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पॉली हाउस की खेती का परिचय एवं महत्व

पॉली हाउस
Written by bheru lal gaderi

पॉली हाउस की खेती एक विशेष सिद्धांत पर आधारित हैं जिसे ग्रीन हाउस प्रभाव कहां जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी भू-भाग को पॉलिथीन या किसी अन्य आवरण से ढका जाता है तो उस भू-भाग का तापमान सामान्य वातावरण के तापमान से 5-7 डिग्री सेंटीग्रेड अधिक होता है, तापमान की अधिकता ढकने वाले पदार्थ पर भी निर्भर करती हैं।

पॉली हाउस

यह बढ़ा हुआ तापमान उस भाग को संभाल कर खेती के अनुकूल बना देता है। ढके जाने वाले पदार्थ के आधार पर यह संरचनाएं पॉलिथीन का उपयोग कर बनाए जाने वाले ढांचे, पॉलीहाउस कांच का उपयोग कर इस प्रकार की संरचना बनाई जाती है, जो उसे ग्लास हाउस पदार्थ अगर नेट है, तो उसे नेट हाउस करते हैं। इन सभी प्रकार की व्यवस्थाओं को सामान्य भाषा में ग्रीनहाउस कहा जाता है।

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पॉली हाउस तकनीक से अधिक उत्पादन:-

बागवानी फसलों के उत्पादन और आवश्यकता में बहुत अंतर है। इस अंतर को कम करने के लिए परंपरागत बागवानी द्वारा जितने कृषि योग्य क्षेत्र की आवश्यकता है उतना बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर उपलब्ध होना असंभव है। ग्रीन हाउस तकनीक उत्पादकता के आधार पर क्षेत्र से अधिक उत्पादन उपलब्ध करने में सक्षम है। यदि देश में वर्तमान सब्जी तकनीक का उपयोग किया जाए तो सब्जियों के वार्षिक उपलब्धता एक करोड़ टन बढ़ सकती है।

पोली हॉउस में सब्जियों में प्रमुखता खीरा विभिन्न प्रकार के शिमला मिर्च एवं टमाटर की खेती लाभप्रद है जबकि फूलों में जरबेरा, कॉर्नेशन एवं गुलाब अधिक लाभप्रद सिद्ध हुए हैं. साथ ही कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक रोजगार का विकास होगा जिन्हे शिक्षित युवा वर्ग एवं महिलाएं अपना सकती हैं। इनमें मनचाही फसल किसी भी मौसम में उगाई जा सकती है।

पॉली हाउस तकनीक से प्रति इकाई क्षेत्रफल उत्पादन (4 से 5 गुना) तो अधिक मिलता है साथ ही बे-मौसमी फल, सब्जियों और फूलों की कीमत बहुत अच्छी मिलती है। इस तकनीक से प्राप्त उत्पादन की गुणवत्ता उच्च कोटि की होती है. इस सिद्धांत को अपनाकर शिक्षित युवा रोजगार प्राप्त कर अच्छा धन अर्जित कर सकते हैं। किसानों को ग्रीन हाउस की स्थापना के लिए राज्य सरकारों द्वारा अनुदान दिया जा रहा है।

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पॉली हाउस में प्रो-ट्रे पौध तैयार करना:-

प्लास्टिक ट्रे अथवा प्रो-ट्रे प्लास्टिक की बनी हुई ट्रे होती है जिसमें सांचेनुमा छोटे छोटे कक्ष होते हैं। इन कक्षों में बीज डालकर ट्रे को नियंत्रित वातावरण में रखकर पौध तैयार की जाती है।

