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दीमक – सर्वभक्षी नाशीकीट एवं इसकी रोकथाम

दीमक - सर्वभक्षी नाशीकीट एवं इसकी रोकथाम
Written by bheru lal gaderi

दीमक एक सर्वभक्षी, सर्वव्यापी एवं सामाजिक नाशीकीट है जिसको सामान्यतः सफेद चींटी, दीव एवं उदई आदि नामों से भी जाना जाता है। दीमक देखने में तो चीटियों जैसी लगती है परंतु यह चीटियों से संबंधित नहीं है। चीटियों, मधुमक्खियों एवं भंवरों के परिवार से संबंधित है जबकि दीमक कॉकरोच के निकट संबंधी है। दीमक जमीन के ऊपर एवं नीचे दोनों जगह पर पाई जाती है। दीमक वैसे तो सेल्यूलोज वाली सभी हरी एवं सुखी वनस्पति को खाती है, परंतु मुगफली, गन्ना, आम, जौ, कपास, बैंगन, मिर्च, आम, अनार एवं अमरुद आदि को अत्यधिक नुकसान पहुंचाती है।

दीमक - सर्वभक्षी नाशीकीट एवं इसकी रोकथाम

Image Credit-होम डेकोर – Lifeberrys.com

सामाजिक कीट होने के कारण इन में श्रमिक, सैनिक, पंखधारी नर एवं मादा, राजा, रानी एवं संपूरक प्रजनन आदि प्रकार की बहुरूपता पाई जाती है जो कि सभी मिलकर एक कॉलोनी बनाते हैं तथा जिसमें सभी का अपना अलग-अलग कार्य निश्चित होता है।

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कॉलोनियां

श्रमिक                                       

यह आकार में सैनिकों से छोटे होते हैं परंतु इनकी संख्या कॉलोनी में सबसे अधिक होती है। यह अविकसित जननांग वाले नर एवं मादा कीट होते हैं जो कॉलोनी के सभी सदस्यों के लिए भोजन जुटाने व वितरण करने के साथ साथ प्रजनन एवं रक्षा के अलावा अन्य सभी कार्य करते हैं।

सैनिक

यह आकार में श्रमिकों से बड़े होते हैं जिनके बड़े एवं मजबूत जबड़े पाए जाते हैं। उनका मुख्य कार्य कॉलोनी के सभी सदस्यों की रक्षा करना होता है। सैनिक भी श्रमिकों की तरह पंखहीन एवं अविकसित जननांग वाले नर-मादा कीट होते हैं।

पंखधारी नर एवं मादा

यह 2 जोड़ी पारदर्शक पंख वाले कीट मानसून की वर्षा आरंभ होते ही पैदा होने लगते हैं। यह मेंथुन के लिए प्रकाश की ओर आकर्षित होकर मेंथुन उड़ान भरते हैं तथा मेंथुन उपरांत उनके पंख गिर जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक नर-मादा का जोड़ा बाद में राजा-रानी में परिवर्तित होकर नया परिवार बनाते हैं।

राजा

मैथुनोपरांत मादा के साथ रहने वाला नर, राजा कहलाता है जो आकार में रानी से छोटा होता है। यह कॉलोनी में एक ही राजा होता है जो रानी के साथ शाही कक्षा में ही रहता है तथा इसका कार्य समय-समय पर रानी के साथ मैथुन करना ही होता है।

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रानी

दीमक - सर्वभक्षी नाशीकीट एवं इसकी रोकथाम

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यह आकार में कॉलोनी के अन्य सभी सदस्यों से बड़ी होती है तथा अंडों से पेट बड़ा होने के कारण मोटी दिखाई देती है। इसलिए यह ज्यादा चल नहीं सकती है और जमीन के अंदर 0.5 मीटर की गहराई में बनी कॉलोनी के बीच में बने शाही कक्ष में ही रहती है। इसका मुख्य कार्य अंडा देकर वंश वृद्धि करना ही होता है। एक रानी  24 घंटे में 70 से 80 हजार अंडे देती है। एक कॉलोनी में एक ही रानी रहती है और सामान्यतः 5-10 वर्ष तक जीवित रहती है।

