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दीपावली पर विभिन्न पूजाएं एवं लक्ष्मी के विभिन्न रूप

दीपावली पर विभिन्न पूजाएं
Written by bheru lal gaderi

लक्ष्मी के विभिन्न रूप एवं दीपावली पर विभिन्न पूजाएं

ॐ या देवी सर्वभूतेषु, धान्य लक्ष्मी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्ये-नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः।

दुनिया के हर देश में समृद्धि व धनधान्य की कामना करने वाले रीती-रिवाज और उत्स्व आदिम काल से मनाए जा रहें हैं, लेकिन दीपावली भारत का अपना अद्वितीय पर्व हैं, जो साल का सबसे बड़ा उत्सव होता हैं। धन की देवी की पूजा इतने विराट पैमाने पर की कही और देखने को नहीं मिलती।

दीपावली पर विभिन्न पूजाएं

इसलिए दीपावली मुख्यतः समाज के उन वर्गो का त्यौहार हैं, जिनका सीधा रिश्ता धनधान्य की वृद्धि से हैं। यह खासतोर पर किसानों और व्यापारियों का त्यौहार हैं और भारत की अर्थव्यवस्था साल भर में सबसे ज्यादा तेजी इसी वक्त होती हैं, क्योंकि इस वक्त नई फसल बाजार में आती हैं और परम्परागत रूप से भारतीय परिवार बड़े पैमाने पर खरीददारी इसी वक्त करते हैं।

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लक्ष्मी केवल धन की देवी ही नहीं भूदेवी भी हैं:

धन की देवी के रूप में पूजनीय लक्ष्मी देवी भूदेवी का रूप भी हैं जो कालांतर में प्रकाश की देवी बनकर दीपावली पर्व पर हर घर में अधिष्ठित हुई। ऋग्देव के श्रीसूक्त में लक्ष्मी के 70 नाम दिए गए हैं और अग्नि से उनका आव्हान किया गया हैं। इस प्राचीनतम प्रार्थनाओं से पता लगता हैं की वह धन की देवी ही नहीं भूदेवी भी हैं।

भारतीय चित्रांकन परम्परा की विभिन्न चित्र शैलियों पर शोध कार्य करने वालों ने अनेक प्राचीन ग्रंथों के हवाले से लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों के सन्दर्भ में बताया की धन की देवी लक्ष्मी हरिणी और कमला भी कहा जाता हैं। उनका संबंध बिल्व वृक्ष और बिल्व फल से दर्शाया गया हैं तथा आज भी देश के बंगाल प्रान्त के घर-घर में कोजागर पूर्णिमा में लक्ष्मी पूजा में केले के वृक्ष से लक्ष्मी जी को प्रतीक प्रतिमा बनाई जाती हैं उसमे बिल्व फल से उनके स्तन बनाने की प्रथा विद्द्यमान हैं।

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बिल्व को लक्ष्मी फल भी कहा जाता हैं। लक्ष्मी का एक नाम पुष्कारिणि भी हैं। पुष्कर का अर्थ हाथी की सूंड के अग्र भाग से हैं। इसी के आधार पर बाद के समय में गज लक्ष्मी का स्वरूप विकसित हुआ। पदम् पुराण के उत्तर खंड में श्रीसूक्त का संक्षिप्त रूप हैं। इसी प्रकार अग्नि पुराण, स्कन्द पुराण, पदम् पुराण, मत्स्य पुराण और विष्णु पुराण में भी लक्ष्मी के प्रचुर उल्लेख हैं।

लक्ष्मी के अलग-अलग रूपों में पूजा

लक्ष्मी को हम किस रूप में देखते हैं। ज्यादातर की यही धारणा होती हैं की लक्ष्मी धन की देवी हैं और इसकी पूजा करने से धन की प्राप्ति होती हैं। पर लक्ष्मी का यही मात्र स्वरूप नहीं हैं पौराणिक कथाओं में लक्ष्मी को विविध रूपों वाली माना गया है। लक्ष्मी के प्रत्येक रूप में कोई न कोई शिक्षा मिलती हैं।

