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नींबू की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

नींबू
Written by bheru lal gaderi

भूमि:-

नींबू की खेती को लगभग सभी तरह की भूमि पर कि जा सकता है । लेकिन फिर भी दोमट मिट्टी वाली भूमि जहाँ जल-प्रणाली का उत्तम प्रबंध किया गया हो उसे हीं निम्बू की खेती के लिए सबसे अच्छा माना गया है । निम्बू की खेती के लिए भूमि की गहराई लगभग 2.5 मी.या से ज्यादा होनी चाहिए और इसका ph मान लगभग 7.0 तक होना चाहिए तभी निम्बू की अच्छी वृद्धि और उपज मिलती है । ऐसी मिट्टियाँ और ऐसा क्षेत्र जहाँ पर पानी जमा हो जाता हो उसे नींबू की खेती के लिए सही नहीं माना जाता है ।

नींबू की खेती के लिए जलवायु:-

निम्बू की खेती के लिए गर्म और मध्यम आद्रता, वाले स्थान को अच्छा माना जाता है । निम्बू की अच्छी वृद्धि और इसके अच्छे उत्पादन के लिए 20-32 डिग्री से. तक का तापमान की आवश्यकता होती है साथ हीं इसकी खेती में औसत वार्षिक वर्षा 750 mm से ज्यादा नहीं होनी चाहिए ।

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नींबू की उन्नत किस्मे:-

कागजी निम्बू:-

इसकी Wide popularity के वजह से इसे खट्टा निम्बू का समानार्थी माना जाता है।

प्रमालिनी निम्बू:–

इस किस्म के नींबू bunch में फलते है, और इसके एक गुच्छे में लगभग 3 से 7 तक फल लगते हैं । प्रमालिनी निम्बू,कागजी निम्बू के तुलना में 30% ज्यादा उपज देती है ।

विक्रम निम्बू:–

इसके फल भी bunch में हीं फलते है । एक bunch में लगभग 5 से 10 फल लगते है ।

चक्र धर निम्बू:–

इस निम्बू में बीज नहीं होते है और इसके फल से लगभग 65% रस निकलता है ।

पि.के. एम् -1:–

यह भी ज्यादा उत्पादन वाली किस्मो में से एक है । इसके फलो से लगभग 50% रस प्राप्त हो जाते है ।
ऊपर दिए गए नींबू के किस्मो के अलावा साईं सर्बती, सीडलेस निम्बू , भी निम्बू के उन्नत किस्मो में से एक है ।

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बीज रोपण:-

नींबू के पौधों को रोपने का सबसे सही समय June से July तक का होता है और अगर सिंचाई का प्रबंध सही से किया जाये तो इसकी रोपाई February और March में भी की जा सकती है । पौधे को रोपने से पूर्व हर एक गड्ढे की मिट्टी में लगभग 20 kg गोबर की खाद और 1 kg सुपर फ़ॉस्फ़ेट को अच्छी तरह से mix कर दें । पौधों को रोपने समय हर एक पौधों के बीच का distance लगभग 20-20 cm का space होना चाहिए ।

खाद प्रबंधन:-

नींबू की खेती में सड़ी हुई गोबर की खाद को हर साल दिया जाता है । पहले साल में 5 kg दुसरे साल में 10 kg तीसरे साल में 20 kg और इसी तरह हर साल पिछले साल का दोगुना खाद देना होता है । नींबू की खेती में Organic manure साल में दो बार पड़ता है । पहला december और January में और दूसरा April और May में । जो वृक्ष फल देने वाले होते है ऐसे वृक्ष में 60 kg गोबर की खाद, 2.5 kg अमोनियम सल्फ़ेट, 2.5 kg सुपर फास्फेट और 1.5 kg म्यूरेट ऑफ़ पोटाश का use करना चाहिए ।

सिंचाई:-

निम्बू की खेती में सालो भर नमी की जरुरत होती है । वर्षा के मौसम में सिंचाई की जरुरत नहीं होती है । ठंड के समय 1 month के interval पर सिंचाई और गर्मियों में 10 days के interval पर सिंचाई करना होता है ।

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नींबू का रोग व कीट से बचाव / Tips to Control Disease and Pest:-

नींबू का सिला:–

यह कीट नयी पत्तियों और कलियों से रस चूस जाते है । इस कीट के प्रकोप से पत्तियां गिरने लगती है । इस कीट से एक तरह का चिटचिटा पदार्थ निकलता है जिस पर काली मोल्ड जम जाती है । इस कीट के नियंत्रण हेतु इससे प्रभावित सभी parts को काट कर जला दे।

नींबू कि तितली:–

यह कीट नर्सरी के पौधों को काफी नुकसान पहुंचाती है । इसके green color के इल्ली पत्तियों को खा जाते है । यह किट April से May तक और August से October तक ज्यादा लगते है । नींबू कि तितली से नियंत्रण के लिए अपने खेतो में नीम के काढ़ा का छिडकाव micro झाइम में mix कर करना चाहिए ।

