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उत्तक संवर्धन पादप जैव प्रौद्योगिकी का कृषि विकास में योगदान

पादप उत्तक संवर्धन जैवप्रौद्योगिकी
Written by bheru lal gaderi

जैवप्रौद्योगिकी अर्थात बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology) शब्द का उद्धगम बायोलॉजी एवं टेक्नोलॉजी शब्दों से हुआ हैं। सजीव कोशिकाओं (पादप, जंतु अथवा सूक्षम जिव) व उनके अवयवों का नियंत्रित उपयोग से मानव के लिए उपयोगी उत्पादों के निर्माण की तकनीक को जैवप्रौद्योगिकी कहते हैं। जब पौधों में आनुवंशिक सुधार, उसके निष्पादन से सुधार या उनसे विभिन्न उत्पादों के उत्पादन में वृद्धि जैवप्रौद्योगिकी के इस क्षेत्र में उत्तक संवर्धन (Tissue culture) की अहम भूमिका हैं। इस तकनीक के उपयोग से पर्यावरण की अनेक ज्वलंत समस्याओं के निराकरण में मदद मिली हैं।

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पादप उत्तक संवर्धन (Plant tissue culture) एक ऐसी तकनीक हैं जिसमे किसी भी पादप ऊतक (जड़, तना, परं व पुष्प आदि) को पात्रे (विट्रो) निर्जर्मित  परिस्तिथियों में, कृतिम संवर्धन माध्यम पर संवर्धित किया जा सकता हैं। यह पूर्ण शक्तता के सिद्धांत पर आधारित हैं। इस सिद्धांत के अनुसार पौधे की प्रत्येक कोशिका एक पूर्ण पौधे का निर्माण करने में सक्षम हैं। हैबरलांट (1902) ने कोशिका की पूर्ण शक्तता की संकल्पना दी। इसके लिए इन्हे पादप उत्तक संवर्धन का जनक कहां जाता है

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1940 से 1978 तक साइटोकैनिन्स व अन्य वृद्धि नियंत्रक पदार्थों की उत्तक संवर्धन कार्य में उपयोगिता सिद्ध होने के बाद, इस क्षेत्र में शोध कार्य में तीव्र गति से प्रगति हुई, जिससे उत्तक संवर्धन एक महत्वपूर्ण शाखा के रूप में स्थापित हुई, जससे संवर्धन एक महत्वपूर्ण शाखा के रूप में स्थापित हुई। गोथेरोट, ह्वाइट व नोबेकॉर्ट जैसे वैज्ञानिकों ने इसे एक ठोस धरातल प्रदान की। भारत में गुहा और माहेशवरी (1966-67) में तम्बाकू तथा धतूरा के परागकणों तथा लघु बीजाणुजन कोशिकाओं से अगुणित भ्रूणों को विकसित किया। 1990 के उत्तरार्ध में उत्तक संवर्धन प्रोद्द्योगिकी की उपयोगिता, कृषि तथा उद्द्योग क्षेत्र में स्थापित होने के बाद, अगुणित प्रजनन, क्लोनल प्रवर्धन, म्युमेंट संवर्धन, रोगाणु मुक्त संवर्धन, द्वितीय उत्पादों के उत्पादन तथा आनुवंशिक अभियांत्रिकी जैसी विधाओं का विकास किया गया। सैकड़ों पौधों का इन पात्रे (विट्रो) क्लोनल संवर्धन किया गया।

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जैवप्रौद्योगिकी की उपलब्धियां मुख्यतः संवर्धन तकनीकों जैसे उत्तक कोशिका, निलंवत तथा जिव द्रव्यक संवर्धनों की दक्षता तथा सफलता पर निर्भर करता हैं। पादप से विभिन्न अंगों से एक्सप्लांट (कर्त्तोंतक) प्राप्त कर इनका कृतिम संवर्धन माध्यम पर संवर्धन कर केलस (सेल्यूज) उत्पन्न करने को उत्तक संवर्धन कहते हैं।

पादप उत्तक संवर्धन की उपलब्धियां

फसल सुधर व उद्द्यानिकी के क्षेत्र में उत्तक संवर्धन तकनीक की एक महत्वपूर्ण भुमका रही हैं। जैसे प्रोद्द्योगिकी की इस तकनीक से नई उपलब्धियां अर्जित की गई हैं जिनका उल्लेख आवश्यक हैं।

