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नींबू वर्गीय फलों की खेती समस्या एवं समाधान

नींबू वर्गीय फलों की खेती
Written by bheru lal gaderi

नींबू वर्गीय फलों के बगीचे लगाने के पश्चात उससे संबंधित अन्य तकनीकी जानकारियों के अभाव में किसान को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। वृक्षों में फूल आना, फलों का गलना, फलों पर दाग लगना, कीट एवं अन्य बीमारियों का प्रकोप होना आदि समस्याएं हैं, बीमारियों में ‘सिट्रस डिक्लाइन’ जिसके कई कारण हो सकते हैं या डायबैक (उपर से सूखने की समस्या) आदि बड़े पैमाने पर गंभीर रूप लिए हुए हैं, जिसके कारण उत्पादन क्षमता में भारी कमी आ जाती है।

नींबू वर्गीय फलों की खेती

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बगीचे के लिए उपयुक्त जमीन

अच्छी उपजाऊ जमीन नींबू वर्गीय(Lemonade) पौधों के लिए उपयुक्त रहती हैं। अत्यधिक भारी भूमि जल निकास की समस्या के कारण पेड़ों के थाले में पानी भरे रहने के कारण फफूंदीजनित बीमारियों के पनपने की संभावना बनी रहती है। फलवृक्ष को निरोगी होने की स्थिति में भी अम्बे बहार में फूल नहीं आते हैं। अधिक हल्की जमीनों में पेड़ों की हालत खराब रहती है।

समाधान

पौधे लगाते समय भूमि की जांच करवाकर हो सके तो 4- 5 फीट की परिधि में मिट्टी परिवर्तित या मिट्टी शिवांश खाद की मात्रा अधिक डालें।

उत्तम गुणवत्ता वाले पौधे ही बगीचे में लगावे

इसके लिए राष्ट्रीय नींबू वर्गीय फल अनुसंधान केंद्र, अमरावती रोड, नागपुर पर संपर्क करें।

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फलों में पोषण

वृक्षों की गुणवत्ता और जमीन की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए मृदा की उर्वरता बनाए रखना अति आवश्यक है। संतुलित पोषण हेतु फलदार वृक्षों में जमीन में 3 बार जुलाई, नवंबर और अप्रैल में तथा सूक्ष्म पोषक तत्व मासिक दो बार जुलाई और नवम्बर में देना चाहिए। गोबर की खाद, फास्फोरस व पोटाश प्रारम्भ में फरवरी में एक बार देना चाहिए।

सिंचाई

नींबू वर्गीय पौधों में मौसम एवं जलवायु तथा मिट्टी की प्रकृति के अनुसार नमी बनाए रखना चाहिए। फल का विकास होते समय पौधे पर्याप्त मात्रा में तथा नियमित अंतराल से पौधों में सिंचाई व्यवस्था करनी चाहिए। नींबू वर्गीय पौधों में 5 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों में प्रति सिंचाई करीबन 10000 लीटर पानी की प्रति हेक्टेयर के हिसाब आवश्यकता होती है। बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली इसकी खेती के लिए श्रेष्ठ होती है।

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पेड़ों को तान देना

नींबू वर्गीय पौधों को 40-45 दिन (25% पेड़ों की पत्तियां गिरने तक) अस्थाई रूप से सिंचाई के पानी को रोकना पड़ता है, जिसे तान (स्ट्रेस) कहते हैं। पेड़ों की वृद्धि पर रोक लगती है और फिर से 40- 45 दिन बाद सिंचाई की जाती है तब पेड़ों में एक साथ नई पत्तियाँ फूटती है, जिस पर फूल एवं फल लगते हैं। मृगबहार के लिए अप्रैल के महीने में और अम्बे बहार के लिए दिसंबर- जनवरी में सिंचाई रोक दी जाती है।

फलों का गलना

फल लगने के बाद से गलने की समस्या होती है। यह समस्या अगस्त-सितंबर के बीच गंभीर होती है। गलने से फसल में काफी नुकसान होता है। फलों पर रस चूसने वाली तितली के प्रकोप से  तकरीबन 20-25% तक पकने वाले फल गिरते हैं।

फल गलने की समस्या की रोकथाम के लिए 2-4D 10 मिलीग्राम या एन. ए. ए. 15 मिलीग्राम की मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से फल लगने के तीन  सप्ताह बाद छिड़काव करना चाहिए। कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू. पी. ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से मिला कर अम्बे भर में गर्मियों में सिंचाई से व अगस्त-अक्टूबर के बीच 20 से 25 दिनों के अंतर से छिड़काव करना चाहिए।