दीपावली पर विभिन्न पूजाएं

हमे लक्ष्मी की पूजा केवल धन की देवी ही मानकर नहीं करना चाहिए बल्कि इसके अलग-अलग रूपों को भी समझना चाहिए। लक्ष्मी ही श्री हैं। श्री से ही हर कार्य का शुभारम्भ होता हैं। एक हाथ में कलश या अक्षय पात्र लिए हुए दूसरे हाथ में धन बरसाती हैं। लक्ष्मी की कई रूपों में पूजा स्तुति हैं।

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दीपावली के अवसर पर पांच दिन वभिन्न पूजाए होती हैं। जिसकी विस्तृत जानकारी दी जा रही हैं।

आरोग्य लक्ष्मी

धन तेरस से दीपावली की पूजाएं प्रारम्भ होती हैं। सर्वप्रथम आरोग्य लक्ष्मी को पूजा जाता हैं। आरोग्य लक्ष्मी को स्वाथ्य सहित सम्पन्न जीवन जीने की कामना से पूजा जाता हैं।

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आरोग्य लक्ष्मी

आरोग्य लक्ष्मी को समुद्र मंथन में से विष्णु के अवतार तथा आयुर्वेद के जनक धन्वंतरी के साथ निकली आरोग्य लक्ष्मी जीवन को स्वस्थ सुखी रहने का वरदान देती हैं।

सौन्दर्य लक्ष्मी

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सौन्दर्य लक्ष्मी

रूप चौदस अथवा छोटी दीपावली को सौन्दर्य लक्ष्मी की पूजा की जाती हैं। ब्रम्हा की रति दिखने में बेहद साधारण थी। अतः उसने  सौन्दर्य श्रृंगार की जानकारी दी जिन्हे धारण करते ही रति तीनों लोकों में सबसे सुन्दर युवती बन गई तथा प्रेम के देवता मन्मथ के ह्दय को जितने में सफल हुई। इस प्रकार लक्ष्मी सुंदरता का वरदान देने वाली हैं।

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गौ लक्ष्मी

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दीपावली के अवसर लक्ष्मी पूजा से पूर्व सांयकाल में गौ पूजा की जाती हैं। गाय को भारतीय समाज में माँ का दर्जा गया जाता हैं क्योंकि एक माँ की तरह ही वह भी निस्वार्थ भाव से मनुष्य के पालन के लिए ढेर सुविधाएँ जुटाती हैं, जो प्राणिमात्र की समस्त इच्छाएं पूरी करती हैं।

धान्य लक्ष्मी

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धान्य लक्ष्मी

दीपावली पर खरीफ फसल की कटाई प्रारम्भ करते हैं। नई फसल लक्ष्मी जी को भेट की जाती हैं। अनाज, रसोई घर को हमेशा भरा रखने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता हैं धान्य लक्ष्मी को। द्रोपती को हमेशा भोजन से भरा पात्र धान्य लक्ष्मी ने आशीर्वाद स्वरूप दिया था। धान्य लक्ष्मी हर वर्ग, वर्ण तथा स्तर के मनुष्य की भूख की पूर्ति करती हैं जो अन्न का सम्मान और भोजन आदर से आग्रह करते हैं।

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लक्ष्मी पूजा

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लक्ष्मी पूजा

दीपावली पर शुभ घड़ी (समय) पर लक्ष्मी पूजन किया जाता हैं। लक्ष्मी जी लाल साड़ी में लिपटी सोने के आभूषणों में दमकती कमल के पुष्प पर बिराजी हैं। आसपास खड़े सफेद हाथी उनका अभिवादन करते हैं। लक्ष्मी जी हाथ में कलश या अक्षय पात्र लिए धन बरसाती प्रतीत होती हैं। वे धन, सम्पदा, सौभाग्य सौन्दर्य और मंगल की देवी है।

अन्नपूर्णा/अन्नकूट पूजा

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अन्नपूर्णा अन्नकूट पूजा

दीपावली पर्व पर नई फसल काटने का शगुन किया जाता हैं। अतः नई फसल शुभ हो, इसलिए सर्वप्रथम देवताओं को नए अन्न एवं मिश्रण से तैयार भोग लगाया जाता हैं, जिसे अन्नकूट कहा जाता हैं। दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट पूजा का प्रावधान हैं। यह लक्ष्मी की अन्नपूर्णा स्वरूप की पूजा हैं।

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बैल पूजा

दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा को बेलों की पूजा ग्रामीण क्षेत्रों में बी धूमधाम से की जाती हैं। चूँकि हमारी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि हैं, और कृषि की रीढ़ बैल हैं।