पादप उत्तक संवर्धन जैवप्रौद्योगिकी

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सूक्ष्म संवर्धन द्वारा पौधों का संवर्धन

Promotion of plants by micro-enrichment

इसमें पौधों को अलैंगिक विधि से गुणित करना होता हैं। इसमें मुख्य रूप से पौधों के कायिक भागों को काम में लिया जाता हैं। इस विधि से कम समय व कम स्थान से विशाल संख्या में पौधों (क्लोन) का उत्पादन प्रयोगशाला की निर्जिमित परिस्तिथियों में किया जाता हैं। इसमें आरम्भिक एक्सप्लांट के रूप में अलप मात्रा में उत्तक की  आवश्यकता होती हैं।

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बहुगुण प्ररोहकों के उत्पादन द्वारा केंद्रीय अनुसंधान संस्थान, शिमला ने आलू की कुफरी किस्मों के सूक्ष्म प्रवर्धन किए हैं। विभज्योत्तक संवर्धन से आलू में पोटेटो वायरस इस तथा पोटेटो वायरस एक्स (पीवीएक्स) मुक्त पौधे तैयार किये जा चुके हैं। इसके अलावा गन्ना, शक्करकंद, स्ट्राबेरी, गोभी, कार्नेशन व डहेलिया आदि के रोगमुक्त पौधे भी विकसित किये जा चुके हैं।

पुंजनीय अगुणितो का उत्पादन अथवा पराग संवर्धन

Production of coronary haploid or pollen

पादप उत्तक संवर्धन द्वारा परागकण एवं बीजाण्ड का संवर्धन कर अगुणित पादप प्राप्त किए जा सकते हैं। पादप प्रजनको के लिए अगुणित बहुत उपयोगी होते हैं क्योंकि अगुणितो से संयुग्मजी द्विगुणित एवं बहुगुणित पादप प्राप्त कर सकते हैं। प्रकृति में इनकी स्वतः उत्पत्ति कम होती हैं। जैवप्रोद्द्योगिकी तथा संवर्धन तकनीकों के सुधार से अब पूजनीय अगुणितो को कृतिम माध्यम से बहुत सहजता से संवर्धित किया जा सकता हैं।

जापानी कोशिका विज्ञानी शाइकेमुरा (1934)में अर्द्ध सूत्री विभाजन की कार्यिक का अध्ययन करने हेतु पुंकेसरों का पात्रे संवर्धन किया। इसी प्रकार गुहा मुखर्जी एवं इसी प्रकार गुहा मुखर्जी एवं एस. सी. माहेश्वरी (1966) ने धतूरा के परागकणों का संवर्धन, काईनेटिन युक्त माध्यम पर कर पूजनीय अगुणितो को विकसित करने में सफलता प्राप्त की।

परागकणों से विकसित अगुणितो का गेहू, चावल व तम्बाकू आदि फसल सुधार कार्यक्रमों में व्यापक उपयोग किया गया हैं।

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सफल संकरण के लिए भ्रूण विमुक्तन

Embryonic vibration for successful hybridization

पादप प्रजनन की परम्परागत संकरण विधियों में अन्तरजातीय संकरण साधारण साधारण तथा सफल नहीं होते क्योंकि इन अपेक्षाकृत संकरणो में भ्रूणों में मर्त्यता तथा बीजों में नष्ट होने की उच्च दर होती हैं। इन शीग्रता से नष्ट होने वाले भ्रूणों को परिवर्धनशील अवस्था में ही मादा जनक के भ्रूण कोष से निकालकर उपयुक्त संवर्धन माध्यम में संरोपित व संवर्धित कर जननक्षम संकर पादप प्राप्त किये जा सकते हैं।

भ्रूण विमुक्तन तकनीक से चावल की ओराइजा ऑफिसिनेलिस जाती के फुदका प्रतिरोधी जीनों को ओ. स्टाइवा में स्थानांतरित किया गया। इसी प्रकार टमाटर की लाइकोपर्सिकन पेरू वियेनम के उच्च विटामिन ‘सी’ तथा रोग व कीट प्रतिरोधी जीनों को ला. एस्कुलेंटम में डाला गया।