प्रो-ट्रे में पौध तैयार करने का तरीका निम्न प्रकार है:-

मिश्रण माध्यम तैयार करना:-

प्रो-ट्रे में मृदारहित माध्यम भरा जाता है। यह माध्यम निर्मिकृत कोकोपीट, परलाइट एवं वर्मीकुलाइट का मिश्रण होता है। इस माध्यम को तैयार करने के लिए साफ जगह या पक्के फर्श पर पॉलिथीन बिछा कर दो तगारी कोकोपीट, एक तगारी परलाइट एवं एक तगारी वर्मीकुलाइट डालकर इस मिश्रण पर पानी छिड़कना चाहिए। पानी मिलाते समय ध्यान रखें कि मिश्रण ना तो सूखा रहना चाहिए और ना ही अधिक गिला रहे। ऐसे मिश्रण को साफ-सुथरी एवं उपचारित प्रो-ट्रे में भर लिया जाता है। इस प्रकार भरी हुई ट्रे बुवाई के लिए तैयार होती है।

इस माध्यम में वर्मीकुलाइट, परलाइट एवं कोकोपीट का अपना अपना महत्व होता है। वर्मीकुलाईट में दो भाग एलुमिना एवं एक भाग सिलिका होती है तथा यह फैलने वाले खनिज क्ले होती है इसकी जल धारण क्षमता अधिकतम होती है। परलाइट सफेद बारीक़ पाउडर होता है, जो माध्यम में वायु संचार बढ़ाता है तथा साथ ही माध्यम का तापमान भी नियंत्रित करता है। कोकोपीट कार्बनिक पदार्थ होने के साथ माध्यम को बांधकर रखने का कार्य करता है।

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प्रो-ट्रे में बुवाई करना:-

बुवाई करने के लिए उन्नत किस्में एवं उपचारित बीजों का इस्तेमाल करें। प्रो-ट्रे में छोटे-छोटे कक्ष होते हैं। एक कक्ष में एक बीज डालना होता है। बीज को उंगली से इतनी गहराई तक ही दबाए की ऊपरी भाग सतह पर दिखाई दे। इसके बाद एक पतली परत के रूप में माध्यम डाल दिया जाता है। ततपश्चात झारे की सहायता से हलका पानी दिया जाता है। पानी देने के बाद पॉलिथीन अथवा थर्माकोल शीट से प्रो-ट्रे को ढका जाता है। इसे समतल स्थान पर तथा जमीन से ऊपर रखने हेतु लोहे के अथवा लकड़ी के स्टैंड का इस्तेमाल करें।

प्रो ट्रेन में पौधे का रखरखाव:-

बुवाई के 2 दिन पश्चात प्रो-ट्रे के ऊपर से आवरण पॉलिथीन थर्माकोल शीट को हटा लिया जाता है तथा एक दिन छोड़कर एक दिन पानी दिया जाता है। प्रो-ट्रे को कीटरोधी नेट से बने कक्ष में रखना चाहिए जिससे पौधों को कीट एवं रोग मुक्त रखा जा सके। कक्ष को पॉलीथिन से ढककर तापमान नियंत्रित किया जाता है। इस प्रकार पौध 25 से 30 दिन में स्थानांतरण करने योग्य हो जाती हैं।

पौध निकालते समय तने से पकड़कर, प्रो-ट्रे के कक्ष को अंगुली से ऊपर की तरफ उठाया जाता है, जिससे माध्यम सहित पो-ट्रे के बाहर आ जाती हैं। ऐसी पौध में जड़ सफ़ेद धागे की तरह माध्यम के आसपास लिपटी रहती है। उपयुक्त वातावरण में शाम के समय पौध को खेत में स्थानांतरित किया जाता है तथा पौध लगाने के तुरंत पश्चात खेत की सिंचाई की जाती हैं।