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खरपतवार नियंत्रण एवं अंतराशस्य

वर्षा के समय में वृक्षों के नीचे खरपतवार आ जाते हैं तथा ये उर्वरक एवं पानी को तो लेते ही हैं साथ में रोगाणुओं एवं कीटों को आश्रय देते हैं। इन खरपतवारों को नष्ट करने के लिए डाईथुरान 3.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मई महीने के आखिरी में एक छिड़काव तथा इसके 120 दिनों के बाद दूसरा छिड़काव करना जरूरी है।

सितंबर के अंत में या अक्टूबर माह में बगीचों की जमीन का पृष्ठभाग कठोर एवं कड़क परत में बदल जाता है। जिसके कारण पेड़ की जड़ों को हवा नहीं मिल पाती पत्तियां पीली पड़ने लगती है। ऐसे समय वृक्ष के थाले की जमीन से 4-5 से.मी. गहराई तक खुदाई कर उसे ढीली कर देनी चाहिए। इससे पेड़ों की जड़ों को आवश्यक हवा मिलती हैं और पेड़ों की सही वृद्धि होती है।

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नींबू वर्गीय पौधों के प्रमुख रोग एवं निदान

गमोसिस

लक्षण:-

  • पत्ते पीले पड़ना।
  • पेड़ की शाखाओं का सूखना।
  • जड़ों का सूखना।
  • ज्यादा फल आना व पकने से पहले पीले होकर गिरना।
  • पेड़ों के तने से गोंद जैसा लसलसा पदार्थ निकलना।

उपचार

  • जल निकासी की समुचित व्यवस्था।
  • साल में तीन बार जून, अक्टूबर व जनवरी माह में पेड़ों के तने से गोंद को खुरचकर बोर्डो पेस्ट का लेप करना चाहिए।
  • रोग के लक्षण दिखाई देते ही कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 W P अथवा कॉपर हाइड्रोऑक्साइड 70 W P 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

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कैंकर रोग

इस रोग के कारण वृक्ष की शाखाओं, पत्तों एवं फलों पर गहरे काले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। वर्षा के समय अधिक नमी के होने से इस रोग का उग्र रूप दिखाई देता है। रोग युक्त फलों को बाजार में सही कीमत नहीं मिल पाती हैं।

उपचार

  • रोग ग्रसित शाखाओं को काट कर जला देना चाहिए।
  • स्ट्रेप्टोसाइक्लीन (0.2 ग्राम/लीटर पानी अथवा कासुगामाइसीन 3 एस.एल. (2 मि.ली./लीटर पानी) अथवा कॉपर आक्सीक्लोराइड 50 डब्लू. पी. (3 ग्राम/लीटर पानी) का 15 से 20 दिन के अंतराल पर तीन से चार बार छिड़काव करें।

बगीचों का क्षय होना

बगीचों का क्षय होना या क्षय ग्रसित होना नींबू वर्गीय बागों की प्रमुख समस्या है। जैसे कलम का रोग ग्रसित होना जमीन में आवश्यक पोषक तत्वों का अभाव होना, गर्मी में सिंचाई की अपर्याप्त व्यवस्था, कीट या रोग के रोकथाम का समुचित प्रबंध होना आदि इन कारणों को दूर करने के लिए समुचित प्रबंध करना चाहिए।

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नींबू वर्गीय पौधों के प्रमुख कीट एवं प्रबंधन

नींबू वर्गीय फलोंउद्यान में अनेक तरह के कीट का प्रकोप होता रहता है। मुख्य रूप से निंबू वर्गीय फलों में लगने वाले कीट निम्नलिखित हैं।

लीफ माइनर (पत्ती बेधक)

यह कीट छोटे पौधे से बड़े पौधों की पत्तियों में सुरंग बनाता हुआ फैलता है। प्रभावित पौधों की पत्तियां किनारे से अंदर की ओर मुड़ने लगती है, सूख जाती है। यदि कीट का प्रकोप छोटे पौधों की कोमल शाखाओं पर होता है तो “डाइबेक”  रोग का कारण बनता है। ये कीट कैंकर के फैलने में सहायक होता है इस कीट का प्रकोप जुलाई अक्टूबर माह में वर्षा के समय उसके बाद 3 मार्च के महीनों में अधिक होता हैं।

