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पपीते की उन्नत खेती एवं कीट प्रबंधन

पपीते की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

पपीता फल में घुलनशील रेशा होता हैं जो की शरीर में क्लोस्ट्रोल और चर्बी की मात्रा को कम करता है। पपीते में विटामिन इ काफी मात्रा में पाया जाता हैं जो कि लगभग 1350-3674 माइक्रोग्राम/100 ग्राम तक होता हैं। और दूसरी पौष्टिक तत्व जैसे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन सी तथा खनिज लवण भी अच्छी मात्रा में होते हैं। इसका सेवन करने से पाचन क्रिया ठीक रहती हैं तथा आंतो, तपेदिक, दमा, निमोनिया और नेत्र रोगों से राहत मिलती है। इस में पाए जाने वाले विटामिन ए और सी के अलावा पोटेशियम, कैल्शियम और आयरन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। जिसके कारण शरीर में कई रोगों के कीटाणु नहीं पनपते हैं।

पपीते की उन्नत खेती

पपीता केरीकेसी परिवार का फल है और पैसीफ्लोरा परिवार से मिलता-जुलता है। पपीते का पौधा बहुत जल्दी बढ़ कर एक साल में ही फल देने लगता है। पपीता विटामिन ए व सी का अच्छा स्त्रोत है। यह फल संसार के सभी देशों के उष्ण और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में आसानी से उगाया जाता है। पपीते की पैदावार भारत के विभिन्न राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, असम, केरल, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र आदि में होती है। यदि पपीते की पैदावार की तुलना दूसरे देशों से करें तो भारत इसकी पैदावार में आगे हैं और भारत में इस फल की पैदावार लगभग 41.96 लाख तन के करीब है।

इस फल का शरीर 1 पोंड तथा उससे अधिक होता है। यह लगभग 6 से 20 इंच तक लंबा एवं उसका व्यास 12 इंच तक होता है। फल पकने की पहचान का अंदाजा हम अंगूठे से दबाकर लगा सकते हैं। अगर अंगूठा से नर्म लगे तब इसे पका हुआ समझते हैं और अगर बाहर के छिलके में संतरी रंग आ जाए तो भी पका हुआ समझे। फल की परिपक्वता को यंत्र द्वारा मापा जा सकता है।

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पौष्टिक तत्व

एक अनुसंधान के दौरान विभिन्न समयावधि में परिपक्व होने वाले पपीता फल के लिए लिए गए जैसे हल्दी परिपक्व होने वाला मध्य में और देर से परिपक्व होने वाला, जो देर में परिपक्व होने वाले थे उनके परिणाम ज्यादा अच्छे रहे। इन्हें तुड़ाई के बाद पकाया गया और उन फलों के रासायनिक एवं भौतिक गुणों को मापा गया तो ज्ञात हुआ कि उन फलों में नमी 85.5 प्रतिशत, खटास 0.18%,  रेशा 1.45 मिलीग्राम/100 ग्राम, चीनी की मात्रा 13% पाई जाती है।

भंडारण में फलों को पकाने के दौरान एंजाइम की क्रियाविधि और पोटेशियम की मात्रा लगभग 420 मिलीग्राम/100 ग्राम पाई गई । फल पित्तनाशक तथा स्वादिष्ट होता है। पेड़ पर पका हुआ पपीता अधिक गुणकारी है। पेट के रोगों में पपीते का सेवन एक लाभदायक होता है. पपीता ऐसा फल है जिसके प्रत्येक भाग में कुछ न कुछ आमदनी देने वाला एक लोकप्रिय फल है। पके फलों के आलावा हरे भागों को खरोंचने से प्राप्त दूध को सुखाकर पेपेन प्राप्त होता है।

पपीता गुणों की खान

माहवारी के दर्द से छुटकारा       

पपीते में पेपेन नामक एंजाइम महावारी के दौरान रक्त के प्रवाह को ठीक कर दर्द को दूर करने में मदद करता है। इसलिए महावारी के दर्द से गुजर रही महिलाओं को अपने आहार में पपीता शामिल करना चाहिए।

केलोस्ट्रॉल कम करे

पपीते में विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होते हैं जो आपके रक्त वाहिनियों में थक्के को बनाने नहीं देता है। कोलेस्ट्रॉल के थक्को को दिल का दौरा पड़ने और उच्च रक्तचाप समेत कई रोगों का कारण बन सकते हैं।

प्रतिरोधक क्षमता में मजबूती

आपकी इम्युनिटी विभिन्न संक्रमण के विरुद्ध ढाल का काम करती है। केवल एक पपीते में इतना विटामिन सी होता है जो आपके प्रति दिन की विटामिन सी की आवश्यकता का लगभग 200% है। इस तरह से यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है।

