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जैव तकनीक का पशुधन सुधार में उपयोग

पशुधन सुधार में जैव तकनीक का उपयोग
Written by bheru lal gaderi

पशुधन सुधार में जैव तकनीक(Biotechnologyका उपयोग – पशुपालन हमारे देश के 117 मिलियन सीमांत और छोटे किसानों की खाद्य सुरक्षा और आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत है। अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ भारत में दूध और मांस की मांग बढ़ती जा रही है।

पशुधन सुधार में जैव तकनीक का उपयोग

Image Credit – AgriHQ

हालांकि निकट भविष्य में इस मांग को पूरा पूरा करना बड़ी चुनौती होगी। यही कारण है की पशुधन की उत्पादकता को बढ़ाना और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना बहुत जरुरी हो गया है।

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जैव तकनीक के उपयोग की संभावना

इस तकनीक में क्षमता है की इसके जरिये पशुओं की संख्या और पर्यावरण पर दबाव बढ़ाये बिना पशुओं से अधिक से अधिक भोजन प्राप्त किया जा सकता है।

जैव तकनीक के तहत एक उत्पाद को बेहतर या अधिक गुणकों में बनाने के लिए जीवित आर्गेजिम्स या उनके संजोता का कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाता है। जैव तकनीक के सफलतापूर्वक उपयोग में सबसे बड़ी बाधा इसे अपनाने की लागत और स्वीकार्यता है। अच्छी बात यह है की जैव तकनीक के जरिये पशुधन  उत्पादकता बढ़ाने का काम बिना किसी विवाद और प्रकृति पर प्रतिकूल असर डाले बिना करने में सफलता मिली है।

पशुधन में जैव तकनीक को जैविक, रासायनिक और भौतिक तकनीकों में वर्गीकृत किया जा सकता है जो पशुओं की नस्ल और प्रजनन, पशु स्वास्थ्य और पोषण को प्रभावित कर सके। इसमें पशु प्रजनन तकनीकों को शामिल किया जाता है जो अनुवांशिक रूप से उच्च मवेशियों बलों आदि के जर्मप्लाज्म का चयन और बहुगुणन करती है, उन्नत पशु प्रबंधन तकनीकों, पशु स्वास्थ्य, दूध खरीद, प्रंसस्करण तथा विपणन को भी इसमें अपनाया जाता है।

इनमे से कई तकनीकें दशकों से प्रचलित है और इनसे दुग्ध उत्पादन में काफी वृद्धि हुई है। हालांकि कम उत्पादन देने वाले पशुओं की उत्पादकता में वृद्धि को बढ़ने की पूरी संभावना मौजूद है ताकि छोटे किसानों को कम समय में अधिक लाभ मिल सके। हमारे मवेशियों और बलों की चिन्हित नस्ले है जिनकी ब्रीडिंग निति भी स्पष्ट है, लेकिन आधुनिक जैव तकनीक उपायों को अपना कर इन नस्लों में दुग्ध उत्पादन, प्रजनन क्षमता और रोग प्रतरोधक को बढ़ाया जा सकता है।

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पहल से प्रचलित कुछ जैव तकनीक उपाय निम्न है :-

प्रजनन सुधारने के लिए जैव तकनीकBiotechnology to improve reproduction

कृत्रिम गर्भाधान पहली तकनीक थी जो अच्छी नस्ल के बेल विकसित करने के लिए काम में ली जाती गई, ताकि बड़े पैमाने पर अच्छी सन्तति पैदा हो सके। यह तकनीक डेयरी मवेशियों के लिए 65  साल से काम में ली जा रही है। इन्हें जल्दी ही भैंसों, भेड़ों, और बकरियों में अपनाया गया। इसके तहत पहले बैलों से लिया गया वीर्य घोला जाता था और ऐसे कोल्ड स्टोरेज में 2-4 डिग्री तापमान पर रख दिया जाता था। इसकी आयु सिर्फ 24-36 घंटे ही होती थी।

