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पशुओं में त्वचा रोग एवं उनकी रोकथाम

पशुओं में त्वचा रोग एवं उनकी रोकथाम
Written by bheru lal gaderi

जो रोग पशु के भीतर की त्वचा को प्रभावित करते हैं, पशुओं में त्वचा रोग कहलाते हैं। पशुओं में त्वचा रोग से पशु की मृत्यु भी हो सकती है। जिससे ना केवल पशुओं को शारीरिक पीड़ा होती है अपितु पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।पशुओं में त्वचा रोगों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। छूतदार त्वचा रोग तथा अछूतदार एवं एलर्जीक त्वचा रोग।

छूतदार त्वचा रोग

दाद

पशुओं में त्वचा रोग एवं उनकी रोकथाम

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यह एक कवक या फंगस द्वारा फैलने वाला छूतदार रोग है। यह छोटी आयु के पशुओं विशेषकर बछड़ो में अधिक देखा जाता है। कभी-कभी पेट में कृमि होने पर इस रोग की व्यापकता बढ़ जाती है।

रोग की प्रारंभिक अवस्था में संक्रमित भाग में बहुत खुजली होती है तथा वह पर छोटे-छोटे दाने पड़ने लग जाते हैं यह दाने बढ़कर सिक्के के आकार के गोल-गोल चकत्ते बन जाते हैं। इसलिए इनको रिंगवर्म भी कहा जाता है। रुक-रुक कर खुजली चलती है एवं खुजलाने पर पशु को आराम महसूस होता है।

संक्रमित भाग के बाल झड़ जाते हैं एवं त्वचा मोटी-खुरदरी हो जाती है पशुओं में त्वचा रोग ग्रसित भाग पर उठे हुए गोल-गोल चकत्ते दिखाएं देते हैं खुजली चलने के कारण पशु शरीर को अपनी खुर, पेड़, दीवार आदि से रगड़ता है। यह रोग कई बार रोगी पशु से मनुष्य को भी हो सकता है।

रोकथाम एवं नियंत्रण

पशुओं में त्वचा के निदान एवं उपचार हेतु तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय अथवा वेटेनरी विश्वविद्यालय प्रशिक्षण एवं अनुसंधान केंद्र पर संपर्क किया जाना चाहिए।

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खाज (मेन्ज)

पशुओं में त्वचा रोग एवं उनकी रोकथाम

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यह माइट नामक परजीवी कीड़े के द्वारा फैलने वाली छूत की बीमारी है, जो एक रोगी पशु से दूसरे स्वस्थ पशुओं में परस्पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संपर्क से फैलती है।

इस रोग से ग्रसित पशु खुर, पेड़ या दीवार से अपने शरीर को खुजलाता है। रोग ग्रसित भाग के बाल झड़ जाते हैं एवं त्वचा सूजकर मोटी हो जाती हैं और खुरंट बन जाते हैं। खुजलाने से जलन होती है एवं उस स्थान पर खून का पानी जैसा सीरम निकलने लगता है। रोगग्रसित त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाती है।

गीली खुजली में छाले पड़ जाते हैं। छाले पककर फुट जाते हैं एवं उनमें काफी दर्द होता है। पशु बेचैन रहता है। छालो के आस-पास की त्वचा में सूजन आ जाती है एवं लाल पड़ जाती हैं। अंत में कमजोरी के कारण कभी-कभी पशुओं की मृत्यु भी हो जाती है।

रोकथाम एवं नियंत्रण

इसके लिए पशुओं को नियमित रूप से वर्ष में दो या तीन बार पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार बाहृा परजीवी नाशक दवा से नहलाना चाहिए। रोग की तीव्रता अधिक होने पर पशु चिकित्सक की सलाह से पूर्ण उपचार करवाएं।

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जू एवं चिंचड

पशुओं में त्वचा रोग एवं उनकी रोकथाम

यह परजीवी प्रायः दो प्रकार के होते हैं, काटने वाले एवं खून चूसने वाले। यह परजीवी पशु की जांघ व पैरों के अंदरूनी भागो में कान, सींगो की जड़ एवं आंख के चारों ओर चिपक कर उसे काटते हैं एवं खून चूसते हैं। जू पशु के शरीर पर ही अंडे देती हैं, जिन्हें लीक कहते हैं।

