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प्रगतिशील किसान हेमंत सिंह के शोध की गूंज दिल्ली तक

किसान हेमंत सिंह
Written by bheru lal gaderi

मोजेक वायरस (माथाबंदी) पर रिसर्च

पर्यटन विभाग में द्विभाषीय पद पर कार्यरत हेमंत सिंह की खेती में ऐसी लगन लगी कि उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर उन्नत तकनीक से खेती बाड़ी करना शुरू किया। तकनीक के इस्तेमाल और निरंतर शोध की बदौलत में कृषि क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बना चुके हैं। टमाटर के मोजेक वायरस (माथाबंदी) पर रिसर्च करने के कारण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद आईसीएआर) की ओर से अखिल भारतीय स्तर पर किसान का चयन किया है। किसान को कृषि मंत्रालय की ओर से ₹500000 की नगद राशि देकर सम्मानित किया जाएगा। उन्हें भारत सरकार की ओर से कृषि अनुसंधानक की मानक उपाधि से नवाजा जा रहा है।

किसान हेमंत सिंह

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विदेश यात्रा में चयन

किसान हेमंत सिंह का नीदरलैंड और इजराइल की कृषि अनुसंधानको की यात्रा के लिए चयन भी हुआ है।

सालाना 15 लाख से अधिक आय

नन्देरा निवासी हेमंत सिंह को कृषि उत्पादन के लिए राज्य स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। किसान उन्नत तरिके से सब्जी व कृषि उत्पादन कर सालाना करीब 15 लाख रुपए से अधिक आय अर्जित कर रहा है। उनकी सफलता और रिसर्च देखने के लिए इजराइल से भी वैज्ञानिक आने लगे हैं। कोई कम्पनी जब नया बीज तैयार करती है तो ट्रायल के रूप में हेमंत के फार्म पर बीज लगा कर जांच करती हैं।  अब तक अमेजन कंपनी की 9 तरह के मिर्च के बीच कि यहां जांच हो चुकी है।

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व्हाट्स-अप से दूध की सप्लाई

किसान बताते हैं कि उन्होंने डेयरी लगा रखी है, जिसमें 11 गाय-भैसों से करीब 125 लीटर दूध मिलता है। दूध को घरों में व्हाट्स-अप के जरिए ऑर्डर पर सप्लाई किया जाता है, जिससे हर माह 70 हजार की आय होती हैं। अब वे मछली पालन करने की तैयारी में है।

मृदा जांच लैब लगाई हेमंत सिंह ने 

किसान हेमंत सिंह ने टमाटर की माथाबंदी (मोजेक वायरस) रोग के नियंत्रण के लिए अनुसंधान किया और देशी गाय के दूध का प्रभावी इस्तेमाल किया। उन्होंने मिट्टी जांच के लिए लैब भी लगा रखी है जहां क्षेत्र के किसानों की ले मिट्टी की जांच निशुल्क की जाती है। कृषि विभाग की ओर से यहां अधिकृत किसान सहायता केंद्र भी लगाया गया है।

नर्सरी में एक लाख पौधे तैयार

सब्जी की पौध तैयार करने के लिए किसान ने स्वयं के स्तर पर नर्सरी विकसित की हुई है। इस नर्सरी में एक साथ करीब एक लाख पौध तैयार की जा सकती है। किसान बताते हैं कि कोकोपीट (नारियल खाद) सीडलिंग ट्रे मे पौध तैयार की जाती है। इसके 20 दिन बाद इन पौधों को खेत में लगा देते हैं। वे जलहौज, ड्रिप, मल्चिंग सीट, शेडनेट हाउस व लो-टनल तकनीक का भी इस्तेमाल करते हैं।

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स्रोत:-

एग्रोटेक राजस्थान पत्रिका
रिपोर्टर – कुलदीप सिंह यादव
बांदीकुई (दौसा)

Website – rajsthanptrika

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