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पोटाश का प्रयोग एवं महत्व कपास की फसल में

पोटाश का प्रयोग एवं महत्व कपास की फसल में
Written by bheru lal gaderi

कपास एक महत्वपूर्ण नगदी फसल हैं। हमारे देश में कपास की फसल लगभग 102 लाख हेक्टेयर भूमि पर उगाई जाती हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश और राजस्थान कपास उगाने वाले प्रमुख राज्य हैं। भारत में कपास की औसत उपज मात्र 300-400 किग्रा. प्रति हेक्टेयर हैं। पंजाब और हरियाणा में कपास की औसत उपज देश की औसत उपज से डेढ़ गुणा हैं। समुचित पौध पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश तत्वों ) का प्रयोग करते हुए उन्नत ढंग से खेती की जाये तो उन्नतशील किस्मों से उत्पादकता 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती हैं।

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बीज व रोपाई

बिजाई के लिए बिनोली का उपचार कर रुई के रेशे नष्ट कर लें। गंधक के तेजाब से बीजोपचार सर्वोत्तम रहता हैं। देशी कपास के लिए 15-20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा संकर कपास के लिए 3-4 किग्रा. प्रति हैक. बीज की आवश्यकता होती हैं। अपने क्षेत्र के लिए सिफारिश की गई किस्म का बीज लें। देशी कपास में कतार से कतार की दुरी 60 सेमी. व पौधे से पौधे की दुरी 30 सेमी. रखें। संकर कपास में कतार से कतार की दुरी 90 सेमी. व पौधे से पौधे की दुरी 45 सेमी. रखे। सिंचित क्षेत्र में कपास की बुवाई अप्रेल-मई में की जा सकती हैं। बारानी क्षेत्र क्षेत्र में बिजाई का समय वर्षा पर निर्भर करता हैं।

कपास की फसल पोषक तत्वों की मात्रा (किग्रा./हे.)

फसल

नाइट्रोजन फॉस्फोरस

पोटाश

संकर कपास

120

60

60

अमेरिकन कपास

75

40

40

देसी कपास

50

25

20

बी.टी. कपास

120

60

60

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उर्वरक उपयोग

कपास की उम्दा व अधिक उपज के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश(Potash) तत्वों की संतुलित उपयोग जरूरी हैं।

कपास में पोटाश की भूमिका

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  1. पोटाश पौधे के विकास में उत्प्रेरक का कार्य करता हैं।
  2. इससे पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में बढ़ावा मिलता हैं। जिससे पौधों में खुराक ज्यादा बनती हैं और पौधा स्वस्थ रहता हैं।
  3. पोटाश प्रकाश संश्लेषण से तैयार पदार्थ को फूल व टिण्डोंतक स्थानांतरित करने में मदद करता हैं।
  4. सफेद मक्खी के प्रकोप से बचाव का काम करता हैं।
  5. पौधों की जड़ों का तना, मजबूत, लम्बा और स्वस्थ बनाने में पोटाश बहुत मदद करता हैं जिससे पौधों को दूसरे पोषक तत्व और पानी सम्पूर्ण मात्रा में मिल जाते हैं।
  6. फसल को पोटाश देने पर नाइट्रोजन और फास्फेट से मिलने वाले लाभ में वृद्धि होती हैं। पौधों को संतुलित खुराक मिलती हैं। साथ ही अधिक नाइट्रोजन के उपयोग से होने वाली हानि को भी रोकता हैं।
  7.  पौधे में पोटाश से पानी का नियमित होता हैं, पौधों में स्वस्थ जड़ों का विकास होता हैं अतः बारानी खेती से आदिक लाभकारी रहता हैं।
  8. पोटाश पौधों में मजबूती लाकर फसल में होने वाली बिमारियों और नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों से बचने की शक्ति बढ़ाता हैं।
  9. कपास के रेशे की लम्बाई और मजबूती पोटाश से बढ़ती हैं। जिससे उत्पादन में वृद्धि होती हैं।

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पोटाश की कमी के लक्षण

पोटाश की कमी के लक्षण

  • पुराणी पत्तियों के नोको या किनारों से पीला पड़ना, बाद में उत्तकों का मरना और पत्तियों का सुखना।
  • तने और जड़े पतले कमजोर होते हैं।
  • पोधो की वृद्धि एवं विकास में कमी।
  • निराई तथा गुड़ाई