ऐसे में नई तकनीक अपनाई गई, जिसमे इसे लिक्विड नाइट्रोजन में 196 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर प्लास्टिक ट्यूब में पैक करके रखा जाता है। इससे फिल्ड में कृत्रिम गर्भाधान करना आसान हो जाता है, क्योंकि इसे बड़ी आसानी से कही भी ले जाया सकता है। यह भारत में पशुधन विकास की सफल शुरुआत थी जो 70 के दशक के शुरुआत में हुई।

भ्रूण स्थानान्तरण तकनीकFetal transfer technique

कई अंडाणुओं और भ्रूण स्थानान्तरण को भ्रूण स्थानांतरण तकनीक के रूप में जाना जाता है। इसमें मादा (दाता और ग्रहण करने वाली) का हार्मोनल मेनिप्युलेशन होता है। इस तकनीक से गाय और भैंस  से कई भ्रूण साल में कई बार निकले जा सकते है। इस तरह कम उत्पादकता वाली गायों को सोरेगेट मदर बनाकर अधिक उत्पादकता वाली गायों के बछड़े प्राप्त किये जा सकते है।

यह तकनीक अच्छी नस्ल के भैंस और बछड़े पैदा करने में सहायक है जो नस्ल सुधार के लिए काम में आ सकती है। अधिक लागत के कारण डेयरी गायों के लिए किसान इस तकनीक का उपयोग नहीं करते है।

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जिन तकनीकों ने भ्रूण स्थानांतरण को ज्यादा उपयोगी बनाया है उनमे गेमेट्स और भ्रूणों का स्प्लीटिंग, सेकसिंग, क्लोजिंग, जीन ट्रांसफर, भ्रूणों को कम तापमान पर सुक्षित रखना, इक्वीट्रो मेच्युरेशन, फर्टिलाइजेशन और  कल्चर और जीनोम विश्लेषण शामिल है। यह तकनीक लुप्त होती प्रजातियों और वन्य जीवों को बढ़ने में काफी उपयोगी है।

प्रजनन हार्मोन्स  – Reproductive Hormones

यह व्यावसायिक  पशुधन उत्पादन के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है। प्रोजेस्टेरोन और गर्भवती घोड़ी का सीरम मोनडोट्रोफिन (पीएमएसजी) ट्रीटमेंट और एंड्रोस्टेनडायन के खिलाफ टीकाकरण से भेड़ों में अंडाणु बढ़ने की रिपोर्ट है।

भ्रूण स्थानांतरण की प्रक्रिया में अच्छी नस्ल के मवेशी से भ्रूण निकलना पुर तरह से एक्सोजीनस ओस्ट्रोजन हार्मोन की प्रक्रिया है। पशु के आस-पास के वातावरण को बदलकर कामोत्तेजना की दर बढ़ने के लिए उसी जाती के हार्मोन्स प्रेरित किए जा सकते है।

कृत्रिम गर्भाधान के लिए मादा को हार्मोन के इंजेक्शन से उत्तेजित करना प्रजनन की सबसे फायदेमंद जैव तकनीक है, विशेषकर डेयरी के मवेशियों के उत्पादन के लिए लिए।

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क्लोनिंग तकनीकCloning technique

भ्रूण की संख्या बढ़ाने के लिए एम्ब्रायो स्पिलिटिंग या न्यूक्लियर ट्रांसफर की तकनीक अच्छी नस्ल की संतति की संख्या बढ़ाने में काफी उपयोगी है। यह जैव तकनीक भ्रूण का लिंग पता करने में काफी उपयोगी है। इस तकनीक का बड़े पैमाने पर व्यसायिक उपयोग नहीं हुआ है। ट्रांसजेनिक पशु पैदा करने या क्लोजिंग के लिए आधुनिक जैव तकनीक का उपयोग छोटे या बड़े खेतों में भविष्य में भी कम होगा।

