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नील हरित शैवाल जैव उर्वरक उत्पादन तकनीक एवं महत्व

नील हरित शैवाल जैव उर्वरक
Written by bheru lal gaderi

नील हरित शैवाल जैव उर्वरक(Cyanobacteria Organic Fertilizer):- पौधों के समुचित विकास के लिए नाइट्रोजन एक आवश्यक पोषक तत्व हैं। रासायनिक उर्वरकों के अलावा शैवाल तथा जीवाणु की कुछ प्रजातियां वायुमंडलीय नाइट्रोजन (80%) का स्थिरीकरण कर मृदा तथा पौधों को देती हैं और फसल की उत्पादकता में वृद्धि करती हैं।

नील हरित शैवाल जैव उर्वरक

Image Credit – Feedipedia

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इस प्रक्रिया को जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहते हैं। इन सूक्ष्म जीवाणु को ही जैव उर्वरक करते हैं।

नील हरित शैवाल एक विशेष प्रकार की काई होती हैं।  इसकी कई प्रजातियां होती हैं। जिसमें आलोसायरा, वेस्टीलापसिस, नास्टाक,  एनाबिना, साइटोनिमा, टालीपोथ्रिक्स इत्यादि प्रमुख है।

नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्रिया शैवाल की सरंचना में स्थित एक विशिष्ट प्रकार की कोशिका होती हैं। इसे हेटेरोसिस्ट कहते हैं। यह सामान्य कोशिकाओं से संरचना एवं कार्य में भिन्न होती है। इसका निर्माण सामान्य कोशिकाओं से ही कोशिकाभित्ति मोटी होने तथा आंतरिक परिवर्तन के फलस्वरुप होता है।

नील हरित शैवाल (बी.जी.ए.) के लिए महत्वपूर्ण जैव उर्वरक है। इसके प्रयोग से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 25% रासायनिक नाइट्रोजन की बचत तथा धान के उत्पादन में 8 से 10% की वृद्धि होती है। साथ ही साथ भूमि की उर्वरा क्षमता में भी वृद्धि होती हैं।

धान के खेत का वातावरण नील हरित शैवाल की वृद्धि के लिए सर्वथा उपयुक्त होता है। इसकी वृद्धि के लिए आवश्यक तापमान प्रकाश, नमी और पोषक तत्व की मात्रा धान के खेत में विद्यमान रहती हैं।

नील हरित शैवाल द्वारा स्थिर किया गया नाइट्रोजन पौधों को शैवाल की जीवित अवस्था में ही मिल जाता है या शैवाल कोशिकाओं  के मृत होने के बाद जीवाणु द्वारा विंटन होने पर प्राप्त होता है।

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जैव उर्वरक कार्यक्रम के उद्देश्य:-

  1. जैव उर्वरक के क्षेत्र में शोध विकास व उपयोग को प्रोत्साहित करना।
  2. एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के उद्देश्य से जैव उर्वरकों एवं रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग हेतु प्रौद्योगिकी विकास।
  3. नील हरित शैवाल जैव उर्वरक हेतु हल्के केरियर का विकास। विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों के उपयोग हेतु उच्च गुणवत्ता की शैवाल प्रजातियों का चयन करना एवं उन्हें अलग कर एकत्रित करना।
  4. नील हरित शैवाल जैव उर्वरक के उत्पादन हेतु कृषकों को उच्च गुणवत्ता का मदर कल्चर/स्टार्टर कल्चर उपलब्ध कराना।
  5. कृषकों द्वारा उत्पादित जैव उर्वरकों की गुणवत्ता का परीक्षण जैव उर्वरकों की तकनीकी जानकारी देना तथा व्यापक प्रचार एवं प्रसार करना।

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नील हरित शैवाल उत्पादन विधि:-

