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धान की एस. आर. आई. उत्पादन तकनीक से अधिक लाभ कमायें

धान
Written by bheru lal gaderi

चावल विश्व की ज्यादातर आबादी के आहार का प्रमुख स्रोत है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा एवं विटामिन्स होता है। देश में लगभग 4-4 करोड़ हैक्टेयर जमीन में धान  (चावल) की खेती 9 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है।

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धान की मेडागास्कर उत्पादन पद्धति

वर्तमान स्थिति में आत्मनिर्भरता बनाए रखने के लिए हमें प्रति वर्ष 1.5 लाख टन अतिरिक्त अनाज की जरुरत होगी।  इस जरूरत को पूरा करने के लिए हमारे पास सिमित विकल्पों में से एक संकर किस्मों एवं नई उत्पादन तकनीक जैसे मेडागास्कर पद्धति को अपनाना है।  आज धान की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ने की महती आवश्यकता है।

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धान की रोपणी एवं बीज उपचार

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रोपणी

बुवाई हेतु एक हैक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 100 वर्गमीटर की रोपनी बनायें। रोपणी एक मीटर चौड़ी एवं सुविधानुसार लम्बी रखें।

बीज उपचार

एक हैक्टेयर क्षेत्रफल के लिए रोपनी में 5 किलो बीज बोए एवं बीज को कार्बेन्डाजिम एवं मेंकोजेब नामक फफुंफ नाशक दवा से उपचारित करें। लगभग 3 ग्राम दवा प्रति किलो के हिसाब से प्रयोग करें।

धान की रोपाई

रोपाई के लिए 12 से 14 दिन के पौधे प्रयोग करें। पौध से पौध एवं कतार से कतार की दुरी 25 से.मि. रखना चाहिए।

धान की एस. आर. आई. उत्पादन तकनीक

धान की कम लागत से अधिक उत्पादन की खेती की विधि के रूप  में मेडागास्कर पद्धति का विकास हुआ, जिसे एस. आर. आई. पद्धति भी कहा जाता है। इस पद्धति से धान का 7-15 टन प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

कार्बनिक खादों का प्रयोग

इस विधि में बीज, पानी, रसायनों का कम मात्रा में प्रयोग किया जाता है तथा अधिक मात्रा में कार्बनिक खादों का इस्तेमाल करना पड़ता है। बाद में कार्बनिक खाद की मात्रा भी कम देनी पड़ती है।

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एस. आर. आई. विधि का प्रचार एवं प्रसार

मध्यप्रदेश में कृषि विश्वविद्यालय एवं कृषि विभाग के सयुंक्त प्रयासों से इसे किसानों के खेतों तक पहुंचने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। इस विधि से किसानों के खतों में किये गए परीक्षणों से 7-8 टन प्रति हैक्टेयर उत्पादकता पाई गई हैं।

खेत का चुनाव खेत की तैयारी रोपाई

एस. आर. आई. पद्धति की विशेषताएं

  1. बहुत कम मात्रा में बीज (5 किलो बीज प्रति हैक्टेयर) पानी उर्वरक एवं कीटनाशक रसायनों का उपयोग किया जाता हैं।
  2. शरू में कार्बनिक खाद की अधिक मात्रा देने से विपुल उत्पादन होता हैं, जिसकी मात्रा आने वाले वर्षों में घटती जाती है।
  3. पोधो में अत्यधिक मात्रा में जड़ो का विकास होता है तथा नए कंसो की संख्या में अत्यधिक वृद्धि (30-100 प्रति पौधा) होती हैं।
  4. बलिया लम्बी होती हैं और उसमें दाने पुष्ट पड़ने से वजनी होते हैं एवं प्रति बाली दानो की संख्या बढ़ती है। जिससे उपज में वृद्धि होती है।

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एस. आर. आई. पद्धति से धान की खेती का प्रबंधन

कम उम्र के पौधों की रोपाई करें

8-14 दिनों तक के उम्र के पौधों की रोपाई करे, जिससे पौधों में जड़ो और कंसो की वृद्धि होने से उत्पादन बढ़ता हैं। रोपाई की सरलता के लिए 12-14 दिन की रूप लगायें।