सेक्स्ड सीमनSexted Seaman

यह सबसे आधुनिक जैव तकनीक है और विकासशील देशों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाती है। जहां किसान अधिक दूध के लिए अच्छी नस्ल की  मादा पशुओं की संख्या बढ़ाना चाहते है। सामान्य परिस्थितियों में 50% बछड़े नर होते है। ये डेयरी पशुपालन करने वाले किसानों के लिए उपयोगी नहीं होते है। अलग किये गए सीमन के उपयोग से सीमन में से नर शुक्राणु अलग कर लिए जाते है।

अब मादा शुक्राणुओं वाले सीमन से ही प्रजन कराया जाता है और इससे किसानों को 90% से ज्यादा गायें ही मिलती है। इससे किसान अच्छी नस्ल की गायन की संख्या बढ़ा सकते है और अपना दुग्ध उत्पादन भी बढ़ा सकते है। अभी भारत में अमेरिका से आयातित सीमन पहले से उपलब्ध है और भारत में ऐसे सेक्स्ड सीमन उत्पादित करने के प्रयास किये जा रहे है।

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आनुवांशिक सुधारGenetic improvement

आनुवांशिक सुधार के लिए जैव तकनीक उपायों में मार्कर असिस्टेड सेलेक्शन, आर्थिक महत्व रखने वाले या अनूठे जींस की पहचान, जिन एक्सप्रेशन प्रोफाइलिंग और फंक्शनल ऑफ जीन, जीन अनुक्रमण और जीनोमिक चयन शामिल है।

उच्च नस्ल के पशुधन का मार्कर असिस्टेड सलेक्शन (एमएएस)

Marker Assisted Selection (MAS) of High-Breed Livestock

यह चयन का एक तरीका है, जिसके तहत एक अभिभावक की रिलेटिव ब्रीडिंग वेल्यू का अनुमान उस विशेषता से जुड़े मार्कर्स के जीनोटाइप से लगाया जाता है। विभिन्न आर्थिक विशेषताओं के लिए जिम्मेदार जींस को पहचानने की तकनीक उपलब्ध है।

जीन मैपिंग में हुए विकास के बाद पशुधन के जटिल जीनोम को बेहतर ढंग से  समझना संभव हुआ है। इसे आर्थिक विशेषता वाले जीनोम को पहचानने के काम में किया जा सकता है। एमएएस के जरिये जेनेटिक गेन की बढ़ी हुई दर प्राप्त की जा सकती है और पीढ़ियों के बिच के अंतर् को कम किया जा सकता है।

विभिन्न मॉलिक्युलर उपाय जैसे कोशिकाओं की ट्रांस्क्रिप्टोन प्रोफाइलिंग ताकि जीन एक्सप्रेशन सिग्नेचर का करेक्टराइजेशन किया जा सके। इसके कोशिकाओं के बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल प्रोसेस में स्याहता मिलती है। आरएनए स्कवेसिंग हल में विकसित हुई तकनीक है जिसका रेज्यूल्यूशन सेंगर सिक्वेंसिंग और माइकोरे आधारित तरीकों से बेहतर है।

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जीन अनुक्रमणJean Sequencing

इसके तहत नए जीन्स को एक पॉप्युलेशन में भेजा जाता है ताकि मौजूदा प्रजनन लक्ष्यों की चुनौतियों का सामना किया जा सके। इसका उपयोग भेड़ो में बोरोले कीं के अनुक्रमण के लिए सफलतापूर्वक किया जा चूका है ताकि एकल के बजाए जुड़वाँ बच्चे हों। इसे पशुओं की अन्य नस्लों में भी उपयोग किया जा सकता है।

पशुओं के स्वास्थ्य के लिए जैव तकनीक का उपयोग

Use of biotechnology for animal health

पशु-स्वास्थ्य में जैव तकनीक के कई उपयोग है। इसमें ट्रान्जेन्सिस, रोग से बचाव, निदान, उपचार और नियंत्रण शामिल है।