कैंसर को रोकने में मददगार

पपीता कोलन कैंसर के खतरे को कम करता है। पपीते में एंटीआक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन सी, बिता केरोटीन, विटामिन ई शरीर में कैंसर सेल को बढ़ने से रोकते हैं। इसलिए अपने आहार में पपीते को शामिल करें।

आंखों के लिए फायदेमंद

पपीता नेत्र रोगों के लिए बहुत फायदेमंद है। इसमें विटामिन ए की मौजूदगी आंखों की रोशनी को कम होने से बचाती है। इसके सेवन से रतौंधी रोग का निवारण होता है और आंखों की ज्योति बढ़ती है।

पेपेन प्रोटियोलिटिक एंजाइम हैं जो मांस नरम करने तथा भोजन को बचाने में मदद करता है और इससे बहुत सी दवाइयां तैयार की जाती है। इसलिए इसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारी मांग है। इस कारण यह फल और व्यवसायिक क्षेत्र में अधिक महत्व रखता है। इस फल को कुछ लोग इसकी बहुत अच्छी खुशबू ना होने की वजह से पसंद नहीं करते खासकर बच्चे। धीरे-धीरे लोगों में इस फल की गुणवत्ता का पता लग रहा है लेकिन इस फल का उपयोग में अभी तक इतना प्रयोग नहीं हो पाया है।

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पपीते की किस्मे

पपीते की बढ़िया किस्में पूसा डिलीशियस, पूसा मेजेस्टी, पूसा जाइंट, पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा, पंत पपीता, हनीड्यू, कुर्ग हनीड्यू, कोयंबटूर-1, कोयंबटूर-2, कोयंबटूर-3, कोयंबटूर-4, कोयंबटूर-5, कोयंबटूर-6, पेन-1, ताइवानी वगैरह हैं।

मिट्टी

यह उष्ण जलवायु का पौधा है, जो खुले धूप व पानी की सुविधा वाले इलाकों में उपजाया जा सकता है। पपीते की उत्तम पैदावार के लिए गरम और नरम आबोहवा अच्छी होती हैं। इसके लिए ज्यादा पानी, पाला और तेज गर्म हवा नुकसानदायक होती है। पपीते की खेती वैसे तो सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन हल्की उपजाऊ कार्बनिक पदार्थों भरपूर अच्छे जल निकास वाली और 6.5 से 7.0 वाली मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है।

पौध तैयार करने की विधि

आमतौर पर पपीते की पौध बीज द्वारा तैयार कर ली जाती है, इसके लिए ऊँची उठी हुई क्यारिया तैयार कर ली जाती है, जो 3 मीटर लंबी, 1 मीटर चौड़ाई की व जमीन से 20-25 सेंटीमीटर उठी हुई होती हैं, बीजों को इन क्यारियों में 10-० सेमी की दूरी मैं रोपाई के लिए काफी रहता है। बुआई से पहले बीज को एग्रोसान जीएन या सेरेसान से उपचारित कर लेना चाहिए। बीज बोन के बाद पुआल से क्यारी को ढक देना चाहिए व झारे से जरूरत मुताबिक सींचते रहना चाहिए। बीजों के जमने के बाद पुआल हटा देना चाहिए, बीज की बुवाई पॉलीथिन की थैलियों में भी की जाती है।

नर्सरी में पौधों का खास ख्याल रखना चाहिए और पौध गलन या डपिंग ऑफ़ सीडलिंग से बचने के लिए बोर्डो मिश्रण (5:5:5) का छिड़काव करना चाहिए। बीजों को 2 सेंटीमीटर की दूरी पर 10 सेंटीमीटर की कतारों में 1 से 1.5 सेंटीमीटर की गहराई में अप्रैल से जून महीने में बोना चाहिए। जब पौधे 5-7 सेंटीमीटर के हो जाएं, तो उन्हें गमलों में लगाना चाहिए या पॉलिथीन की थैलियों में रखना चाहिए, तब 15 से 20 सेंटीमीटर हो जाए तो उन्हें दिन में निश्चित स्थान पर लगा देना चाहिए।

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पौध रोपाई का समय

पपीते के पौधों को साल में 3 बार जुलाई- अगस्त, सितंबर- अक्टूबर, फरवरी-मार्च महीनों में लगाए जा सकते हैं।

पौधरोपण

खेत में 45x45x45 सेंटीमीटर के 2×1 मीटर की दुरी पर गड्डे खोद कर डेढ़ हफ्ते के के लिए खुला छोड़ देना चाहिए। फिर गड्डों में तकरीबन 15 सेंटीमीटर मीटर की ऊंचाई तक 3:1 के अनुपात में मिट्टी और खाद का मिश्रण देना चाहिए। 2 से 3 दिन बाद इनमे 15 से 20 सेंटीमीटर ऊँचे पौधों की रोपाई करके फौरन सिंचाई कर देते हैं।