संपूरक प्रजनक

पंखहीन नर एवं मादा दोनों ही प्रकार के होते हैं जो पंखयुक्त नर एवं मादा की अनुपस्थिति में परिवार की सदस्य संख्या कायम रखते हैं। यह कॉलोनी में इनकी संख्या सैकड़ों तक हो सकती है।

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नुकसान एवं पहचान

सिंचित दशा में यह अधिक सक्रिय नहीं होती है परंतु असिंचित क्षेत्र में यह सर्वाधिक नुकसान पहुंचाती है। जमीन के अंदर घर बनाकर रहने के कारण पौधों के उगने के साथ ही इनका आक्रमण शुरू हो जाता है। यह छोटे एवं कोमल पौधों को जमीन की सतह के नीचे से काट कर सूखा देती है। यह रात्रि चल होने के कारण दिन में घरों में छिपी रहती हैं तथा रात्रि के समय में बाहर निकलकर पौधों को नुकसान पहुंचाती है। इसके प्रकोप से ग्रसित वस्तुएं और नियमित रूप से कटी हुई एवम उन पर मिट्टी चिपकी रहती है तथा फलों के तनों एवं टहनियों पर मिट्टी की सुरंगे बना देती है। इन सुरंगो को हटाने के लिए दीमक भागती हुई दिखाई देती है।

यह खेतों, बगीचों, घरों एवं गोदामों में पूरे वर्ष सक्रिय रहती हैं। दीमक कच्चे गोबर को खाना बहुत पसंद करती हैं। इसलिए यह गड्ढे में भी आक्रमण कर देती हैं, जिससे खाद की गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है।

दीमक की रोकथाम के उपाय

  1. फसल की कटाई के बाद बचे हुए फसल अवशेषों, घास एवं अन्य कचरे को इकट्ठा करके जला देना चाहिए। क्योंकि दीमक इन्हें खाकर जिंदा रहते हैं।
  2. फसल कटाई के बाद दो या तीन बार गहरी जुताई करनी चाहिए।
  3. फसलों को समय-समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए क्योंकि सूखे की स्थिति में दीमक के प्रकोप की संभावना बढ़ जाती है।
  4. अच्छी पाकी हुई गोबर की खाद ही खेत में डालनी चाहिए। खाद में  दीमक लगी हो तो मिथाइल पैराथियान 2.0 प्रतिशत चूर्ण खाद में मिला देना चाहिए। नीम की खली का प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि इसकी गंध से दीमक दूर भाग जाती है।
  5. दीमक से प्रभावित खेत में बुवाई से पहले 1.5% को 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से अन्तिम जुताई के समय  में मिला देना चाहिए।
  6. बीजों को उपचार करके ही होना चाहिए। बीज उपचार के लिए 450 मि.ली. क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. दवा 5.0 लीटर पानी में घोल बनाकर 100 की.ग्रा. बीज पर समान रूप से छिड़काव करें। इसके बाद बीच को छाया में सुखाकर तुरंत बुवाई करें।
  7. खड़ी फसल में दीमक की रोकथाम के लिए 4.0 लीटर क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. प्रति हेक्टेयर कि दर  से सिंचाई के साथ दे।
  8. फलवृक्षों के तने के पास जमीन में 25-50 ग्राम क्यूनालफॉस 25-50 प्रतिशत चूर्ण मिला देना चाहिए या तरल क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी से पानी में मिलाकर देना चाहिए।

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प्रस्तुति

डॉ.एच. पी. मेघवाल, डॉ.एच.आर. चौधरी एवं एम.पि.यादव,

कृषि विज्ञान केंद्र नौगांव (अलवर)

कृषि अनुसंधान केंद्र कोटा (राज.)

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