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नागरमोथा की औषधीय खेती एवं उत्पादन तकनीक

नागरमोथा की औषधीय खेती
Written by bheru lal gaderi

देश में वनों के विनाश के कारण लुप्त होती औषधीय (नागरमोथा) पौधों की प्राप्ति का एकमात्र साधन इनकी खेती ही रह गई है। देशज चिकित्सा पद्धतियों के बढ़ते प्रभाव और आयुर्वेदिक, यूनानी एवं एलोपैथिक, होम्योपैथिक चिकित्सा में लगातार बढ़ते उद्योग के प्रयोग और विदेशों में किए जा रहे हैं शोधकार्य तथा नई पेटेंट नीति के चलते विदेशी मूल की दवाओं की कीमत में बेतहाशा बढ़ोतरी ने देशज भारतीय उद्योग की मांग को देश ही नहीं विदेशों में भी काफी बढ़ाया हैं।

वनौषधियों की बढ़ती हुई इस मांग ने इनकी खेती को अत्यंत लाभप्रद बना दिया है। इसकी खेती से किसानों को जहां परंपरागत अनाज और सब्जी की तुलना में अधिक मूल्य मिल रहा है। इसे निर्यातकों को भी अच्छा लाभ और राष्ट्र के विदेशी मुद्रा के भंडार में वृद्धि हो रही है। कुल मिलाकर वनऔषधियों की खेती आज अत्यंत लाभकारी बन चुकी है जो प्रगतिशील भारतीय कृषकों के लिए रोजगार का नया साधन बनती जा रही है।

नागरमोथा की औषधीय खेती

नागरमोथा एक ऐसी ही वन औषधीय पादप है, वनस्पतियों की बढ़ती मांग की खेती की संभावनाएं अत्यंत लाभकारी और रोजगारपरक दिखाई पड़ रही है। नागरमोथा ‘साइप्रेसी’ कुल का पादप हैं, जिसका वानस्पतिक नाम “साइप्रस स्केरियोसस” हैं। इसे संस्कृत में मुस्तिका के नाम से संबोधित किया गया है। नागरमोथा की साठ प्रजातियां पाई जाती है, जिसमें व्यवसायिक दृष्टि से सर्वाधिक उपयोगी साइप्रस स्केरियोसस ही है। इसकी जड़ों से प्राप्त तेल का प्रयोग सुगंधियों और औषधियों में किया जाता है। इसकी मांग दवा बनाने वाली देशी, विदेशी कंपनियों के अलावा सुगंध के लिए साबुन, शैंपू, परफ्यूम और अगरबत्ती की कंपनियों की ओर से लगातार बढ़ रही है। नागरमोथा की जड़ों से प्राप्त होने वाले औषधीय तेल को ‘साइप्रस ऑयल’ या -‘साईप्राल’ कहां जाता है।

नागरमोथा की खेती

इसकी बढ़ती हुई मांग को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने इसकी खेती का जो तरीका इजाद किया है, उसके अंतर्गत इस पौधे की खेती के लिए इसके जड़ सहित निचले तने के अंकुरण योग्य शाखाओं का उपयोग किया जाता है। इसका प्रसार लमेनग्रास या खस के पौधे की ही तरह तना सहित जड़ वाले हिस्से को रोपकर किया जाता है।

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भूमि

इसकी खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रेतीली, दोमट और दलदली जमीन होती है। मूल रूप से इसकी खेती के लिए जलधारक क्षमता वाली भूमि उपयुक्त होती है, ऐसी भूमि में इसकी जड़ों का विकास अच्छा होता है। इसकी खेती बंजर और अनुउपजाऊ जमीन में भी सफलतापूर्वक होती हैं।

खेत की तैयारी

इसकी खेती के लिए अप्रैल या मई के महीने में खेत की जुताई करके उसमें उगी घास को बिनकर अच्छी तरह से निकालकर खेत को धूप लगाने के लिए छोड़ देना चाहिए। जब खेत को अच्छी तरह धूप लग जाए और मिट्टी में भरपूर भूरापन दिखाई देने लगे, तब इस खेत में 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद मिलाकर एक हल्की जुताई करके खाद को खेत में मिला देना चाहिए।