पौधे अगर द्विलिंगी किस्म के हो तो हर एक गड्ढे में 3 पौधे लगाने चाहिए फूल आने पर नए पौधों की संख्या 10 फीसदी रखनी चाहिए। जबकि उभयलिंगी किस्म के पौधों को उगाना हो, तो प्रत्येक गड्ढे में सिर्फ एक पौधा ही लगाना चाहिए, क्योंकि इन किस्मों के सभी पौधे या तो मादा होंगे या उभयलिंगी।

पौधे रोपने का काम शाम के समय ही करना चाहिए। पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई जरूर करें, पौधों का बढ़ना शुरू होते ही पौधों के अगल- बगल से मिट्टी चढ़ाकर रिंग बनाकर सिंचाई की जा सकती हैं। पौधों पर पहले फूल के आते ही निश्चित अनुपात में नर एवं मादा पौधों को छोड़कर अतिरिक्त पौधों को काट देना चाहिए।

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खाद एवं उर्वरक

पपीते के पेड़ में तकरीबन 12 से 15 महीने में फल आने लगते हैं। पपीते की पौधों को बाग में लगाने के 4 महीने के बाद 15 से 20 किलो प्रति पौधा सड़ी हुई गोबर की खाद देना जरूरी होता है। पैदावार बढ़ाने के मकसद से उर्वरक का मिश्रण बहुत उपयोगी पाया गया है। यह उर्वरक मिश्रण अमोनियम सल्फेट: फास्फेट:पोटेशियम सल्फेट के 1:3:15  अनुपात वाला 750 से 1000 ग्राम प्रति पौधे को देना चाहिए। इस मिश्रण को आधे- आधे हिस्से में जुलाई- अगस्त व फरवरी-मार्च में डाला जाना चाहिए और पौधों के चारों ओर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। इसके अलावा प्रति पौधा लगभग 200-250 ग्राम नाइट्रोजन, 200-250 ग्राम फास्फेट एवं 250 से 500 ग्राम पोटाश देना चाहिए।

सिंचाई

पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई जरूर कर देनी चाहिए, गर्मियों के दिनों में 6 से 7 दिन के अंतर पर और सर्दी में 10 से 15 दिनों के अंतर पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए, सिंचाई करते समय इस बात का जरूर ध्यान रखें कि पानी को अधिक मात्रा में न दिया जाए व पानी पौधे के सीधे संपर्क में आने पर जलभराव से बचें, नहीं तो पौधों में गलन बीमारी लगती है और फल कम लगता है। इसके लिए सिंचाई से पहले प्रत्येक पेड़ के चारों तरफ 30 सेंटीमीटर और 15 सेंटीमीटर ऊंचाई की मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए, रेतीली मिट्टी के नए लगे बागों में कम समय के अंतराल पर हल्की सिंचाई करनी जरूरी होती है। पपीता में अब टपक सिंचाई यानि ड्रिप इरीगेशन की जाने लगी है, क्योंकि इससे पौधों में तना गलन बीमारी का खतरा कम हो जाता है।

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खरपतवार

निराई-गुड़ाई करते वक्त पौधों के बीच में उगने वाले खरपतवारों को निकालते रहना चाहिए। तने के चारों तरफ मिट्टी की छोटी मेड चढ़ा देनी चाहिए।

लिंगभेद

पपीते के तीन तरह के पौधे आते हैं, नर, मादा व उभयलिंगी। खेत में 10 फीसदी नए पौधों को छोड़कर अनावश्यक पौधों को काट कर हटा देना चाहिए। बीमारी लगे पौधों को भी हटा देना चाहिए व उस खाली जगह पर स्वस्थ पौधे लगा देना चाहिए।

पौधों की पाले से सुरक्षा

नवंबर महीने में इन पौधों को सूखी घासफुस या खरपतवार से ढक दें, हल्की सिंचाई की व्यवस्था कर पाले से पौधों को बचाया जा सकता है।

फलों की छंटाई

उत्तम गुणों वाले फल हासिल करने के लिए अवांछित और छोटे-छोटे फलों को निकाल देना चाहिए। स्वस्थ पेड़ों वाले एक हेक्टेयर फसल से की 250 से 400 क्विंटल तक पैदावार मिल जाती है। स्वस्थ पेड़ों पर 25 से 80 फल तक लगते हैं। फल बनने के तकरीबन एक महीने बाद तनों पर कुछ फलों को बीच-बिच में से निकालकर प्रति गांठ औसतन 2 फल को छोड़ना जरूरी होता है, ऐसा करने से बचे हुए फल के आकार में अच्छा विकास हो पाता है।

