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धनिया की उन्नत खेती और उत्पादन तकनीक

धनिया की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

धनिया(Coriander) मसाले की महत्वपूर्ण फसल है। धनिया का प्रयोग मसाले के साथ-साथ सुगंध के रूप में सब्जियों आदि में हरी पत्तियों का प्रयोग जाता है। इसकी खेती पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, बिहार, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कनार्टक तथा उत्तरप्रदेश में अधिक की जाती है।

धनिया की उन्नत खेती

लगभग 3 लाख टन के औसत वार्षिक उत्पादन के साथ भारत विश्व में धनिया का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक है। इसके उत्पादन में वर्ष दर वर्ष व्यापक उतार चढ़ाव रहता है। गत दशक में इसमें 2 लाख टन से लेकर 4 लाख टन ऊपर तक का परिवर्तन आया है।

मिट्टी एवं जलवायु

धनिया के लिए दोमट, मटियार या कछारी भूमि जिसमें पर्याप्त मात्रा में जीवांश और अच्छी जल धारण की क्षमता हो, उपयुक्त होती है। भूमि में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। इस फसल को शुष्क ठण्डे मौसम की आवश्यकता होती है।

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धनिया की उन्नत किस्में

धनिया की उन्नत खेती

निम्नलिखित धनिया की उन्नत किस्में है – पंत धनिया -1, मोरोक्कन, सिम्पो एस 33, गुजरात धनिया -1,  गुजरात धनिया -2, ग्वालियर न.-5365, जवाहर धनिया -1, सी. एस.-6, आर.सी.आर.-4, यु. डी.-20,436, पंत हरीतिमा, सिंधु आदि है।

भूमि की तैयारी

अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए अच्छे तरीके से बुवाई पूर्व पलेवा लगाकर भूमि की तैयारी करनी चाहिए। जुताई से पहले 5-10 टन प्रति हेक्टेयर पक्की हुई गोबर की खाद मिलाएं। धनिया की सिंचित फसल के लिए 5-5 मीटर की क्यारिया बना ले। जिससे पानी देने में एवं निराई-गुड़ाई आदि कार्य करने में आसानी हो।

धनिया की फसल बोने का समय

सामान्यतः धनिया की फसल के लिए 15 अक्टुंबर से 15 नवंबर तक बुवाई का उचित समय रहता है। बुवाई के समय अधिक तापमान रहने पर अंकुरण कम हो सकता है। अधिक उपज पाने के लिए 1 अक्टुंबर से 15 अक्टुंबर तक बीज बोना चाहिए। बुवाई का निर्णय तापमान देख कर ले। क्षेत्रों में पला अधिक पड़ता है वहां धनिया की बुवाई ऐसे समय में न करे, जिस समय फसल को अधिक नुकसान हो।

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बीज की मात्रा

अच्छे उत्पादन के लिए धनिया का 15 से 20 किग्रा./हे. बीज पर्याप्त होता है।

बीज उपचार

बीज उपचार के लिए 2 ग्राम कार्बेंडाजिम पर किग्रा बीज की दर से उपचारित करे। बुवाई से पूर्व दाने को  दो भागों में फोड़ दे। ऐसा करते समय ध्यान दे अंकुरण भाग नष्ट न होने पाए तथा अच्छे अंकुरण के लिए बीज को 12 से 24 घंटे पानी में भिगो कर हल्का सूखने पर बीज उपचार करके बोए।

बुवाई की विधि

25 से 30 से.मी. कतार से कतार को दुरी और 5 से 10 से.मी. पौधों से पौधे की दुरी रखना चाहिए। असिंचित फसल से बीजों को 6 से 7 से.मी. गहरा बोना चाहिए तथा सिंचित फसल में बीजों को 1.5 से 2 से.मी. गहराई पर बोना चाहिए क्योंकि ज्यादा गहरा बोने से सिंचाई करने पर बीज पर मोटी परत जम जाती हैं। जिससे बीजों का अंकुरण ठीक से नहीं हो पाता हैं।

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खाद एवं उर्वरक

अच्छी फसल के लिए खाद एवं उर्वरकों की सही संतुलित मात्रा अच्छी उपज प्रदान करती हैं। जहां तक संभव हो मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों की मात्रा को सुनिश्चित करना उचित रहता हैं। वैसे फसल के लिए अच्छी पकी गोबर की खाद 15-20 टन प्रति हेक्टेयर बुवाई पूर्व खेत में भली प्रकार मिलाये।