माहू कीट:–

माहू कीट december से march तक ज्यादा लगते है । यह कीट फूलो व पत्तियों के सारे रस चूस जाते है जिससे फूल व पत्ते दोनों हीं कमजोर होकर गिरने लगते है । इस कीट के नियंत्रण हेतु खेतो में नीम का काढ़ा का छिड़काव करना चाहिए ।

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कैंकर रोग:–

यह रोग विशेष रूप से नींबू पर हीं लगते है । इस रोग के लगते हीं पहले नींबू के पत्तियों पर light yellow color के धब्बे होने लगते है और फिर वे धब्बे आहिस्ता आहिस्ता dark brown color के हो जाते है । इस रोग के बढ़ने से शाखाएं और फल दोनों हीं ग्रसित हो जाते है ।

इस रोग के नियंत्रण हेतु रोग से ग्रसित शाखाओ को पौधों से छाट कर अलग कर देना चाहिए । उसके बाद कटे हुए सभी शाखाओ पर ग्रीस लगा दिया जाता है । इसके बाद बरसात start होते हीं माइक्रो झाइम और नीम का काढ़ा का छिड़काव किया जाता है ।

गोदार्ती रोग:–

यदि इस रोग का आक्रमण तने पर हो तो इस रोग को गोदार्ती तना बिगलन कहा जाता है । इस रोग के प्रकोप से छाल में से गोंद की तरह एक पदार्थ निकालता है जिससे छाल brown हो जाती है और उसमे दरारे होने लगती है । इसके रोग से बचने हेतु बहुत से उपाय है जैसे की:-

  • खेत में से जल निकलने का अच्छा प्रबंध करना होगा और साथ हीं इस बात का भी ध्यान रखना होगा की सिंचाई का पानी direct तने के संपर्क में नहीं आने चाहिए ।
  • इस रोग से ग्रसित भाग को किसी तेज़ धार वाले चाकू से छिल कर फिर उसके ऊपर से ग्रीस लगा दें ।
  • नीम का काढ़ा या मिट्टी का तेल(Kerosene) का भूमि में छिड़काव करे ।

विष्णु रोग:–

इस रोग के वजह से पत्तियों पर हरे रंग की महीनता नज़र आने लगती है । इसके अलावा पत्तियां और टहनियां dry होकर सुख जाती है । इससे बचना है तो नीम के काढ़ा को पूरे खेत में छिड़क दें ।

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फसल की तुड़ाई/Picking:

खट्टे नींबू के पौधों में एक साल में कई बार फल लगते है और इसके फलो को तैयार होने में लगभग 6 month का time लगता है । जब फल पक कर हरे रंग से पीला रंग हो जाता है तब उसकी तुड़ाई start कर दी जाती है ।

उपज/Production:-

यह अक्सर पूछा जाता है की नींबू के पेड़ पर कितने साल से फल लगने लगते है | वैसे तो 1 साल के बाद ही नींबू के छोटे-छोटे फल लगने लगते है पर वह किसी काम का नहीं होता है | 3 से 4 साल के होने तक निम्बू के पेड़ में अच्छी मात्र में निम्बू फल लगने लगते है | और 5 से 6 साल की उम्र वाले पौधो से सालाना 2,000 से 5,000 निम्बू के फल प्राप्त किये जा सकते है ।

आज के समय में लगभग सभी शहरों में 10 रूपए (INR) में 3 से 5 piece ही नींबू मिलता है |उस हिसाब से अगर आप देखे तो किसान भाई आसानी से हर एक piece पर Rs 0.75 से ले कर Rs 1.00 मिल सकते हैं | अगर किसान भाई कम ही मान कर चले और हर एक lemon के piece का price Rs 0.75 ही लगाये तो, कुछ इस प्रकार से profit margin आएगा :

  • Average Annual Production of Lemon from one Tree:- 3,000 piece
  • Total no. of Lemon Trees in One Acer of Land:- 150 Trees
  • Production = 4,50,000 Lemon
  • Total Sales (4,50,000 x Rs 0.75) = Rs 3,37,500

अब अगर मान कर चला जाये की सब मिल कर खर्चा maximum 1 लाख सालाना भी हो तो आप आसानी से Rs 2,00,000 कम से कम कम सकते है वो भी केवल 1 acer से | यह सही बात है की सुरुवात में आपको 3 से 4 साल तक का इंतज़ार करना होगा और investment भी थोडा होगा, पर अगर आप 4 से 10 साल तक का नजरियाँ ले कर चलते है तो आपको यह बैठा बैठाया on-going कम से कम 2 लाख आसानी से कम सकते है |

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Article Source:-

प्रगतिशील किसान मंच
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