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धान की फसल में प्राकृतिक तरीकों से खरपतवार नियंत्रण

धान
Written by bheru lal gaderi

जैसा कि हम सभी जानते है कि इस समय धान की खेती की जा रही है। धान में खरपतवार की बहुत बड़ी समस्या रहती है जिसके लिए बहुत से रासायनिक खरपतवारनाशियों का उपयोग किया जाता है।जिसके कारण धान की गुणवत्ता में बहुत फर्क पड़ता है इसलिए आज हम बात करेंगे खरपतवार के नियंत्रण के प्राक्रतिक उपाय के बारे में-

धान

खेत में खरपतवारों के प्रभाव को कम करने के लिए एक से बहुत से जैविक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है जैसे – बचावकारी क्रियाएँ, कृषि क्रियाएँ, यान्त्रिक क्रियाएँ एवं जैविक क्रियाएँ आदि इन सभी क्रियाओं का उपयोग इसलिए किया जाता है कि भूमि की उत्पादकता एवं उर्वरता प्रभावित न हो तथा मानव सहित अन्य किसी भी जीव–जन्तुओं, पशु-पक्षियों व वांछित पेड़-पौधों को किसी भी प्रकार का नुकसान न हो और साथ ही पर्यावरण भी सुरक्षित रहे, फसलों का सफलतापूवक उत्पादन हो।

जैविक किर्या में सबसे मत्वपूर्ण होता है जैविक आच्छादन (Mulching)। आज हम बात करेंगे विभिन्न प्रकार के आच्छादन की जिसके द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ साथ फसल को फायदा भी होगा-

धान की फसल में सजीव आच्छादन:- 

ऐसी फसलें का उपयोग करना जिनका विकास तेजी से होता है एवं भूमि की सतह को सघनता से आच्छादित कर लेती हैं तथा खरपतवारों की वृद्धि को दबा देती हैं जिससे खरपतवारों को पनपने का मौका नहीं मिल पाता है, उन्हें सजीव आच्छादन फसलें कहते हैं तथा इस विधि को सजीव आच्छादन कहते हैं। आच्छादन फसलों का अवशेष भी मृदा सतह को ढक लेता है, इससे भी खरपतवारों की संख्या कम हो जाती है। सजीव आच्छादन को फसल बुवाई या फसल स्थापित होने के पूर्व या बाद दोनों स्थितियों में लगाया जा सकता है। सजीव आच्छादन का ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए कि यह मुख्य फसल से प्रतियोगिता ना कर सके। सजीव आच्छादन का प्राथमिक उद्देश्य मृदा की संरचना में सुधार, उर्वरा शक्ति में वृद्धि, कीट एवं रोग समस्या को कम करना होता है तथा खरपतवार नियंत्रण इसके द्वारा अतिरिक्त लाभ के रूप में होता है।

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जैविक आच्छादन:- 

मृदा सतह के ऊपर जैविक आच्छादन का उपयोग करना अथवा मृदा सतह को ढकना खरपतवार के बीजों को अंकुरित होने में तथा वृद्धि करने में बाधा डालता है, क्योंकि यह प्रकाश संचार एवं वायु संचार को रोक देता है। जैविक आच्छादन के रूप में कम्पोस्ट खाद, भूसा, पुआल, सूखी घास, सूखी पत्तियां, फसल अवशेष इत्यादि का उपयोग किया जा सकता है। इनके द्वारा प्रभावी खरपतवार नियंत्रण होता है। जैविक आच्छादन के लिए समाचार पत्रों एवं पुआल का उपयोग बहुत ही प्रभावी होता है। भूमि में दो पर्ते समाचार पत्रों की एवं उसके ऊपर सूखी घास की एक पर्त का उपयोग करना चाहिए और सुनिश्चित कर लें कि घास बीज रहित हो। जैविक पलवार से लाभ यह होता है कि मृदा में इसका जैव विच्छेदन आसानी से हो जाता है।

शैवाल आधारित आच्छादन:- 

नीले हरे शैवाल का उपयोग धान के फसल में बहुत समय से किया जा रहा है हरित क्रान्ति के उपरान्त करीब विगत चार दशकों से अधिक अन्न उपजाने के लिए अन्धा-धुंध कृषि रसायनों तथा रासायनिक खादों के प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति दिन प्रतिदिन घटती जा रही है तथा मृदा प्रदुषण बढ़ता चला जा रहा है और भूमि के स्वास्थ को अच्छा रखने वाले सुक्ष्म जीवों की संख्या घटती जा रही है। अतएव अब धान की पैदावार प्रति हेक्टेयर कम होती जा रही है। ऐसी परिस्थिति में कृषि वैज्ञानिक भूमि की उर्वरा शक्ति बरकरार रखने तथा इसे बढ़ाने के लिए दूसरे विकल्पों के बारे में कार्यनीति बनाने में लगे है ताकि भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाकर उत्तम खेती की जा सके।

इस सन्दर्भ में एक जैव उर्वरक व प्राक्रतिक आच्छादन जो नील हरित शैवालों के संवर्धन से बनाया जाता है अति महत्वपूर्ण है। यह जैव उर्वरक खरीफ सीजन 20-25 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर करता है तथा मिट्टी के स्वास्थ्य को ठीक रखता है। इसके अतिरिक्त भूमि के पानी संग्रह की क्षमता बढ़ाना एवं कई आवश्यक तत्व पौधों को उपलब्ध कराता है। भूमि के पी.एच. को एक समान बनाये रखने में मदद करता है तथा अनावश्यक खरपतवारों को पनपने से रोकता है। इसे जैव उर्वरक के लगातार प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है तथा धान एवं गेहूं की उपज भी 5-10 प्रतिशत बढ़ती है।

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