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पशु खरीद के समय ध्यान देने योग्य बातें

पशु खरीद के समय ध्यान देने योग्य बातें
Written by bheru lal gaderi

पशु खरीद एक कला है। एक कुशल एवं अनुभवी पशुपालक को अधिक उत्पादक क्षमता वाला पशु सीधा एवं सरल स्वभाव का हो, कोई भी उसके पास चला जाए, दूध निकाल ले। पशु स्वस्थ हो रोग ग्रस्त ना हो, पशु को रोग निरोधक टीके जैसे- गलघोटू, पशुमाता, खुरपका, मुंहपका, टीबी (क्षय रोग) जोन्स तथा बुसेलोसिस के टीके लगे हैं या नहीं जानकारी कर ले। यदि ये टीके न लगे हो तो लगवा लेना चाहिए।

पशु खरीद के समय ध्यान देने योग्य बातें

दुधारू पशु खरीद के समय उसकी नस्ल की जानकारी होना आवश्यक है। जमीन, जलवायु तथा चारे की उपलब्धता के अनुसार नस्ल का चुनाव करना चाहिए। पशु को चला फिरा कर एवं समस्त अंग-प्रत्यंगों की भली भांति जांच कर लें। पशु को कोई दुर्व्यसन जैसे- मिट्टी खाना, दिवार चाटना, पेशाब पीना आदि तो नहीं है देख ले।

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पशु की उम्र

दुधारू गाय या भैंस एक या दो बार कि ब्याही ही हो क्योंकि अधिक उम्र वाले पशुओं का उत्पादन काल घट जाता है। आमतौर पर 6 से 7 वर्ष की उम्र तक या प्रथम तीन ब्यात तक पशु का दूध बढ़ता है। उसके बाद अगली दो से तीन व्यक्ति उतना ही रहता है। पशु के दूध में वसा की मात्रा उम्र बढ़ने के साथ कम हो जाती है।

दूध निकाल कर देखें

पशु खरीद से पहले कम से कम 3 बार दूध निकाल कर देखें, क्योंकि पशु बेचने वाले कई बार एक समय का दूध छोड़ देते हैं या चीनी आदि खिला देते हैं, जिससे एक समय का दूध निकालने से उसकी मात्रा ज्यादा हो जाती है।

सिंग को देखकर पशु की उम्र का अनुमान ना लगाकर उसके दांतो से लगाना चाहिए। पशु स्वास्थ्य एवं चुस्त दिखाई देना चाहिए। उसके शरीर की बनावट अच्छी हो परंतु ज्यादा मोटी (चर्बी वाली) ना हो, क्योंकि बहुत मोटी खाल वाली गाय या भैंस ज्यादा दूध उत्पादन नहीं देती हैं तथा उन में प्रजनन की समस्याएं भी रहती है।

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अच्छे एवं दुधारू पशुओं को निम्न लक्षण को देखकर पशु खरीद की जा सकती है।

  1. पशुओं के बाहर लक्षण देखकर।
  2. दूध उत्पादन पंजिका देखकर
  3. पशु की वंशावली पंजिका देखकर।
  4. गुणनखंड तालिका बनाकर

गाय या भैंस के बाहरी लक्षण देखकर पशु खरीद 

एक अच्छे एवं दुधारू पशु के निम्न लक्ष्ण होने चाहिए।

सामान्य स्वरूप:- 

गाय या भैंस का स्वरूप नस्ल के अनुसार हो उसके शरीर का विकास अच्छा हुआ हो तथा लंबाई एवं ऊंचाई प्राप्त हो।

स्वभाव:-

बहुत शांत एवं पालतू हो भड़कीला न हो।

डेयरी आकृति:-

शरीर आगे से पतला व पीछे से चौड़ा होना चाहिए ताकि शरीर तिकोना दिखाई दे।

सिर:-

सिर नस्ल के अनुसार होना चाहिए। सींग हल्के, छोटे,गुटठल तथा चिकना होना चाहिए। थूथन चौड़े, नथुने खुले, आंखे चमकदार होनी चाहिए। आँख से पानी तथा कीचड़ न निकलता हो। कान चौकन्ने  तथा स्त्राव न आता हो। मजबूत मांसपेशी वाला होना चाहिए। दांत मजबूत दिखाई देने चाहिए।

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त्वचा:-

हमेशा पतली त्वचा वाला पशु खरीदना चाहिए। त्वचा चिकनी, चमकदार, लचीली तथा चर्म रोग रहित होनी चाहिए। त्वचा पर बाल सुंदर कोमल और चमकदार होने चाहिए।