वैक्सीन – Vaccine

इनका काफी इस्तेमाल किया जाता है और रोग प्रतिरोधक  क्षमता विकसित करने के लिए काफी उपयोगी मन गया है। परम्परागत कमजोर कमजोर वैक्सीन की कमियों को दूर करने के लिए वेक्टर्ड वैक्सीन भी विकसित की गई है। टार्मोस्टेबल वैक्सीन उत्पादन के लिए भी नई तकनीके विकसित हो गई है जिन्हें कमरे के तापमान पर स्टोर किया जा सकता है या सांस से खींचा जा सकता है। यह काफी आसान है।

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रोग का पता लगाना – Diagnose

इस क्षेत्र में जैव तकनीक का काफी फायदा मिला है और समय पर इलाज कर पाना भी संभव हुआ है। एंटीबॉडीज का पता लगाने के लिए एंजाइम लीक्ड इम्युनोसोरबेंट ऐसे (इलिसा) तकनीक विकसित की गई है। मूल डीएनए पहचान तकनीकों के विकास से रोग का पता लगाने के उपाय काफी बढ़ गए है।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण है पॉलिमर्स चैन रिएक्शन मेथोलॉजी (पीसीआर)  एंटीबॉजी (मोनोक्लोनल और पॉलीक्लोनल) तथा आरएनए डीएनए रोग की पहचान जांच के लिए काफी उपयोगी तरीके है।

उपचार – Treatment

पशुओं के उपचार के लिए लम्बे समय से विभिन्न बैक्टीरिया और फंगस से निकले गए एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि अन्य मॉलिक्यूल्स जो आइवरमेक्टिव परिवार से निकाले गए है, वे रोग नियंत्रण में काफी सहायक रहे है। मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज से खेती के पशुओं के टीकाकरण से रोगो के उपचार में फाफी सरलता मिली है। लेकिन यह महंगा है।

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पशु उत्पादन में पशुओं का स्वास्थ्य सबसे महत्वपूर्ण है और इस क्षेत्र में किसी भी तरह का विकास उद्योग को बहुत सहायता प्रदान करेगा। एंटीबायॉटिक्स और रासायनिक थैरेपी का पशुओं, मानवों और पशु उत्पादों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में जैव तकनीक इनका अच्छा विकल्प बन सकता है।

जैव तकनीक और पशु पोषण

Biotechnology and Animal Nutrition

उच्च फाइबर चारे का पाचन – Digestion of high fiber fodder

पशुओं के उत्पादन पर पशुओं को मिलाने वाले पोषक तत्वों का सीधा प्रभाव पड़ता है, लेकिन अच्छी गुणवत्ता का चारा मिलाना भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। ज्यादातर पशु चारा फाइबरयुक्त है और इसके पाचन का स्तर तथा पोषक तत्व भी अलग-अलग है।

चारे में अधिक फाइबर हो तो पशुधन से अधिक  मात्रा में मीथेन गैस का उत्सृजन होता है। फाइबरयुक्त चारे के पाचन में सबसे बड़ी बाधा लिगनिन है। जैव तकनीक के उपयोग से अब सॉफ्ट रॉट फंगस से लिगनीज एंजाइम प्राप्त करना संभव है। इससे लिगनिन को आसानी से पचाया जा सकेगा और फाइबर चारे की पोषक मात्रा बढ़ाई जा सकेगी।

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रुमेन माइक्रोब्स में बदलाव – Changes in room microse

