agriculture फसल

देशी गुलाब की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

देशी गुलाब की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक
Written by bheru lal gaderi

व्यापारिक दृष्टि से देशी गुलाब महत्वपूर्ण पौधा है। इससे आय का मुख्य स्रोत इत्र,गुलकंद, गुलाब जल और कटे फूल से संबंधित उद्योग काफी फल फूल रहे हैं। गुलाब की मुख्य चार सुगंधित प्रजातियां हैं। जोकि तेल निर्माण के उद्देश्य लगाई जाती है। ये प्रजातियां है रोजा सेंटीफोलिया, रोजा मास्केटा, रोजा बोरबेनियाना और रोजा डैमस्क।

देशी गुलाब की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

Image Credit- pixdaus.com

इनमें से भारत में सबसे ज्यादा मस्त लगाई जाती है तथा अजमेर क्षेत्र में रोजा सेंटीफोलिया गुलाब लगाया जाता है।

भूमि 

देशी गुलाब के लिए बलुई दोमट से लेकर चिकनी दोमट भूमि जिसका PH मान 6- 8.5 हो उपयुक्त होता है। भूमि में जल का निकास अच्छा होना चाहिए।

जलवायु

फूलों की अच्छी मात्रा के लिए प्रचुर मात्रा में धुप एवं आद्रता वाली जलवायु उपयुक्त होती है।

Read also:- नर्सरी में मौसमी फूलों के पौधे तैयार करने की उन्नत…

देशी गुलाब की किस्में

चैती गुलाब, नूरजहां, ज्वाला, हिमरोज, गंगानगर रेड।

भूमि की तैयारी

भूमि की अच्छी तरह से जुताई करके पाटा लगाना अति आवश्यक है।

नर्सरी लगाना

देशी गुलाब की खेती के लिए एक वर्ष पुरानी टहनियों से 20-25 सेंटीमीटर लंबे व 1-1.5 सेमी टुकड़े कटाई छंटाई समय लेते हैं। हर एक कटिंग या टुकड़े में तीन-चार आँख होनी  चाहिए। इन्हे नर्सरी के 2035 मीटर क्षेत्रफल में उत्तर की तरफ तिरछा लगाया जाता है। इस तरह एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 10000 कलमे 1 मीटर 3 1 मीटर दुरी पर लगाई जाती है।

ये पौधे नर्सरी में कलम में जड़ निकालने के लिए जमीन में दबाने से पहले आईबीए 200 पीपीएम नामक रसायन से उपचारित करें। इस दौरान नर्सरी की उचित देखभाल करनी चाहिए।

Read also:- मक्का (स्वीट कॉर्न एवं बेबी कॉर्न) की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

पौधारोपण

तैयार खेत में 50x50x50 सेमी के गढ्ढे खोद ले। इन गढढों की लाइन से लाइन दूरी 1.5 मीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 1 मीटर रखनी चाहिए प्रत्येक गढ्ढे में 5 किलोग्राम गोबर की खाद, 150 ग्राम सुपर फास्फेट, 50 ग्राम जिंक, 100 ग्राम पोटाश की मात्रा दें। इसके अतिरिक्त दीमक उपचार नियंत्रण हेतु 4% एंडोसल्फान चूर्ण 50 ग्राम प्रति खड्डा देवे। पौधे लगाने का उपयुक्त समय अक्टूबर से दिसंबर का होता है। रोपण के तुरंत बाद सिंचाई करना अति आवश्यक है।

खाद एवं उर्वरक

देशी गुलाब के फूल का उत्पादन बढ़ाने हेतु 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद प्रतिवर्ष देनी चाहिए। इसके उपरांत 200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अक्टूबर माह जनवरी में दो भागों में बांट कर दें। यदि सूक्ष्म तत्वों की आवश्यकता हो तो अवश्य देना चाहिए।

जब कलियां बनना आरंभ हो जाए तो इसमें यूरिया 25 ग्राम, 25 ग्राम अमोनियम सल्फेट, 220 पोटेशियम सल्फेट के मिश्रण की 25 ग्राम मात्रा को 10 से 12 लीटर पानी में घोलकर 10 से 15 दिन के अंतराल पर दो तीन बार छिड़काव कर सकते हैं। इसमें सूक्ष्म तत्वों का भी प्रयोग किया जा सकता है इसमें खास तौर पर मेगनीज, आयरन, बोरेक्स तथा जिंक सल्फेट अवश्य हो।

सिंचाई

साधारणतया पूरे वर्ष में 12 सिंचाई की आवश्यकता होती हैं। चेती तथा गंगानगर रेड गुलाब में पौधों की कटाई-छटाई से जून माह में अंत तक हर 15 दिन के अंतर पर सिंचाई की जानी चाहिए।

Read also:-ज्वार की उन्नत खेती एवं अधिक उत्पादन तकनीक

कटाई-छटाई

पौधों की कटाई छटाई रोपाई के 2 वर्षों बाद की जाती है। इसका उपयुक्त समय दिसंबर मध्य से जनवरी मध्य तक माना-जाता है। भूमि से 50 सेंटीमीटर ऊंचाई पर इसको काटा जाता है। कटाई छटाई के 70 से 90 दिन बाद फूल आने शुरू हो जाते हैं।