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रोपाई

उपरोक्त विधि से तैयार खेतों में 15 जून से 15 जुलाई के बीच इसके जड़ सहित निचले तने को जड़ के ऊपर से 3-4 इंच छोड़कर काटने के बाद अंकुरण योग्य एक एक पंजे को अलग करके 15 15 सेमी की दूरी पर तैयार खेत में रोप देना चाहिए। इसके लिए एक हेक्टेयर खेत खेत में 20000 पुंजे वाले पौधों की रोपाई की जाती है। पौधे के पौधों की रोपाई के तुरंत बाद खेत की हल्की सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए।

फसल की देखभाल

रोपाई के 2 सप्ताह बाद खेत की जरूरत को देखकर पहली सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। इसकी खेती के लिए इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि यह नम क्षेत्र में पैदा होने वाली वनस्पति है, अतः इसकी खेती के लिए भूमि में हमेशा नमी बनी रहना आवश्यक है, अन्यथा इसकी खेती लाभकारी नहीं रहेगी। अतः इसकी सिंचाई नियमित रूप से 10 से 15 दिन के अंतराल पर अवश्य करते रहना चाहिए।

यदि खेत में खरपतवार दिखे, तो समय-समय पर इस की निराई भी अवश्य करनी चाहिए, जिससे फसल की बढ़वार जारी रहे अगस्त माह के अंत में या सितंबर के शुरू में खुरपी या कुदाली से फसल की गुड़ाई करनी चाहिए। गुड़ाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि रोपी गई फसल पौधे के अगल-बगल की मिट्टी पलट कर भूमि में हवा, धूप आदि का प्रवेश हो सके और पौधे के अगल-बगल की मिट्टी मुलायम हो जाए।

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फसल की तैयारी

खेतों में उगाई गई नागरमोथा की फसल 18 माह में तेल निकालने के योग्य हो जाती है। अतः व्यवसायिक रूप से इसकी जड़ों की खुदाई के लिए दिसंबर और जनवरी माह का समय सबसे उपयुक्त होता है, क्योंकि इस समय इसकी पत्तियां पीली पढ़कर पकने लगती हैं, जो इसके तैयार होने की आसान पहचान है। इसकी जड़ों को खोदकर अच्छी तरह मिट्टी साफ करके हल्की धूप में सुखा लेना चाहिए। बाजार में नागरमोथा की तैयार जड़ की कीमत 1000 से 8000 रूपये प्रति क्विंटल मिलती हैं। आसवन इकाइयां खरीद कर तेल निकालती हैं।

नागरमोथा की औषधीय उपयोगिता

इसका चिकित्सीय उपयोग यूनानी और आयुर्वेदिक चिकित्सा में होता है। इसकी जड़ तीक्ष्ण और शीम प्रभावशाली मानी गई है। यह ज्वर निवारण और दर्द दूर करने वाले गुणों से युक्त होती है। इससे शरीर का तापमान भी नियंत्रित किया जाता है। इसका उपयोग अतिसार, थकान, मुख के कड़वेपन पाइरिया तथा बुखार में गला सूखने तथा बवासीर और फोड़ा फुंसी में किया जाता है। इसकी जड़ें गिनोरिया और सिफलिस जैसे यौन रोगों के अलावा पेट के दर्द में भी उपयोगी हैं। इसकी जड़ से प्राप्त वैलेरियन नामक सुगंधित द्रव्य एपिलिसि, अतिसार और प्रवाहिका का इलाज होता है। इससे बनने वाली दवाए इस प्रकार है- अमृत कलश- 4, अरेशक्रीम, बाईओवेटा इत्यादि।

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जड़ों का अवसोधन

नागरमोथा की जड़ों में निहित साइप्रोल की प्राप्ति के लिए आसवन किया जाता है, जिससे इसकी जड़ों में 0.3 से 0.4% तक साइप्रोल की प्राप्ति होती है, जिसका प्रयोग औषधियों के अलावा औद्योगिक एवं सुगंधकारी उत्पादों में भी किया जाता है।

प्रस्तुति

जगनारायण, ईशान स्टूडियो,

श्री विश्वनाथ मंदिर,

काशी हिंदू विश्वविद्यालय,

वाराणसी- 221005 (उत्तर प्रदेश)

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