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रोपाई में सावधानी बरतें

रोपणी से पौध इस प्रकार उखाड़े उनके साथ बीज मिट्टी और जड़े बिना धक्का के ज्यों का ज्यों बहार आ जाए तथा इन्हे उखाड़ने के तुरंत बाद मुख्य खेत में इस प्रकार रोपित करें की उनकी जड़े गहराई में न जाएं। ऐसा करने से पौधे जल्दी लग जाते है तथा उनमे वृद्धि शुरू हो जाती है। इस तरह रोपित पौधों के उखाड़ने और लगाने में झटके नहीं लगते है

 

रोपाई में पौधों की दूरी अधिक रखें

पौधों की रोपाई वर्गाकार (25X25 से.मी.) पद्धति से करें तथा एक थाले में सिर्फ एक पौध ही लगाएं। अधिक उपजाऊ जमीन में रोपाई अधिक दुरी (30X30से.मी.) पर करें।

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जल प्रबंधन

खेत में नमी रखें किन्तु पानी भरा हुआ न रखे। प्रत्येक 2 मीटर के अंतराल से जल निकास हेतु लगभग एक फुट गहरी नाली बनाएं। खेत को हर 10-12 दिनों के अंतराल पर 2-3 दिन सूखा रखे जिससे पौधों की जड़ो एवं कंसो का अधिक विकास हो सके।

पोषक तत्व ( उर्वरक एवं खाद ) प्रबंधन

  1. भूमि परीक्षण के अनुसार पोषक तत्व प्रदान करें।
  2. कार्बनिक खादों का उपयोग अत्यंत लाभप्रद है। उपलब्धता के अनुसार कार्बनिक कधों का उपयोग शुरू के वर्षों में 10-12 टन/हेक्ट तक करें। बाद में प्रति वर्ष इसकी मात्रा घटाते जाये, कार्बनिक खादों से पौधों की वृद्धि में सहायक सूक्ष्म जीवांशों की संख्या बढ़ती है।
  3. कार्बनिक खादों की कमी होने पर उर्वरकों का उपयोग 120 किलो नत्रजन + 60 किलो स्फुर + 40 किलो पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से करें। स्फुर एवं पोटाश उर्वरकों को रोपाई के तुरंत पहले डाले।

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खरपतवार नियंत्रण

खेत में पानी भरा नहीं होने से खरपतवार अधिक बढ़ सकते है। इस लिए रोपाई के 10 दिन बाद ताइचुंग गुरमा चला कर खरपतवार नष्ट करें। इस यंत्र से खरपतवार नियंत्रण हर 10 दिन के अंतराल पर लगभग 40 दिनों तक करें।गुरमा पौधे के चारों ओर चलाए जा सकते है क्योंकि रोपाई वर्गाकार दशा में की जाती है, गुरमा चलने से जड़ों में वायु संचार बढ़ता है। उगे हुए खरपतवार सड़कर कार्बनिक पदार्थ प्रदान करते है तथा भूमि जल धारण की क्षमता बढ़ती है।

पौध संरक्षण उपाय

इस पद्धति में कीड़ों एवं बीमारियों का प्रकोप कम होता है। जैविक पद्धति से पौध सरंक्षण करें। विशेष जरुरत पड़ने पर रासायनिक विधि से भी पौध सरंक्षण करें।

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खेत का चुनाव

उचित जल निकास एवं समतल भूमि धान की खेती के लिए उपयुक्त है।

खेत की तैयारी

खेत की अच्छी तरह से जुताई करें तथा प्रचलित विधि से हल्का मचौआ करें। खेत में कही भी पानी भरा हुआ न रहे।

रोपाई के दौरान ध्यान रखी जाने वाली सावधानियां

  1. रोपाई हेतु खेत को अच्छी तरह से जुताई करनी चाहिए एवं समुचित मात्रा में गोबर की खाद मिलावें।
  2. अच्छी तरह से जूते हुए खेत में मचाई करने के बाद में पाटा चलाकर खेत को समतल कर देना चाहिए।
  3. रोपाई पूर्व खेत मचने के पश्चात, खेत से पानी निकल देना चाहिए।
  4. रोपाई के लिए 14-14 दिन की पौध का उपयोग करना चाहिए।
  5. रूप सावधानी से उखड़े जिससे पौधे की जड़े टूटने न पाए एवं उनमे धान का दाना भी लगा हो।
  6. रोपणी से उतने ही पौधे उखड़े जिनकी रोपाई आधे घंटे में हो सके। यह क्रम रोपाई पूर्ण होने तक जारी रहना चाहिए। एक ही स्थान पर एक ही पौधा २ से.मि. की गहराई पर सीधा लगावें।

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