कायक्लोनी विभिन्नताए – Cyclone variations

उत्तक संवर्धन से प्राप्त पौधों की संततियों में गुणात्मक तथा भावनात्मक दोनों ही प्रकार के लक्षणों में विविधता पाई जाती हैं। इनमे अधिकांश स्थिर एवं वंशानुगत कायिक क्लोनिय परिवर्तन जीन उतपरिवर्तन के कारण उतपन्न होते हैं।

इन के क्लोनी परिवर्तियों की पहचान व विलगन के लिए पोष माध्यम में ऐसे कारकों को मिलाया जाता हैं जिनकी उपस्थिती में केवल उत्परिवर्ति कोशिकाए ही वभाजित होती हैं जबकि सामान्य कोशिकाए विभाजित नई हो पाती व अन्ततः मर जाती हैं। इस विधि द्वारा लवण सहिष्णु, आविषरोधी, प्रतिजैविकरोधी, शाकनाशिरोधी आदि उत्परिवर्तियों का चयन संभव हुआ हैं।

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सोमोक्लोनल विविधताओं की सहायता से गेहू में रस्ट प्रतिरोधी व उच्च तापक्रम सरल किस्मों का विकास, चावल में टुंगरो वायरस व लीफ हॉपर प्रतरोधी किस्मों का विकास, मक्का में कवक रोधी किस्मों का विकास, आलू की उच्च प्रोटीन व पछेती अंगमारी प्रतिरोधी किस्मों का विकास, टमाटर में उच्च भंडारण क्षमता वाली किस्में, गन्ने में फिजी वायरस प्रतिरोधी किस्में तथा तम्बाकू ककी जीवाणु प्रतिरोधी किस्म का विकास संभव हुआ हैं।

त्रिगुणितों का उत्पादन – Production of triples

त्रिगुणित सामान्यतः बीज रहित होते हैं। आर्थिक दृष्टि से कई महत्वपूर्ण पौधे जैसे सेव, केला, चुकंदर, चाय आदि व्यापारिक उपयोग में त्रिगुणित पौधों के रूप में काम में आते हैं। प्रकृति में त्रिगुणितो का निर्माण चतुर्गुणितव द्विगुणित के मध्य संकरण से होता है। लेकिन उत्तक संवर्धन से त्रिगुणित पौधे आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके लिए भ्रूण कोष (3 एक्स) संवर्धन विधि काम में ली जाती हैं। प्रो. बी.एस. जोहरी व संत सिंह भोजवानी ने संवर्धन से अंग निर्माणकर दिखाया। इसके पश्चात् अन्य कई पौधों जैसे साइट्रसव चंदन आदि में भ्रूण पॉश संवर्धन किया गया।

कृत्रिम बीज उत्पादन – Artificial seed production

कायिक भ्रूण जनन द्वारा उत्पन्न कायिक भ्रूणों से कृत्रिम बीजों को निर्मित किया जा सकता है। उत्तक संवर्धन द्वारा क्लोनिय प्रवर्धन की परम्परागत विधियों के साथ प्रवध्यों के भण्डारण व परिवहन की समस्याओं से बचने के लिए कृत्रिम बीजों का विकास किया गया।

कृत्रिम बीजों के निर्माण में कायिक भ्रूणों को एल्जिनेट की उपयुक्त पीठिका से अवतरित कर दिया जाता है। पीठिका में एल्जिनेट के अतिरिक्त पोषक वृद्धि, कवक व कीटनाशी तथा खरपतवारनाशी और प्रति जैविक पदार्थ भी सम्मलित किये जाते है। इन्हे सुखाया नहीं जाता है अतः चिपचिपे होते है तथा खुली हवा में ही सुख जाते है।

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इन्हे जलयोजित बीज कहते है। इन बीजों का भण्डारण लगभग एक वर्ष तक किया जा सकता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर बिना क्षति के परिवहन संभव है। सीधे खेत में बोन के काम में लिया जा सकता है। इनकी जीवन क्षमता अधिक होने के साथ कोई रोग करक नहीं होने से जनन द्रव्य विनियम कार्यक्रम व पादप पुर स्थापन की दृष्टि से उपयुक्त है।

