस घर की तरह ढांचे के आकार का होता हैं। जिसे 200-400 माइक्रोन मोटाई वाली सफेद या पिली प्लास्टिक सीट से ढकी जाती हैं। यह ढांचा ग्रीनहाउस इफेक्ट के अनुसार काम करता हैं, जिसमे आबोहवा को काबू में कर बेमौसमी खेती ने कल्चर में कई बदलाव किये हैं, जिनसे पैदावार को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता हैं।

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