agriculture Horticulture

फल वृक्षों में प्रमुख कीट रोग एवं प्रबंधन

फल वृक्षों में प्रमुख कीट रोग
Written by bheru lal gaderi

भारत का फल उत्पादन में चीन के बाद दूसरा स्थान है फलों की खेती साल भर होने के लिए उन्नत तकनीकों के विकास से पैदावार बढ़ने से इन की खेती लाभदायक साबित हो रही है फलदार वृक्षों पर कीट रोग का प्रकोप ज्यादा रहता है अतः इनकी रोकथाम के समन्वित कीट रोग प्रबंधन से फलदार वृक्षों से अच्छी गुणवत्ता युक्त फल की पैदावार ली जा सकती है।

फल वृक्षों में प्रमुख कीट रोग

Image Credit – sarita.in

Read also – फल गिरने की समस्या के प्रमुख कारण व समाधान

फलों में कीट रोग प्रबंधन के प्रमुख उपाय:-

  1. बाग़ों की गर्मियों में दो से तीन गहरी जुताई कर खेत को खुला छोड़ देना चाहिए जिससे कि कीटों व रोगों के अंडे, प्यूपा व फफूंद तेज व पक्षियों द्वारा नष्ट हो जाएंगे।
  2. रोग व कीटों के प्रकोप होने पर पेड़ों की कटाई- छटाई फल तुड़ाई उपरांत कर लेना चाहिए।
  3. कटाई- छटाई के बाद शेष बचे अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए जिससे उसमें रह रहे किट फफूंद आदि नष्ट होकर समाप्त हो जाएंगे।
  4. सफेद मक्खी, पत्ती लपेटक, रस चूसक कीट से बचाव हेतु इमिडाक्लोप्रिड 5 मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए तथा फलों में मित्र फफूंद ट्राइकोडर्मा हरजेनियम 50 ग्राम प्रति पौध की दर से उपचारित करना चाहिए।

भूमि उपचार:-

सौर ताप द्वारा मृदा के उपचार हेतु क्षेत्र की हल्की सिंचाई करके ग्रीष्मकाल में काले रंग की पॉलिथीन (100 से 200 गेज) से ढक देते हैं। किनारों को मिट्टी में दबा देते हैं, इसके अंदर का तापमान बढ़कर हानिकारक कवक जीवाणु व सूत्रकृमि को नष्ट कर देता है।

  1. फलों की पौध रोपण से पूर्व इमिडाक्लोर, एक मिली प्रति 5 लीटर पानी में घोलकर जड़ को गोल में डुबोकर रोपाई करनी चाहिए
  2. फलों की पौध रोपाई के 7 दिन बाद मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. नामक कीटनाशक दवा का एक मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
  3. बागों में कीट एवं रोग के लिए जैविक नियंत्रण (नीमकोरी, नीम की पत्ती,)
  • नीम के बने कीटनाशकों का उपयोग करके।
  • पत्ते वाली सुर्ती का उपयोग करके।
  • लहसुन और मिर्च के घोल का प्रयोग करके।
  • राख, मिट्टी का तेल का प्रयोग करके।

Read also – सफेद चंदन की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

आम के बागों में कीट रोग प्रबंधन:-

नाशी कीट प्रबंधन:-

आम के पौधों को नर्सरी से लेकर फल लगने तक लगभग एक दर्जन कीटों की प्रजातियां हानि पहुंचाती है। अतः इन कीट रोग की रोकथाम करना आवश्यक हैं। इनमें से कुछ मुख्य कीट जैसे- भुनगा, गुजिया, डासी मक्खी आदि फसल को ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं।

प्रमुख कीट रोग नियंत्रण हेतु निम्नलिखित जानकारी है:-

भुनगा:-

इस कीट के बच्चे तथा वयस्क दोनों ही मुलायम प्ररोहों, पत्तियों तथा फलों का रस चूसते हैं। फूलों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस कारण फूल सूख कर गिर जाते हैं। यह कीड़े एक प्रकार का मिठा स्राव उतसर्जित करते है, जो पेड़ों की पत्तियों और प्ररोहों पर लग जाता है।

इस मीठे द्रव्य पर काली फफूंद पनपती हैं या पत्तियों पर काली परत के रूप में फैलकर पेड़ों के प्रकाश संश्लेषण पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