जनन द्रव्य संरक्षण – Germoplasm protection

किसी भी जीव के अनुवांशिक संघठन को उसका जनन द्रव्य कहते है। वर्तमान समय में कई उपयोगी व उत्तम गुणों वाले पौधे तीव्र गति से लुप्त होते जा रहे हैं। इन पौधों के जनन द्रव्य को उत्तक संवर्धन की सहायता से संरक्षित किया जा सकता हैं। इस विधि से जनन द्रव्य को लम्बे समय तक भंडारण के लिए संबंधिक उत्तक को हिमशीतल करने के पश्चात् इसे १९० डिग्री पर द्रव नत्रजन में रखते हैं। इस विधि को निम्न तप संरक्षण कहते हैं। इस विदी से कम स्थान में लम्बे समय तक जनन द्रव्य, को संरक्षित किया जा सकता हैं। क्लोनिंग द्वारा प्रवर्धित पादपों व अत्यंत कम जीवन क्षमता वाले बीजों के भंडारण के लिए यह विधि अत्यंत उपयोगी हैं।

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दूरस्थ संकरण के लिए जीव द्रव्य – Biomass for remote hybridization

जीव द्रव्यक प्रोद्द्योगिकी से दूरस्थ संकरणों में भी जननक्षम संकर उत्पन्न किया जाना सभव हुआ हैं। इनकी संतति में उपयोगी गुणों जैसे शुष्कता प्रतिरोधी, कीट व रोगाणु प्रतिरोधी, शीत व पाला सहृाता, शाकनाशी प्रतिरोधी तथा साइटोप्लाज्मिक नर बाध्यता आदि का अवलोकन कर प्रतिरोधी किस्मों का विकास किया जा सकता हैं। इसके सफल उदाहरण निम्न हैं-

1. अंतरजातीय संकरण – Intermediate hybridization

  • ब्रेसिका ऑलेरेसिया x ब्रे केम्पेस्ट्रिस
  • लाइकोपरसिकन एस्क्युलेंटम x ला. पेरुवियेनम
  • निकोशियना बेंग्सडोरफाई x निः ग्लूका

2. अन्तरवंशीय संकरण – Intestinal hybridization

  • रेफेनस सटाइबस x ब्रे ऑलेरेसिया-रेफेनोब्रेसिका
  • धतूरा इनोक्सिया x एट्रोपा बेलडोमा
  • ला. एसक्यूलेंटम सोलेनम x ट्यूबरोसम पोमेटो

द्वितीयक उपायचयनो का उत्पादन

Production of secondary solutions

पौधों में अनेक मूल्यवान उपयोगी जैव रसायन पाये जाते हैं जिन्हे अन्य स्त्रोतों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। इन रसायनो को बिना पौधों को नष्ट किए पादप उत्तक संवर्धन द्वारा प्राप्त किया जा सकता हैं। इन रसायनों का उपयोग ओषधि निर्माण व अन्य कार्यों में किया जा रहा हैं। बर्बरीन, व टेक्साल जैसे अनेक रसायन उत्तक संवर्धन द्वारा व्यापारिक स्तर किया जा रहा हैं।

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जीन अभियांत्रिकी

Gene engineering

उत्तक संवर्धन की जिव द्रव्य संवर्धन तकनीक द्वारा जीन स्थानांतरण के पश्चात जिव द्रव्य के उचित माध्यम पर पादपक तैयार किए जाते हैं। ऐसे पादपक परजीवी पादपक कहलाते हैं। जिन स्थानांतरण द्वारा कई फसलों में शाकनाशी प्रतिरोधी, विष्णु प्रतिरोधी व कीट रोधी लक्षणों का स्थानांतरण किया जा चूका हैं। जैसे कपास में बॉलवर्स प्रतिरोधी जिन का समानेशन।

इन सफलताओं के अतिरिक्त पौधों में प्रजनन चक्र का लघुकरण, बीजों में दीर्घकालीन प्रसुप्ति भंग करने तथा विरल पादपों का प्रवर्धन व रोगमुक्त पादपों का उत्पादन भी उत्तक संवर्धन से संभव हुआ हैं।

Author :- 

डॉ राधे श्याम त्रिपाठी
कृषि विशेषज्ञ
बांसवाड़ा
स्रोत :-
शारद कृषि पत्रिका

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