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बैल पूजा

बैल से हल द्वारा जो खेती की जाती थी उससे हमारे खेतों की उर्वराशक्ति बराबर बनी रहती थी। बैल की पूजा के पीछे का रहस्य यही था की हमारी खेती सनातन बनी रहें। इस दिन बेलों से कोई काम नहीं किया जाता, बेलों का सज श्रृंगार किया जाता हैं रात्रि को बेलों की तथा बैल चालक की पूजा की जाती हैं और आरती उतारते हैं, अनाज-पकवान, पुवा-पापड़ी का भोग लगाते हैं। पूजा के बाद बैलों का प्रदर्शन करने हेतु ग्राम के बाजारों से आतिशबाजी करते हुए घुमाया जाता हैं।

गोवर्धन पूजा

द्वापर युग में दीपावली के दूसरे दिन ब्रजमंडल में इन्द्र की पूजा हुआ करती थी। भगवान भगवान श्री कृष्ण ने कहा की “कार्तिक में इन्द्र की पूजा कोई लाभ नहीं, इसलिए हमे गो-वंश की उन्नति के लिए पर्वत व वृक्षों की पूजा कर उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए। पर्वतों और भूमि पर घास-पौधे लगाकर वन महोत्सव भी मनाना चाहिए।

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गोवर्धन पूजा

गोबर की ईश्वर के रूप में पूजा करते हुए उसे जलाना नहीं चाहिए, बल्कि खेतों में डालकर उस पर हल चलाते हुए अन्नौषधि उत्पन्न करनी चाहिए। जिससे हमारे देश की उन्नति हो”  भगवान कृष्ण का यह उपदेश सुन ब्रजवासियों ने पर्वत, वन और गोबर की पूजा आरम्भ की तभी से समस्त उत्तर भारत में गोवर्धन पूजा प्रचलित हुई। गोवर्धन पूजा करने से खेतों में अधिक अन्न उपजता हैं, रोग दूर होते हैं और घर में सुख शान्ति रहती हैं।

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विद्या लक्ष्मी

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कार्तिक शुक्ला द्वितीय, दीपावली के तीसरे दिन विद्या लक्ष्मी के प्रतीक स्वरूप कलम-दवात की पूजा की जाती हैं। ज्ञान को धन में बदलने वाली हैं विद्या लक्ष्मी।

भैयादूज कथा

भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम संज्ञा था। उन्ही की कोख से यमराज तथ यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ी नेह करती थी। वे उन बराबर निवेदन करती की इष्ट मित्रों सहित उनके घर आकर भोजन करें। लेकिन अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालते रहते थे। कार्तिक शुक्ल का दिन आया। यमुना ने उस दिन यमराज को भोजन का निमंत्रण देकर उन्हें घर पर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया। यमराज ने सोचा में तो प्राण को हरने वाला हूँ। मुख्य कोई भी अपने घर पर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही हैं उसका पालन करना मेरा धर्म हैं।

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भैयादूज

यही सोचकर यमराज ने बहन के घर जाने का निर्णय कर लिया। यमराज को अपने घर आया यमुना की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। यमुना ने उन्हें स्नान कराकर पूजा के बाद अनेक व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किये गए आतिथेय से प्रसन्न होकर यमराज ने बहन को वर मांगने का आदेश दिया। यमुना ने कहा भद्र ! आप प्रतिवर्ष इसीदिन मेरे घर आकर भोजन करें।

मेरी तरह इस दिन जो बहन अपने भाई को आदर-सत्कार करके टिका काढ़े, से तुम्हारा भी न रहें। यहराज ने “तथास्तु” कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की रह ली। इसी दिन से कार्तिक शुक्ला द्वितीय को भाई दूज पर्व की परम्परा बनी।

दीपावली पर लक्ष्मी जी के विभिन्न रूप तथा पुजाएँ सुख समृद्धि की कामना के लिए की जाती हैं। सभी स्वरूप एवं पूजाएं नम्रता, धैर्य, मेहनत, बुद्धिमता, प्रेम-स्वभाव, शांति आदि गुणों को अपने आचरण में उतारने की सिख देती हैं। अतः लक्ष्मी प्राप्ति के लिए हमे इन गुणों को आचरण में उतारना चाहिए।

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