पीठ व कमर:-

पीठ सीधी, मजबूत और लम्बी तथा कमर चौड़ी एवं समतल होनी चाहिए।

पेट का घेरा:-

पेट बड़ा होना चाहिए। ऐसे पशु चारा अधिक खाने एवं पचाने का सूचक होता है। इससे अधिक दूध उत्पादन की संभावना होती है।

छाती:-

छाती चौड़ी वह गहरी हो तथा कन्धे दूरी पर स्थित हो। शरीर के इस भाग में ह्रदय एवं फेफड़े स्थित होते हैं। जिनका बड़ा आकार अधिक उत्पादन से संबंध रखता है। हड्डियां नहीं दिखनी चाहिए।

पुटठे:-

पुटठे लंबे चौड़े मजबूत व ढालदार होने चाहिए तथा यहां की हड्डियां समुचित दूरी पर होनी चाहिए ताकि वह आते समय पशुओं को तकलीफ ना हो उपस्थित इन बस्ती को दूर दूर होना चाहिए, ताकि ब्याते समय पशु को तकलीफ न हो।

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उपलस्थि (पिन बोन):-

उपलस्थि को दूर-दूर होना चाहिए ताकि ब्याते समय पशु को तकलीफ न हो तथा आयन का आकार बड़ा होने की संभावना रहती है।

कुल्ले की हड्डियां (हिप कूल्हे की हड्डी):-

कुल्ले की हड्डियां भी दूर दूर हो, जिससे जननांगों को अधिक स्थान मिल सके।

पसलियां:-

पशु की पसलियां लंबी चौड़ी मोटी तथा उभरी हुई व दूर दूर हो हाथ लगाकर इन को सुगमता से देखा जा सकता है।

पूंछ:-

लंबी एवं निचे के सिर पर बाल का गुच्छा बड़ा हो।

अयन:-

अयन बड़े आकार का होना चाहिए। इसकी बनावट मुलायम एवं लचीली हो जिससे दूध निकालने के पश्चात वह सिकुड़कर पृष्ठ भाग में सलवटदार हो जाए। अयन सामने से अच्छा फैलाव लिए हो तथा  शरीर से भली भांति जुड़ा हो। ज्यादा लटका हुआ ना हो।

थन:-

थन लंबे तथा बराबर होने चाहिए। चारों तक एक दूसरे से बराबर दूरी पर होना चाहिए तथा बहुत अधिक नहीं झूलने चाहिए। थान छूने पर मुलायम तथा स्पंज जैसा लगना चाहिए। इन में कोई गांठ न हो। थन छोटा-मोटा व लेवटी सख्त हो। उस पर हाथ लगाने से यदि पशु को कष्ट हो तो समझना चाहिए की पशु को थनेला रोग हैं।

दुग्ध शिराए:-

दुग्ध शिराए लंबी एवं टेडी-मेडी हो जिससे यह प्रकट होता है कि अयन में रक्त संचार पर्याप्त मात्रा में होता है, इसे दूध का उत्पादन अधिक होगा।

दुग्ध कूप:-

दुग्ध कूप बड़े आकर का होना चाहिए।

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दूध उत्पादन पंजिका देखकर

इस पंजिका द्वारा पशु के पहले वाले वर्तमान ब्यात का विवरण देखा जा सकता है। इस से यह ज्ञात किया जाता है कि पशु में एक ब्यात में कितने समय और कुल कितना दूध दिया है। इससे उसकी उत्पादन क्षमता का सही अनुमान लग सकता है।

गाय या भैंस की वंशावली पंजिका देखकर

इसके द्वारा पशु के पूर्वजों अर्थात माता-पिता, दादी, नानी का पूर्ण विवरण जाना जाता है। इसमें ब्यात की संख्या, बच्चों की संख्या, उनकी स्वास्थ्य और जन्म-मृत्यु संबंधी लेखा रखा जाता है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए उनके दूध उत्पादन के आधार पर पशु खरीद की जा सकती है।

गुणनखंड तालिका द्वारा

इस विधि द्वारा गाय भैंस का चुनाव करना अन्य विधियों से सरल है। इसमें पशु को प्रत्येक या मुख्य अंगों के लिए निश्चित अंक होते हैं। इन्हीं निर्धारित अंकों में से अंक दिए जाते हैं। यदि पशु 50% अंक प्राप्त करता है तो साधारण, 51-74 प्रतिशत तक उचित एवं 75% यहां अधिक अंक प्राप्त करने पर सबसे उत्तम पशु माना जाता है।

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प्रस्तुति

डॉक्टर कैलाश चंद्र शर्मा एवं रविंद्र कुमार कुमावत,

प्रसार शिक्षा विभाग श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय

 जोबनेर-जयपुर (राज.) 

पिन- 3033239

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