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पौष्टिक आहार पशुओं के लिए एक वरदान

पौष्टिक आहार पशुओं के लिए एक वरदान
Written by bheru lal gaderi

भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा यहां गाय-भैंस भेड़-बकरी बहुत अधिक पशुओं की संख्या बहुत अधिक है प.रंतु प्रति पशु उत्पादन बहुत कम है। इसका मुख्य कारण अनुवांशिकता की कमी तथा पोष्टिक व संतुलित आहार की उचित आपूर्ति ना होना हैं। फसल अवशेष ही हमारे पशुओं का मुख्य आहार है। फसल अवशेषों में नाइट्रोजन तथा खनिज की मात्रा बहुत ही कम होती है। जबकि इसमें कार्बोहाइड्रेट ही पर्याप्त मात्रा में होता है परंतु लिग्निल अधिक होने के कारण यह पूरी तरह से उपयोग नहीं कर पाता है। इसलिए फसल अवशेष में अल्प मात्रा में पाए जाने वाले तत्वों की पूर्ति करना अति आवश्यक है।

पौष्टिक आहार पशुओं के लिए एक वरदान

पूरक पोषण का महत्व

यूरिया, शिरा युक्त पशुओं आहार, पशुओं के लिए पूरक पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसके फलस्वरुप पशुओं की उत्पादन क्षमता में सुधार होता है।

स्थानीय सामग्री जैसे गुड़, यूरिया और गेहूं के भूसे के साथ मिलाकर पौष्टिक व संतुलित आहार को बनाया जा सकता है। पशुओं के लिए एक सस्ता एवं संपूर्ण पोषण आहार हैं। इससे पशुओं की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

जुगाली करने वाले पशुओं की प्रमुख विशेषता है कि वे अपनी प्रोटीन तथा ऊर्जा की आवश्यकता केवल नाइट्रोजन तथा रेशेदार आहार से ही पूरा कर लेते हैं। इसके लिए प्रथम आमाशय में असंख्य जीवाणु (बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ, फफूंद आदि) होते हैं जो कि नाइट्रोजन को प्रोटीन, नाइट्रोजन तथा रेशेदार कार्बोहाइड्रेट को वाष्पशील वसा अम्ल में परिवर्तित कर पशुओं में प्रोटीन तथा ऊर्जा प्रदान करते हैं। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि जीवाणुओं की नाइट्रोजन ऊर्जा तथा खनिज की आवश्यकता को पूरा किया जाये। फसलों के अवशेष खिलाने से पशुओं में पोषण में उत्पादन की बात तो दूर इसके सेवन से पाए जाने वाले जीवाणुओं की पूर्ति भी नहीं हो पाती है।

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यूरिया, शिरा तथा खनिज

यूरिया, शिरा तथा खनिज सूखे चारे में मिलाकर खिलाने से पशुओं की जीवन निर्वाहन की आवश्यकता पूरी हो जाती है। इसके लिए पशु पालकों को विशेष परीक्षणों की आवश्यकता होती है क्योंकि अगर तीनो तत्व ठीक प्रकार तथा उचित अनुपात में नहीं मिलाये गए तो यूरिया की विषाक्त से भी मर सकता है। इसको इसलिए कृषकों को पशुपालकों की सुविधा के लिए यूरिया, शिरा खनिज तैयार किया जाता है जो कि पशुओं के लिए हर तरह से सुरक्षित हैं। पशु अपनी आवश्यकता के अनुसार पिंड को चाट सकता है और फसल अवशेष में जो तत्व कम होते हैं उनकी आपूर्ति खनिज पिंड से हो जाती है।

अगर बिनौले अथवा मूंगफली की खली उपलब्ध नहीं हो तो दूसरी खली का उपाय कर सकते हैं। यह पिंड बाजार में भी उपलब्ध होता है परंतु महंगा पड़ता है तथा अवयवों की प्रतिशत मात्रा की विश्वसनीयता नहीं होती। इसलिए पशुपालक के लिए अगर इसे घर पर तैयार कर लें तो यह काफी सस्ता व विश्वसनीय होता है।

पौष्टिक आहार बनाने की विधि

गर्म विधि

सबसे पहले शीरे को गर्म करके उसमें यूरिया केल्साइट पाउडर और सोडियम बैण्टोनाइट डालकर अच्छी तरह मिला लें। मिश्रण को धीरे-धीरे हिलाते हुए उसमें खनिज मिश्रण खली आदि को मिलाये । जब मिश्रण का तापमान 120 डिग्री सेल्सियस हो जाए तो इसको 10 मिनट तक अच्छी तरह मिलाएं और अब सभी पदार्थ अच्छी तरह मिल जाए तो मिश्रण को ठंडा (80-90डिग्री सेल्सियस) कर ले। फिर उचित आकार के सांचे में डालकर ठंडा होने के लिए रख दें।

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ठंडी विधि

इस विधि में यूरिया, कैल्शियम, ऑक्साइड (चूना) का प्रयोग किया जाता है। चुने के मिश्रण को मिलाकर ही इतनी गर्मी पैदा हो जाती हैं कि सारे मिश्रण को अर्द्धतरल अवस्था में बदल देती हैं तथा मिश्रण को सांचों में डालकर आसानी से पिंड बनाया जा सकता है।

यूरिया, शिरा खनिज पिंड खिलाने के लाभ

  1. पशु को पाचन शील कार्बनिक पदार्थ अधिक मिलता है।
  2. पशुओं द्वारा सूखे चारे तथा फसल अवशेष को खाने की मात्रा बढ़ जाती है क्योंकि इसमें प्रोटीन ऊर्जा तथा खनिज मौजूद होते हैं। जिससे आमाशय में उपस्थित जीवाणुओं की प्रक्रिया तथा उनकी संख्या में काफी बढ़ोतरी हो जाती है। सूखे चारे की पाचन क्षमता तथा आगे बढ़ने की क्षमता बढ़ जाती है। पशु अधिक आहार लेता है जो कि पशु के लिए लाभदायक है।
  3. जीवाणु अधिक प्रोटीन का निर्माण करते हैं जिससे वयस्क पशु की प्रोटीन की आवश्यकता पूरी होती है।
  4. वाष्पशील वसा अम्ल ज्यादा बनता है जो की जुगाली करने वाले पशुओं की ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत है। वयस्क पशु को इतनी उर्जा रखरखाव के लिए पर्याप्त होती है। यह कार्य जीवाणु करते हैं।
  5. यूरिया शिरा, खनिज पिंड सूखे चारे के साथ खिलाने से मीथेन गैस कम बनती है जो कि वातावरण को प्रदूषित होने से बचाता है।

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प्रस्तुति:-

रमेश कुमार साँप, कृषि अनुसंधान अधिकारी (कीट), ए.टी.सी., जोधपुर,

कल्पना यादव (स्नातकोत्तर), पौध व्याधि विभाग,

राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर (राज.)

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