निराई- गुड़ाई

कटाई- छंटाई के बाद दिसंबर से फरवरी तक दो तीन बार गुड़ाई करने से फूलने वाली शाखाएं अधिक मिलती हैं तथा पौधे उचित आकार लेते हैं। इइसे कलिका अधिक तथा स्वस्थ बनती है। इसके अतिरिक्त गुलाब की फसल को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए। वर्ष में चार से पांच बार निराई करनी चाहिए।

काइनेटीन का प्रयोग

काइनेटीन नामक रसायन का 20 मिली 20 पीपीएल कि दर से कटाई- छटाई के 30 दिन बाद पहला छिड़काव तथा दूसरा कली बनते समय पहले छिड़काव के 15 दिन बाद और तीसरा छिड़काव दूसरे छिड़काव के 15 दिन बाद कली बनने के बाद करना लाभप्रद होता है। इससे फूलों के उत्पादन के साथ-साथ कली को फूलने से पहले गिरने से भी रोका जा सकता है।

उपज

उचित तरीके से गुलाब की खेती करने पर दो- तीन टन प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है। इसमें तेल की मात्रा 0.03 से 0.045% तक होता है। एक बार पौधा लगाने के बाद इसके उपज 10 से 12 साल तक मिलती है।

Read also:- ग्वार की उन्नत खेती एवं उन्नत किस्में व उत्पादन तकनीक

पौध संरक्षण

शल्क कीट स्केल

ये कीट एवं टहनियों एवं तने पर भारी मात्रा में चिपके हुए रहते हैं। कीट ग्रसित पौधों पर अवयस्क शल्क पाए जाते हैं। इस कीट के प्रकोप से पौधा कमजोर पड़ जाता है और अधिक प्रकोप की अवस्था में सूख जाता है।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु पौधों का कृतंन कर रोगग्रस्त भाग को इकट्ठा करके नष्ट कर दे। मोनोक्रोटोफॉस 38 एसएल 1.5 मिलीलीटर या डाइजिनोन या मिथाइल डिमेटोन 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

मोयला

यह कीट पत्तियों, कली एवं कोमल का रस चूसते हैं। फलस्वरुप पौधे की बढ़वार रुक जाती है और पौधों की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस किट का प्रकोप नवंबर से अप्रैल तक अधिक रहता है।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु मेलाथियान 50 ईसी. अथवा डाइमिथोएट 30 ईसी. 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से नीम के तेल का छिड़काव करें।

Read also:- ड्रिप सिंचाई प्रणाली से कम लागत में अधिक उत्पादन

परजीवी

यह कीट फूलों की पंखुड़ियों से रस चूसते हैं। इसमें पंखुड़ियां मूड जाती हैं। फुल का आकार बिगड़ जाता है। पत्तियों पर सफेद धब्बे दिखाई देते हैं। पौधा कमजोर पड़ जाता है।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु मेलाथियान 50 ईसी. अथवा डाइमिथोएट 30 ईसी. 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़के।

तना छेदक मक्खी

यह हरे रंग की छोटी मक्खी है। कटे हुए शिरों में छेद करके अंदर घुस जाती है तथा पूरी टहनी सूख जाती है।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु मेलाथियान 50 ईसी. अथवा डाइमिथोएट 30 ईसी. एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

थ्रिप्स

यह कीट पत्तों व पंखुड़ियों से रस चूस लेते हैं। इसके कारण पत्तियां मुरझा जाती है तथा इसमें धारिया पड़ जाती है।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु मिथाइल ऑक्सी डेमेटोन या डाइमिथोएट या ऐसीफैट या इमिडाक्लोप्रिड 5 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी की दर से 3 बार 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

स्पाइडर माइट

यह कीट पूर्ण विकसित पत्तियों के नीचे की ओर सफेद रेशमी जाले में रहते हैं। गर्म तथा सूखा वातावरण इसके लिए उपयुक्त है।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु क्षतिग्रस्त भाग को काट कर जला दें। तथा पौधों पर माईट्रैक या इथीयॉन 5 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी के घोल कर दो से 3 बार 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

Read also:- कपास की फसल में पोषक तत्वों का प्रबंधन कैसे करें

प्रमुख व्याधिया

छाछ्या (पाउडरी मिल्ड्यू)

इस रोग के आक्रमण से पर सफेद धब्बे दिखाई देते हैं या अधिक रोगग्रसित पत्तियां पीली पड़ जाती है।

नियंत्रण

नियंत्रण हेतु केराथेन एल सी 1 मिलीलीटर या केलेक्सीन 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करें।

एन्थ्रेक्नोज

इस रोग के प्रकोप से पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और रोगग्रसित भाग मुरझाकर सूखने लगते हैं।

नियंत्रण

नियंत्रण हेतु मेंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करें।

डाइबेक

काट-छाट के पश्चात यह रोग टहनियों में लग जाता है। टहनिया ऊपर से नीचे की ओर सूखने लग जाती है तथा पौधा सूख कर मर जाता है।

नियंत्रण

नियंत्रण हेतु के भाग को काट-छाट कर हटा दें तथा इसमें बोर्डो मिक्सर या गुलाब पेंट कॉपर कार्बोनेट+रेड+लेड+अलसी का तेल 4:4:5 के अनुपात में कटी टहनियों के सिरे पर लगा दे।

Read also – तिल की उन्नत खेती एवं उत्पादन की उन्नत तकनीक

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.