प्रबंधन:-

बाग से खरपतवार हटाकर उसे साफ-सुथरा रखें। बाग की कटाई- छटाई दिसंबर माह में करें और बौर फूटने के बाद बागों की बराबर देखभाल करें। पुष्प गुंच्छ  की लंबाई 8-10 सेमी होने पर भुनगे का प्रकोप होता है। इसके रोकथाम के लिए 0.5 प्रति लीटर इमिडाक्लोरोप्रिड का पहली बार छिड़काव करें। 0.5 मि.ली. प्रति लीटर प्रॉनोफोस का दूसरा छिड़काव करें।

Read also – फलों का फटना कारण एवं नियंत्रण के उपाय

गुजिया:-

इसके बच्चे तथा वयस्क मादा प्ररोहों, पत्तियों, तथा फूलों का रस चूसते हैं, तब इनकी संख्या अधिक हो जाती हैं। इनके द्वारा रस चूसने के कारण पेड़ों के प्ररोहों, पतियों तथा बौर सूख जाते हैं एवं फल नहीं लगते हैं।

यह कीट मधु स्राव उत्पन्न करता है, जिसके ऊपर काली फफूंदी का वर्धन होता है। इस कीट प्रकोप दिसंबर से मई महीने तक देखा जाता है।

प्रबंधन:-

खरपतवार और अन्य घास नवंबर माह में जुताई द्वारा बाग से निकालने से सुप्तावस्था में रहने वाले अंडे धुप, गर्मी एवं चींटियों द्वारा नष्ट हो जाते हैं। दिसंबर माह के तीसरे सप्ताह में वृक्ष के तने के आसपास 250 ग्राम क्लोरपाइरीफॉस चूर्ण 1.5% की दर से मिट्टी में मिला देने से अण्डों से निकलने वाले निम्फ मर जाते हैं। प्लास्टिक की 30 से.मी. की पट्टी पेड़ के तने के चारों और भूमि की सतह से 30 से.मी. की ऊंचाई पर दिसंबर के दूसरे सप्ताह में भुजिया के निकलने से पहले लपेटने से निम्फ का वृक्षों पर चढ़ना रुक जाता है।

पट्टी के दोनों सिरों को सुतली से बांध देना चाहिए। इसके बाद थोड़ी ग्रीस पट्टी के निचले हिस्से पर लगाने से गुजिया को पट्टी पर चढ़ने से रोका जा सकता है। यह पट्टी बाग में आम के पेड़ एवं अन्य पौधों पर भी लगानी चाहिए।

Read also – ग्रीन हाउस में टमाटर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

पुष्प गुच्छ मिज:-

आम के पौधों पर मिज के प्रकोप से 3 चरणों में हानि होती है। इसका प्रकोप कली के खिलने की अवस्था में होता है। नए विकसित

बौर में अंडे दिए जाने तथा लार्वा द्वारा बौर के मुलायम डंठल में प्रवेश करने से बौर पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं।

पूर्ण विकसित लार्वा बौर के डंठल में से निकलने के लिए छिद्र बनाते हैं। इसका दूसरा प्रकोप फलों के बनने की अवस्था में होता है। फलों में अंडे देने तथा लार्वा के प्रवेश करने के फलस्वरुप फल पीले होकर गिर जाते हैं। तीसरा प्रकोप बौर को घेरती हुई पत्तियों पर होता है। प्रबंधन

प्रबंधन:-

अक्टूबर एवं नवंबर माह में बाद में की गई जुताई से मिज कि सुंडियों के साथ सुषुप्तावस्था में पड़े प्यूपा भी नष्ट हो जाते हैं। फरवरी माह में भुनगे के लिए किये जाने वाले कीटनाशी के छिड़काव  से इस कीट का नियंत्रण स्वतः हो जाता है।

Read also – अंगूर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

प्रस्तुति:-

बालाजी विक्रम

सहायक (उद्यान विभाग)

इलाहबाद

पूर्णिमासिंह सिकरवार

शोध छात्रा (उद्यान विभाग)

ग्वालियर (म.प्र.)

स्रोत:-

विश्व कृषि संचार

वर्ष -20, अंक-11, अप्रैल-2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

मोब. नो.- 9425081638

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.