बीज उपचार के बाद एजेक्टोबेक्टर तथा फास्फेट सोल्युबलाइजिंग (पी.एस.बी.) बैक्टीरिया से उपचारित करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों के लिए सामान्यतः नत्रजन,फास्फोरस एवं पोटाश क्रमशः 60:40:30 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। इसमें नत्रजन की  की 1/3 मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा खेत की अंतिम तैयारी के समय बुवाई पूर्व देना चाहिए तथा शेष 2/3 नत्रजन को दो बराबर भाग में बाटकर प्रथम सिंचाई के समय एवं शेष द्वितीय मात्रा फूल आते समय खड़ी फसल में यूरिया द्वारा देना लाभप्रद हैं। असिंचित क्षेत्रों के लिए नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश क्रमशः 60:40:30 की.ग्रा./हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय भूमि में देना चाहिये।

निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण

धनिये में प्रारम्भिक बढ़वार बहुधा धीमी गति से होती हैं इसलिए नराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को निकलना चाहिए वर्ण फसल की बढ़वार रुक जाती हैं। सामान्यतः धनिये में दो निराई-गुड़ाई पर्याप्त होती है। प्रथम निराई-गुड़ाई के 30-35 दिन पर अवश्य कर देना चाहिए। साथ ही इसी दौरान पौधे से पौधे की दुरी विरलीकरण द्वारा 5-10 से.मी. कर देना चाहिए।

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दूसरी निराई-गुड़ाई 60 दिन बाद करें। इससे पौधों में बढ़वार अच्छी होने के साथ-साथ बचे हुए खरपतवार भी नष्ट हो जाते हैं एवं उपज पर अच्छा प्रभाव पड़ता हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथालीन 1लिटर/हैक. 600 लीटर पानी में मिलाकर अंकुरण पूर्व छिड़काव करें पर ध्यान रखें की छिड़काव के समय भूमि में पर्याप्त नमी होनी चाहिए तथा छिड़काव शाम के समय करें तो उचित रहता हैं।

सिंचाई

फसल की आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। सिंचित क्षेत्र के लिए सामान्यतः पलेवा के अतिरिक्त २-३ सिंचाई की आवश्यकता होती हैं। वैसे सिंचाई की संख्या बुवाई के समय, भूम का प्रकार एवं स्थानीय मौसम के ऊपर निर्भर होने के आधार पर सिंचाई संख्या कम एवं ज्यादा भी हो सकती हैं सिंचाई धनिये की क्रांतिक अवस्था जैसे बीज अंकुरण के समय (30-35दिन), शाखाएं निकलते समय (60-70दिन), फूल आने के समय (80-90 दिन) तथा पुष्ट होने की अवस्था में (100-105 दिन) में सिंचाई करना लाभकारी रहता हैं।

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

उकठा (म्लानि) रोग

इस रोग से प्रभावित होने पर पौधे का शीर्ष भाग मुरझाकर सूखने के साथ साथ पौधा भी सूखने लगता है एवं बाद में पौधा मर जाता है। जड़ो का रंग भूरा हो जाता है। यह रोग पौधे की किसी भी अवस्था में हो सकता है। लेकिन इसका प्रकोप पौधे की छोटी अवस्था में अधिक होता है।

नियंत्रण
  1. ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करें।
  2. फसल चक्र अपनाये सम्भव हो सके तो 2-3 वर्ष तक उसमे धनिया नहीं बोए।
  3. रोग रोधी किस्मों का चयन करें।
  4. स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज ही बोए।
  5. बीजोपचार 1.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम + 1.5 ग्राम थाइरम (1:1) किग्रा. बीज की दर से बुवाई पूर्व उपचारित कर बोए।

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चूर्णी फफूंदी रोग

यह रोग एरिसाइफी पोली गोनाई नामक फफूंद से फैलता है। यह रोग फरवरी एवं मार्च महीने में अधिक नुकसान पहुंचाता है। इस रोग में पौधे की पतियों एवं तनो पर सफेद चूर्ण जैसे धब्बे दिखाई देते है जो बाद में सफेद पाउडर में बदला जाते है। यह फसल की उपज पर प्रभाव डालता है।

नियंत्रण

गंधक चूर्ण 20-25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकें या फिर घुलनशील गंधक चूर्ण 2 ग्राम या डायनोकेप 48% ई.सी. 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। या केलिक्जिन 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। आवश्यकता होने पर 15 दिन के अंतराल पुनः छिड़काव करें।