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खरपतवार नियंत्रण के लिए तीन बार निराई गुड़ाई करनी चाहिए। पहली गुड़ाई कसोला से पहली सिंचाई से पहले करें। बाद में हर सिंचाई या वर्षा के बाद हल या कल्टीवेटर से निराई-गुड़ाई करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए रसायनों का प्रयोग भी कर सकते हैं। फसल उगने से पहले पेंडिमिथालिन (स्टोम्प 30) का प्रयोग पांच किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से करने पर साठी व सावंक किस्म के खरपतवारों का नियंत्रण पूरी तरह से हो जाता हैं।

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कपास में बिजाई के 40-45 दिन के बाद सुखी गुड़ाई के पश्चात ट्रेफलान ढाई लीटर प्रति हेक्टेयर या स्टोम्प तीन लीटर प्रति एकड़ का 500-600 लीटर पानी में घोल से उपचार के पश्चात सिंचाई करने से भी वार्षिक खरपतवारों का उचित नियंत्रण हो जाता हैं।

सिंचाई

फूल और फल आते समय नमी के अभाव से फसल पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं। इससे फसल को बचाना चाहिए नहीं तो फल-फूल झड़ जाएंगे, जिससे उपज कम हो जाएगी। सिंचित कपास की फसल में वर्षा के हिसाब से 3 से 4 बार सिंचाई करने की आवश्यकता पड़ती हैं। पहली सिंचाई जितनी देर से की जाये अच्छी हैं परन्तु फसल को नुकसान नहीं होना चाहिए। आखिरी सिंचाई एक-तिहाई टिंडों के खुलते ही कर दें। इसके बाद कोई सिंचाई न करें।

पौध संरक्षण

हरा तेला, सफेद मक्खी, चित्तीदार व गुलाबी कपास के प्रमुख कीड़े हैं परन्तु अनुकूल मौसम, परिस्तिथिया मिलते ही अमेरिकन सुंडी में भी कपास की प्रमुख शत्रु बन जाती हैं। इसके अतिरिक्त रोयेदार सुन्डिया (कातरा) चेपा, चूरड़ा, कुबड़ा, कीड़ा, स्थि टिड्डा, लाल व भूरे धूसर कीड़े एवं दीमक आदि पौधों के विभिन्न भागों को हानि पहुंचाते हैं।

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माहु सफेद मक्खी व जेसिड

माहु सफेद मक्खी व जेसिड के नियंत्रण हेतु मेथोएट 400 मिली. प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें। इमिडाक्लोरपीड़ 200 एस.एल. 50 मिली. या 400 मिली. प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

गुलाबी सुंडियां

बीज को भंडारण के समय एल्युमिनियम फास्फाइड की एक टिकिया 3 ग्राम प्रति गहन मीटर क्षेत्र की दर से 48-72 घंटे तक धूमित करें। इससे बीज में छिपी गुलाबी सुंडियां नष्ट हो जाएगी।

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दीमक

दीमक के प्रकोप से बचाव के लिए बीज को 10 मिली. क्लोरपायरीफास 20 इ.सी. की प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें। 10 मिली. क्लोरपायरीफास में 10 मिली. पानी मिलाये तथा उस सफेद घोल से एक किलो ग्राम भिगोये हुए बीज को उपचारित करें। उपचारित बीज को 30 मिनट तक छाया में सुखाकर बोये।

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पौधों का निरक्षण

हर खेत में नियमानुसार पौधों का निरक्षण करें कीड़ों की गिनती करें तथा इनकी संख्या आर्थिक कगार पर पहुंचते ही सिफारिश किये गए रोकथाम के ढंग अपनाये। सिफारिश की गई कीटनाशियों का विधिवत छिड़काव करें तथा बाद में भी फसल पर कीड़ों का सर्वेक्षण जारी रखे। तथा देखते ही वह कौन

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कौन से कीड़ों एवं परजीवियों स प्रभावित हैं। चुने पौधों पर कीड़ो की गिनती करें तथा इनकी संख्या आर्थिक कगार पर पहुंचते ही सिफारिश किये गए रोकथाम के ढंग अपनाये। सिफारिश की गई कीटनाशयों  का विधिवत छिड़काव करें तथा बाद में भी फसल पर कीड़ों का सर्वेक्षण जारी रखें।

श्याम वर्ग (एन्थ्रैक्रोज) कपास की फसल में लगने वाला प्रमुख रोग हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.3% थाइरम या केप्टान से बीजोपचार करें। 15 दिन के अंतराल पर कॉपर ऑक्सीक्लोाइड या 0.15% कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें।

चुनाई

अच्छे ऍम प्राप्त करने के लिए कपास को साफ व सूखा चुने। अमेरिकन कपास की चुने 15-20 दिन और देशी कपास की चुने 8-10 दिन के अन्तर पर करें। कपास का सूखे गोदामों में भंडारण करें और इसे मंडी स्तर पर बेचे।

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