  1. नील हरित शैवाल जैव उर्वरक उत्पादन के लिए 5 मीटर लंबा, 1 मीटर चौड़ा तथा 8 से 10 इंच गहरा पक्का सीमेंटेड टैंक बना ले। टैंक की लंबाई आवश्यकतानुसार घटाया बढ़ाई जा सकती हैं। टैंक ऊँचे एवं खुले स्थान पर होना चाहिए। सीमेंटेड टैंक के स्थान पर उपरोक्त नाप का कच्चा गड्ढा भी बना सकते हैं। कच्चे गड्डे में 400 से 500 गेज मोटी पॉलिथीन बिछा ले। खेत के स्थान पर खुली छतों पर भी 2 इंच ऊंचा गड्डा या टैंक बना सकते हैं।
  2. टैंक व गड्डे में 4-5 इंच तक पानी भर लें तथा प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से 1 किलोग्राम खेत की साफ-सुथरी भुरभुरी मिट्टी, 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 10 ग्राम कार्बोफ्यूरान डालकर अच्छी तरह मिलाकर दो-तीन घंटे के लिए टैंक को छोड़ दे।
  3. मिट्टी बैठ जाने पर सौ ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से उच्च गुणवत्ता का शैवाल स्टार्टर कल्चर पानी के ऊपर समान रूप से बिखेर दे।
  4. लगभग 8-10 दिन में शैवाल की मोटी परत बन जाती हैं साथ ही साथ पानी भी सूख जाता है। यदि तेज धूप या किसी कारण से शैवाल परत बनने से पहले ही पानी सूख जाए तब टैंक में और पानी सावधानीपूर्वक किनारे से धीरे-धीरे डालें जिससे शैवाल की मोटी परत टूटने ना पाए। 8 से 10 दिन बाद काई की मोटी परत बनने के बाद भी यदि गड्डे व टैंक में पानी भरा हो तो उसे डिब्बे इत्यादि से सावधानीपूर्वक बाहर निकल दे।
  5. टैंक व गड्ढे को धूप में सूखने के लिए छोड़ दें। पूर्णतया सूख जाने पर शैवाल कल्चर को इकट्ठा करके पॉलिथीन बैग में भर कर खेतों में प्रयोग करने हेतु रख ले।

  6. पुनः उपरोक्त विधि से उत्पादन शुरु करें तथा स्टार्टर कल्चर के स्थान पर उत्पादित कल्चर का भी प्रयोग कर सकते हैं। यदि उत्पादित कल्चर उच्च गुणवत्ता का है। एक बार में 5 मीटर साइज के टैंक या गड्डे से लगभग 6.5 से 7.0 किलोग्राम शैवाल जैव उर्वरक प्राप्त होता है।
  7. नील हरित शैवाल जैव उर्वरक के उत्पादन के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती हैं। अप्रैल-मई जून माह इसके उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं।

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सावधानीया:- 

  1. नील हरित शैवाल जैव उर्वरक के प्रयोग में लाई जाने वाली मिट्टी साफ-सुथरी एवं भुरभुरी होनी चाहिए।
  2. उत्पादन में प्रयोग की जा रही मिट्टी ऊसर भूमि की नहीं होनी चाहिए।
  3. मिट्टी में कंकड़, पत्थर एवं घास को छलनी से अच्छी तरह छान ले।
  4. जैव उर्वरक उत्पादन हेतु प्रयोगशाला द्वारा जांच किए गए उच्च गुणवत्ता वाले स्टार्टर कल्चर का ही प्रयोग करें।
  5. कृषक अपने यहां उत्पादित जैव उर्वरक की गुणवत्ता की जांच परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा अवश्य करा लें।
  6. शैवाल जैव उर्वरक की पपड़ियों को नाइट्रोजन उर्वरकों एवं कीटनाशक रसायनों के साथ मिलाकर ना रखे।
  7. शैवाल जीव उर्वरक की थैलियों को नमी से दूर रखें।
  8. चूँकि शैवाल जैव उर्वरक के उत्पादन में कार्बोफ्यूरान का प्रयोग किया जाता है अतः ध्यान रखें कि जानवर टैंक के पानी को नहीं पियें। अन्यथा उन पर कार्बोफ्यूरान का प्रभाव हो सकता है। अतः टेंक एवं गड्डे को जानवरों से सुरक्षित रखें।
  9. यदि उत्पादन के समय बारिश हो तो टेंक एवं गड्ढे को पॉलिथीन से ढक दें तथा बारिश समाप्त होने पर हटा दें।

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प्रयोग विधि:-

  • धान की रोपाई के एक सप्ताह बाद स्थिर पानी में 12.5 किग्रा प्रति हेक्टर के हिसाब से शैवाल कल्चर बिखेर दे।
  • शैवाल जैव उर्वरक प्रयोग करने के चार-पांच दिन बाद तक खेत में पानी भरा रहने दे।

स्रोत:-

डॉ. एम. के. जे. सिद्दीकी
निदेशक
डॉ. राजेश चतुर्वेदी
सयुंक्त निदेशक

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद उ. प्र.

(विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग उ.प्र. शासन)

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