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पशुओं में उग्र उपच (आफरा) कारण एवं उपचार

पशुओं में उग्र उपच
Written by bheru lal gaderi

उग्र उपच रोग नाम व्याधि रोग रोगंथि पशुओं का एक सामान्य तरह होने वाला रोग है जिसमें उग्र आमाशयों अर्थात रूमेण में नत्वा तथा रेटिकुलम की एटोनी हो जाती है। जो चारे अथवा अपचनीय पदार्थों के अधिक भर जाने से उत्पन्न होती है यह व्याधि अन्ततः आफरे में परिवर्तित हो सकती है। अतः व्याधि का निदान एवं उपचार आवश्यक हैं।

पशुओं में उग्र उपच

उग्र उपच के कारण

किसी भी जानवर द्वारा अधिक खा लेना इस रोग का प्रमुख कारण है। अत्यधिक भोजन खाने के इस कारण पाचन तंत्र अपने सामान्य आकार से अधिक भर जाता है इसके लिए सामान्यतः उत्तरदाई खाद्य पदार्थ दाने नियुक्त चारा, दाना, साइलेज, सूखी घास तथा मोटा चारा हैं। अधिक उत्पादन हेतु ज्यादा खुराक वाली गाये सड़ा गला चारा अथवा अन्य अपूर्ण खाद्य खाने से इस रोग के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। तथा उन पर इस रोग का भयंकर संक्रमण होता है पशुओं में अधिक खा लेना प्रायः लापरवाही तथा अज्ञानतावश होता है। पशुओं को दिया जाने वाला चारा अधिक परिपक्व अथवा गर्म अवस्था में होने के कारण अथवा कम अनुभवी किसानों द्वारा इन्हें अनिश्चित अवकाश पर खिलाने पर वह अपचनीय हो जाता है तथा यह व्याधि उत्पन्न करता हैं।

पशुओं के भोजन में परिवर्तन भी प्रायः इसी व्याधि के कारण बन जाता है सूखे चारे से गीली, हरी घास में परिवर्तन भोजन में अनाज के दाने की मात्रा में वृद्धि इसके मुख्य कर्क हैं।

बहुत बार गाय ब्याने के पश्चात अपनी जर स्वत ही खा लेती है जिसके परिणामस्वरुप उन्हें आंत्रशोध के साथ-साथ उग्र उपच का तीव्र आक्रमण होता है।

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उग्र उपच के लक्षण

इस व्याधि के उत्पन्न होने पर पशु की खानपान में अरुचि, सुस्ती, कम गोबर करना, कभी- कभी उल्टी करना तथा आफरा आना प्राथमिक लक्षण हैं दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन कम हो जाता है। पशु के श्वसन गति तथा नाड़ी गति सामान्य से बढ़ जाती है। शरीर का तापमान 101 से 102 डिग्री के मध्य रहता है। अति उग्र उपच अवस्था में पशु दर्द के कारण कराहता है अपने पिछले पैर जमीन पर पटकता है अथवा अपने पैर उदर पर मारता है। शरीर में अकड़न, पलकों का सूजन जाना, आंखों से पानी गिरना तथा दांत पीसना इस रोग के सामान्य लक्षण है।

चारा अधिक खा लेने से पशु उत्पन्न हुए आफरे के कारण उधर का आकार बढ़ा हुआ प्रतीत होता है जिसके कारण रोगी पशु को सांस लेने में अधिक कष्ट होता है तथा जीभ बाहर निकल जाती है। तथा काफी मात्रा में लार बहती है। इस अवस्था में यदि रोगी पशु का उपचार नहीं हो पाता है तो वह दम तोड़ सकता है।

पशु का मरणोत्तर परीक्षण

इस व्याधि द्वारा पशुओं मृत पशुओं के परीक्षण में उनके रुमेन में अत्यधिक मात्रा में चारा पाया जाता है तथा इसकी दीवारें रक्त वर्ण हो जाती है तथा कभी-कभी रक्त स्त्राव भी पाया जाता है। हृदय की झिल्ली पर भी रक्त स्त्राव प्रदर्शित होता है। उदर गुहा में बहुत सी बार पतला द्रव मिलता है तथा वक्ष गुहा रक्तवर्णी दिखाई देते हैं तथा रक्त स्त्राव भी प्रदर्शित करते हैं। उदर के फुलाव से अत्यधिक तनाव होकर डायफ्राम वक्ष गुहा में काफी अंदर तक धंस जाती है जिसके परिणामस्वरुप रोगी पशु की दम घुटने से मौत भी हो जाती है।

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उग्र उपच के रोगी पशु का उपचार

  • सर्वप्रथम रुमेन के द्रव्य की जांच करानी चाहिए।
  • बड़े पशुओं में हिमालय बतीसा 30 या 60 ग्राम की मात्रा देना चाहिए।
  • सभी प्रकार की साहारक उपच ज्यादा शर्करा खाने से हो तो हिमालय बत्तीसा के साथ 30 या 60 ग्राम मीठा सोडा भी देना चाहिए।
  • सभी प्रकार के साहारक में रुमेन का संकुचन प्रारंभ करने तथा आहार नाल को खाली करने का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।
  • अधिक कष्ट से बचने के लिए रोगी को तब तक कोई चारा नहीं दिया जाए।
  • साधारण रोगी को पाचक व उत्तेजक ओषधियों के साथ मृदु रेचक पदार्थ मिला कर देने से जल्दी ठीक हो जाते हैं।
  • पेट फूली हुई गाय की चिकित्सा के लिए उसे मुंह में मुख खोलनी डालनी चाहिए तथा गाय को इस प्रकार खड़ा कीजिए कि उसका पिछला धड़ निचा रहे।
  • ज्यादा आफरा होने के इलाज के लिए 30 एम एल तारपीन के तेल को 300 ग्राम मीठे तेल तथा थोड़ा सा पानी मिलाकर पिलाने से आफरा में आराम मिलता है।
  • अच्छे हाजमे के लिए भूख बढ़ाने की इच्छा पैदा करने वाले तथा पाचन क्रिया को सही करने वाले चूर्ण हिमालय बत्तीसा, एच बी स्टोग, रुचामिक्स पाउडर इत्यादि डॉक्टर की सलाह के पश्चात देना चाहिए इसके साथ ऐसे पशुओं में जिनका इस बीमारी से दूध कम हो गया हो तो दुग्धवर्धक भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

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प्रस्तुति

देवेंद्र सिंह, जोबनेर

स्त्रोत

कृषि भारती

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