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प्लंटिंग बेड तैयार करना:-

पॉली हाउस में प्लांटिंग बेड बनाने के लिए उस क्षेत्र में कंकड़, पत्थर एवं अन्य अवशेष हटाकर जमीन को समतल कर देना चाहिए। तत्पश्चात वहां पर 20 टन तालाब की मिट्टी, 1 टन हुई गोबर की खाद, 1 टन पीली मिट्टी 1000 वर्ग मीटर के हिसाब से डालकर अच्छी तरह से पानी भर देना चाहिए। सिंचाई के तीन से चार दिन बाद रेखांकन कर लगभग 1 फीट ऊंची क्यारियां बनानी चाहिए। मृदा अधिक गीली अथवा अधिक सुखी नहीं होनी चाहिए अथवा क्यारिया नहीं बन पाएगी। इस प्रकार तैयार क्यारियों पर लगभग 10 सेमी की परत का माध्यम की मिलानी चाहिए, जिसमें निम्न प्रकार से अवयव मिलाने चाहिए।

वर्मीकंपोस्ट

3 भाग

कोकोपीट

1 भाग

वर्मीकुलाइट

1 भाग

लकड़ी का बुरादा

3 भाग
नीम की खली

1 भाग

चावल की भूसी

3 भाग

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क्यारियों में पौधारोपण:-

क्यारियों की संख्या

18
प्रति क्यारी में लगने वाले पौधे

124

एक पॉली हाउस में कुल पौधों की संख्या

2232

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(50X45 से.मी.) – 2232

(50X30 से.मी.) – 3350

(50X60 से.मी.) – 1680

अच्छी तरह से तैयार क्यारियों पर दो ड्रिप लाइन प्रति क्यारी के हिसाब से बिछानी चाहिए। दो ड्रिप लाइन के बीच 50 सेमी की दूरी रखनी चाहिए। तत्पश्चात एक ड्रिप के साथ-साथ प्रति 45 सेमी की दूरी पर एक एक पौधा लगाना चाहिए।

पूरी पंक्ति में पौधे लग जाए उसके बाद सामने वाली कतार में दो पौधों के बीच में आने वाले स्थान पर एक एक पौधा लगाना चाहिए। जिससे प्रत्येक पौधे को पर्याप्त स्थान मिल पाएगा। दोनों पंक्तियों में पौधे आमने सामने नहीं लगाने चाहिए।

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पॉली हाउस में प्लांटिंग बेड्स का निर्जलीकरण (फ्यूमिगेशन):-

सर्वप्रथम क्यारियों की निराई-गुड़ाई कर खरपतवार एवं पुरानी फसल के अवशेष हटा देने चाहिए। तत्पश्चात पूरी क्यारियों के 40-50 माइक्रोन पॉलीथिन से ढक देना चाहिए। प्रत्येक क्यारी में 7 मीटर के अंतराल पर एक-एक पोट्रीडिश में 10 ग्राम पोटेशियम परमेंगनेट क्रिस्टल भर के रख देना चाहिए।

जहाँ-जहाँ पोट्रीडिश रखी गई हैं वहां पॉलिथीन को थोड़ा सा हटा देना चाहिए। उसके बाद एक बीकर में फार्मेल्डिहाइड लेकर एक-एक पोट्रीडिश में डाला जाता है। इसके तुरंत पश्चात पॉलिथीन ढँक दिया जाता है।

ध्यान रहे कि पोट्रीडिश में फार्मेल्डिहाइड डालते ही उसमें तीव्र गैस निकलती है, जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है। अतः तुरंत उस पोट्रीडिश को पॉलीथिन से ढक कर रखने के बाद ही दूसरी पेट्रीडिश में फार्मेल्डिहाइड डालना चाहिए।

संपूर्ण उपचार बहुत शीघ्र करना चाहिए। फॉर्मेलिन डालने के तुरंत बाद पूरी यूनिट को कम से कम 24 घंटे के लिए बंद रखा जाता है। अगले दिन पॉलिथीन हटाकर क्यारियों की खुदाई कर रोपाई कि जाती हैं। फ्यूमिगेशन करने से मृदा में उपस्थित कई प्रकार के हानिकारक जीव नष्ट हो जाते हैं जिससे फसल में कम से कम बीमारियां होती हैं।

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