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झुलसा रोग

इस रोग के प्रभाव से पौधे की पत्तियों और तनों पर गहरे भूरे रंग के या फिर झुलसने की तरह के धब्बे बन जाते है और पौधा नष्ट हो जाता है।

नियंत्रण

मेंकोजेब 2 ग्राम या ट्रायडिमेफोन 1 ग्राम दवा/लीटर पानी की दर से या सीस्थेन 400 मि.ग्रा./लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। आवश्यक हो तो दूसरा छिड़काव दोहराए।

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स्टेम गाल (तनापिटिका रोग)

रोग ग्रसित पौधों में पतियों में व तनों में फफोले के आकार बन जाते है तथा बीजों का आकर भी बदलकर लॉन्ग की तरह हो जाता है। इसलिए इसे लोंगिया रोग भी कहते है। नमी की उपस्थिति में यह रोग ज्यादा फैलता है।

नियंत्रण

  1. ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करें।
  2. फसल चक्र अपनाये सम्भव हो सके तो 2-3 वर्ष तक उसमे धनिया नहीं बोए।
  3. रोग रोधी किस्मों का चयन करें।
  4. स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज ही बोए।
  5. बीज उपचार के साथ-साथ केलिक्जिन 1% का घोल बनाकर बुवाई के 30-45 दिन पश्चात छिड़काव करने पर रोग की तीव्रता को रोका जा सकता है।

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प्रमुख रोग एवं कीट नियंत्रण

कटवर्म या वायर वर्म

भूरी सुंडी वाला यह कीट पौधों को शाम के वक्त भूमि की सतह से काट देता हैं। जबकि वायर वर्म भूमि में रहकर जड़ों को नुकसान पहुंचाता हैं।

नियंत्रण

बुवाई पूर्व एण्डोसल्फान चूर्ण 4% 20-25 की.ग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में बुवाई पूर्व भली-भांति मिलावें या क्लोरपायरीफास 1.3 प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई पूर्व भूमि में छिड़ककर मिलावें फिर बुवाई करें।

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मोयला (माहू)

फूल आने के समय सामान्यतः इस कीट का प्रकोप होता हैं। यह कीट पौधों के कोमल भागों से रस चूसकर पौधें को नष्ट कर देते हैं। इस कीट का प्रकोप देरी से बुवाई करने पर फरवरी माह में फूल अवस्था पर अधिक होता हैं। इस कीट द्वारा रस चूसने से फसल पिली पड़ जाती हैं तथा तने सिकुड़े हुए हो जाते हैं। जिससे फसल का बाजार भाव कम मिलता हैं एवं देखने में आकर्षक नहीं रहते हैं।

नियंत्रण

इस कीट के नियंत्रण के लिए ऐसे रसायन का प्रयोग करना चाहिए जिससे मधुमक्खियों को हानि न हो। प्रभावित फसल पर इमिडाक्लोप्रिड या डाइमेथोएट 30 ई.सी. 1मी.ली. दवा प्रति लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करने से कीट का प्रभावी नियंत्रण हो जाता हैं एवं फसल सुरक्षित हो जाती हैं।

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फसल सुरक्षा संबंधी सुझाव

धनिये की फसल प्रजातियों के अनुसार लगभग 120-140 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। फसल पकने की अवस्था में दानों का रंग हल्का पीलापन लेने लगता हैं। यही वः अवस्था हैं जब फसल की कटाई शुरू करें। देर से काटने पर मसलें की दृष्टि से दाना खराब होने लगता हैं।

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पीलापन शुरू होते ही कटाई शुरू करें तथा खेत में ढेरियों को उल्टा रखें अर्थात बीज निचे की और तथा जड़ें ऊपर की और ताकि धुप में दानों का रंग खराब न हो। संभव हो सके तो छायादार स्थान पर सुखाएं जब दानों में नमी 10% तक हो तब भंडारण करें अन्यथा बोरो में भरते समय अधिक नमी की वजह से दानें खराब हो सकते हैं। अगर हरी पत्तियों के लिए धनिये की फसल ली जा रही हैं तो पत्तियों की तुड़ाई सावधानीपूर्वक करना चाहिए जिससे तना सुरक्षित रहें तथा पत्तियों की तुड़ाई केवल दो ही बार करें तो उचित रहेगा।

उपज

धनिया की किस्मानुसार उपज अलग अलग होती हैं। वैसे सिंचित क्षेत्रों से 12-20 क्विंटल एवं असिंचित क्षेत्रों में 6-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती हैं। हरी पत्तियों से 125-140 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती हैं तथा बाद में 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बीज प्राप्त होते हैं।

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