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कीट एवं रोग नियंत्रण

लाल मक्खी

इस कीड़े के आक्रमण से फल खुरदरे व काले रंग के हो जाते हैं, पत्तियां पीली पड़ कर गिर जाती है, इस कीड़े की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस या 0.03 % का छिड़काव करना चाहिए।

माहु

यह कीड़ा पत्तियों का रस चूसता है। इसकी रोकथाम के लिए शुरूआत अवस्था में ही 0.03 फीसदी मोनोक्रोटोफॉस या फास्फेमिडान का छिड़काव करना चाहिए।

आर्द्रगलन

इस बीमारी से पौधशाला में छोटे पौधों का तना जमीन के पास से सड़ जाता है और वह मुरझाकर गिर जाते हैं, इस बीमारी की रोकथाम के लिए बोर्डो मिश्रण 3% या जिनेब 0.3 % का छिड़काव करें, साथ ही मिट्टी को फार्मेल्डिहाइड 2.5 % घोल से उपचारित करें। व बीजों कोthairam दवा की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलो की दर से उपचारित करें।

वायरस बीमारिया

सभी प्रकार की वायरस बीमारिया पट्टी का रस चूसने वाले कीड़ों द्वारा फैलाई जाती है। पपीते में प्रमुख रूप से 3 बीमारियां वायरस बीमारिया मोजेक, डिस्टासन स्पॉट वायरस और लिफ़ कर्ल वायरस लगती है। मोजेक बीमारी से पत्तियों का हरापन का कम हो जाता है व पट्टी छोटी होकर सिकुड़ जाती हैं। रोगग्रस्त पत्तियों में फैले हुए दाग पड़ जाते हैं। कुछ दिनों बाद पौधा मर जाता है। डिस्टासन स्पॉट वायरस से पपीते का सबसे ज्यादा नुकसान होता है। प्रभावित पौधे की पत्तियां कटी-फटी सी दिखाई देती है और पौधों की बढ़वार रुक जाती है। लिफ़ कर्ल वायरस से पत्तियां पूरी तरह से मूड जाती है और पौधे न तो बढ़ पाते हैं और ना ही फल लगते हैं। रोकथाम के लिए बीमारी बीमारीग्रस्त पौधों को खत्म कर दें। कीड़ों की रोकथाम के लिए मैटासिस्टाक्स या मेलाथियान 0.05 % गोल का 16 दिन के अंतर पर छिड़काव करना चाहिए।

  • ऐसे इलाकों में, जहां वायरस बीमारियों डर रहता हैं, वहां पौधशाला या नर्सरी सितम्बर- अक्टुम्बर के महीने में लगाएं। नर्सरी में पौधों  पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करते रहें। बीमार पौधों को निकालकर जला दे या पौधों को नष्ट कर दें।
  • बागो के नजदीक पुराने विष्णुग्रसित पौधों को नष्ट कर दे, क्योंकि इन पौधों में वायरस कई सालों तक बने रहते हैं और नए बागों में रोग फैलाने का स्त्रोत बन जाता है।
  • बागों के नजदीक ऐसी सब्जिया न लगाए, जिनमे तेल, चेंपा या सफेद मक्खी का प्रकोप होता हो, क्योंकि ये कीट ही मुख्य रूप से वायरस एक पौधे से दूसरे पौधे तक ले जाते हैं।

तना या पद विगलन रोग यानि स्टेम या फुट रॉट

यह एक मिट्टी जनित बीमारी है ,जिससे फफूंद मिट्टी में पैदा होते हैं। इस बीमारी के असर से मिट्टी की सतह से तनो में सड़न शुरू हो जाती है व छाल पीली पड़ जाती है, और तना मुरझा कर गिर जाती  है। तना सड़ जाता है और आखिर में पौधा गिर जाता है। इस बीमारी का प्रकोप बारिश के मौसम में नमी ज्यादा होने पर ज्यादा होता है, खासकर ऐसे खेतों में जिनमें जल निकास का इंतजाम ठीक नहीं होता। इस बीमारी की रोकथाम के लिए जमीन से 60 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक टनों पर बोर्डो पेस्ट की पुताई करना चाहिए।

बीमार पौधों को तुरंत उखाड़कर दबाया या जला देना चाहिए। बारिश या सिंचाई का पानी पौधे के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए। इसके लिए पौधों के तनों के चारों ओर मिट्टी चढ़ा देना चाहिए। कॉपर आक्सीक्लोराइड 2 ग्राम 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। इससे बीमारी दूसरे पौधों पर नहीं फैलती हैं।

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प्रस्तुति

डॉ. आलोक कुमार सिंह,

डॉ. डी.के. श्रीवास्तव,

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मोदीपुरम मेरठ,

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद उत्तर प्रदेश, लखनऊ (उ.प्र.)

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