प्रबंधन

नई पत्तियों के फूटने के समय एसीफेट 75 एस. पी. 2.0 ग्राम अथवा थायोमेथॉक्जाम 25 डब्ल्यू. पी.  0.75 ग्राम या डाइमेथोएट  1.5 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए। पौधशाला में कीटग्रस्त पत्तियों को काट कर नष्ट कर देना चाहिए।

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सिट्रस सिल्ला

यह वृक्षों की कोमल शाखाएं पत्तों और कलियों के रस का शोषण करते हैं। जिसके फलस्वरुप नई पत्तियां और कलियां अधिक मात्रा में गिरने लगती हैं। छोटे कीट शहद जैसा सफेद चिपचिपा पदार्थ भी छोड़ते हैं जिन पर बाद में काली फफूंद का प्रकोप शुरू हो जाता है। गिनीज नामक अत्यंत हानिकारक बीमारी के फैलाव में सिल्ला अहम भूमिका निभाते हैं।

प्रबंधन

  • कलियों के बनते समय या नए बहार के समय जनवरी-फरवरी, जून-जुलाई और अक्टूबर-नवंबर में इन कीटों का प्रभाव दिखाई देते ही एसीफेट 2.0 ग्राम  या डाइमेथोएट8 मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।
  • मीठी नीम का पौधा बगीचे के आसपास नहीं लगाना चाहिए क्योंकि यह परजीवी सिल्ला कीटों के प्रजनन कार्य के लिए सहायक होता है।

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पत्ते खाने वाली इल्ली

संतरे और नींबू के वृक्षों पर इन कीड़ों का प्रभाव वर्ष पर दिखाई देता है। इस कीट का लारवा अवस्था नई पत्तियों को नुकसान पहुंचाता है। जिसके कारण पेड़ जल्दी ही पत्ती विहीन हो जाते हैं।

प्रबंधन

  • इन कीड़ों का नियंत्रण एसीफेट 75 एस.पी. 2.0 ग्राम का प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • इंडोक्साकार्व8 ई.सी. 0.75 मिली का 1 लीटर पानी की दर से छिड़काव करने से इस कीट की रोकथाम होती हैं।

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थ्रिप्स

इसमें शिशु और प्रौढ़ कीड़े पत्ती, कलियों और फलों के रस का शोषण करते हैं। पत्तियां अर्ध गोलाकार मुड़ जाती हैं।

प्रबंधन

पट्टी के मुरझाने की स्थिति में कलि फूटने की अवस्था में छोटे फलों और नीचे जमीन पर आस-पास की घास पर फिप्रोनिल 5ई.सी. 20मिली. या थायोमेथेक्जाम  25मिली डब्ल्यू.जी. 0.75 ग्राम को प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।

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सिट्रस माइट

फलों व पत्तों के रस का शोषण कर लेते हैं। पत्तों पर धूल जमा होने के कारण धूल भरा भाग दिखाई देता है। जिसके कारण पत्तों पर हल्के गोलाकार निशान पड़ते हैं। जब हरे फल पकने लगते हैं और फूलों का रंग पीला पड़ने लगता है, फल खराब हो जाता है।

प्रबंधन

सिट्रस माइट का प्रकोप दिखाई देते ही डाइफॉल 18.5 ई. सी. 1.5-2.0 या घुलनशील सल्फर 80% 2.5 ग्राम का प्रति लीटर की लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

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कीटों के नियंत्रण हेतु ध्यान देने वाली बातें

  • वृक्षों पर नए फूल एवं पत्तियां आने पर छिड़काव करना चाहिए।
  • बाग में उपलब्ध अन्य पेड़ो को नष्ट कर देना चाहिए।
  • जल निकास का पूर्ण प्रबंध होना चाहिए।
  • वृक्षों की सही बढ़त के समय शाखाओं की कटाई छटाई करनी चाहिए।
  • नत्रजन युक्त उर्वरकों का प्रयोग आवश्यकता अनुसार करना चाहिए।
  • संतरे के वृक्षों का घेराव ऐसा रखना चाहिए जिससे अधिक से अधिक सूर्य का प्रकाश पौधों को प्राप्त हो सके।

Author:-

नवल किशोर गुप्ता
जालिम सिंह
कृषि विज्ञान केंद्र
चौमू
जयपुर (राज.)
सभार:-
राजस्थान खेती प्रताप

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