एक्लेलाइ ट्रीटमेंट, माइक्रोबायल बेलेंसिंग और जेनेटिक मोडिफिकेशन के जरिये रुमेन माइक्रोब्स में बदलाव चारे की गुणवत्ता बढ़ने की एक और तकनीक है। कुछ पशु चारो में पोषण रोकने वाले तत्व हटाने की तकनीक भी विकसित हो गई हैं। पोषण रोकने वाले तत्व जैसे प्रोटीज इन्हिबिटर्स, टेनिन्स, फाइटोऐमाग्लूटिनिन्स  और साइनोजीन्स मुख्य रूप से फलियों में होते हैं। इनके कम करने या हटाने के लिए प्लांट ब्रीडिंग की जाती हैं। ट्रांसजेनिक बैक्टीरिया का प्रयोग कर पोषण रोकने वाले तत्वों का निष्क्रिय या डिटॉक्सीफिकेट किया जा सकता हैं। जैसे बकरी के रुमेन इनऑक्लम जिसमे विशेष प्रजाति के मवेशियों के बैक्टीरिया होते हैं को चारे में मौजूद नॉन प्रोटीन एमिनो एसिड मिमोसाइन के टूटे हुए उत्पाद को डिटॉक्सीफाई करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता हैं।

चारा परीक्षण – Feed testing

यदि रखे हुए चारे का ढंग से फर्मन्टेशन नहीं हुआ हैं तो इसके पोषक तत्व कम हो सकते हैं। लेक्टिक एसिड बैक्टीरिया जो शुगर के अनरोबिक फर्मन्टेशन को प्रभावित करता हैं, उसे लिए जीवाणुहीन परिस्तिथियाँ सामान्यतः जरूरी होती हैं। क्लोरोफॉर्म, टोल्यून, करेजोल जैसे एडिटिव्स अभी भी बैक्टीरिया बढ़ाने के लिए काम में लाए जाते हैं। जबकि उचित पीएच स्तर सल्फ्यूरिक एसिड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड और फॉर्मिक एसिड से प्राप्त किए जाते हैं। ऐसे में एसिड्स की नुकसानदायक प्रवृति के कारण फर्मन्टेशन के लिए वैकल्पिक कम्पाउंड की जरूरत हैं। जिसमे मोलेसेस, एन्जाइम्स और लेक्टिक एसिड बैक्टीरिया का इनऑकुलम हो।

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सारांश :-

Summary :-

सारांश रूप में कहें मॉडल जीव तकनीक से पशुधन की नस्ल सुधर का काम किया जा सकता हैं। इसके तहत भ्रूण प्रजनन के लिए सेक्सड सीमन, सेक्सिंग, बदलाव और स्थानांतरण, क्लोनिंग और मार्कर असिस्टेंड जिन तकनीक का उपयोग किया जा सकता हैं और आर्थिक विशेषता वाले भ्रूण प्राप्त किये जा सकते हैं। जिन की सभी आर्थिक विशेषताए पहचान ली गई हैं।

ऐसे में अब इन सभी आर्थिक रूप से फायदेमंद जीन्स के जरिए अधिक उत्पादन पशु पैदा करना संभव हो गया हैं। जैव तकनीक में उच्च गुणवत्ता के वेक्सीन के जरिए रोग की पहचान और नियंत्रण की क्षमता हैं। रुमेन माइक्रोब्स में बदलाव कर सूखे और चारे की पोषकता और चारे के स्त्रोतों की ऊर्जा क्षमता बढ़ाई जा सकती हैं।

बड़े और छोटे रुमिनेंट्स में रुमेन माइक्रोब्स में बदलाव कर मीथेन उत्सर्जन को कम करने के प्रयास भी चल रहे हैं। कम आदानों से अधिक उत्पादन की अवधारणा के कारण पशुधन पर दबाव कम करने के लिए इन तकनीकों का व्यापक स्तर पर उपयोग संभव हैं। इस तरह जैव तकनीक का व्यापक उपयोग होगा तो लागत में कमी आएगी और यह छोटे किसानों के लिए अधिक पहुंच बना सकेगी।

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Author :-

डॉ सुरेश बी. गोखले

डॉ नारायण जी हेगड़े

स्रोत :-
शारद कृषि पत्रिका

 

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