जू एवं चिचड़ के संक्रमण से ग्रसित पशु खुजली होने के कारण पशु अपने शरीर को बार-बार दीवार, पेड़ आदि से रगड़ता है। पशु कमजोर हो जाता है एवं उत्पादन कम हो जाता है। त्वचा खुरदरी एवं शुष्क हो जाती है।

पशुओं में त्वचा रोग जू एवं चिचड़ के नियंत्रण हेतु पशुओं को नियमित रूप से वर्ष में दो या तीन बार परजीवी नाशक से सावधानी पूर्वक नहलाना चाहिए अथवा पशु चिकित्सक की सलाह से आइवरमेक्टिन इंजेक्शन लगवाना चाहिए।

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वार्बल मक्खी रोग

पशुओं में त्वचा रोग एवं उनकी रोकथाम

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यह मक्खी पशु के पैरों के निचले भाग पर एक साथ 25-30 बार आक्रमण करती है। इससे परेशान होकर पशु इधर-उधर भागता है। मक्खी पशु के पैरों में अंडे देती हैं। अंडो से लार्वा निकलकर बाल की जड़ से त्वचा में प्रवेश कर जाते हैं एवं पीठ वाले भाग में पहुंचकर 3 सेमि. तक के छाले बनाते हैं। अक्टूबर से जनवरी माह में छाले ज्यादा दिखाई देते हैं। इस रोग से ग्रसित पशुओं में कंधे, पीठ एवं पिछले धड़ पर छाले दिखाई देते हैं, जिन्हें फोड़ने पर सफेद-सफेद लार्वा बाहर निकलते हैं।

रोकथाम एवं नियंत्रण

इसके लिए पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार उपचार करवाएं।

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अछूतदार एवं एलर्जीक त्वचा रोग

पशुओं में त्वचा रोग एवं उनकी रोकथाम

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कण्डु, त्वचा रक्तिमा, एक्जिमा, इम्पेटिगो, त्वचाशोथ, पित्ती आदि रोग प्रायः पशुओं में होने वाले अछूतदार एवं एलर्जीक त्वचा रोग है।

यह रोग पेट में कब्ज रहने, कीड़े-मकोड़ों के काटने, विष एवं विषाक्त पदार्थ/वनस्पति के खा लेने, पशुओं को गंदे स्थान पर रखने तथा कभी-कभी शरीर में पोषक तत्व (खनिज लवणों एवं विटामिन आदि) की कमी के कारण भी हो जाते हैं।

इस प्रकार के त्वचा रोगों से ग्रसित पशुओं के शरीर में खुजली, बेचैनी, दर्द, खुजलाने वाले स्थान से तरल पदार्थ का निकलना, लाल एवं शुष्क त्वचा रोग ग्रसित भाग का सूज जाना आदि सामान्य लक्षण देखे जा सकते हैं।

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पशुओं में त्वचा रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण

इसके लिए पशु आवास में साफ-सफाई का ध्यान रखना, पशुओं को ग्रीष्मकाल में नियमित रूप से नहलाना, पशु के शरीर पर ब्रश या साफ टाट की बोरी घुमाकर साफ करना, पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार नियमित रूप से बाहृा परजीवी नाशी घोल से नहलाना तथा पशुओं को उनकी उम्र एवं उत्पादन के अनुसार आहार एवं पोषण प्रदान करना चाहिए।

पशुओं में त्वचा रोगों की रोकथाम द्वारा न केवल हम पशुओं को अनावश्यक पीड़ा से बचा सकते हैं।अपितु अधिक वृद्धि एवं उत्पादन लेकर पशुपालन व्यवसाय को लाभकारी बना सकते हैं।

प्रस्तुति

गिरीश कुमार दाखेड़ा एवं डॉक्टर एस.के. शर्मा,

पशुधन अनुसंधान केंद्र, वल्लभनगर, उदयपुर,

(राजूवास बीकानेर)

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