तिल की उन्नत खेती एवं उत्पादन की उन्नत तकनीक

By | 2017-07-16

तिल उत्पादन की उन्नत तकनीक

तिलहन उत्पादन में मूंगफली व सरसों के बाद तिल का प्रमुख महत्वपूर्ण योगदान है।  मध्यप्रदेश प्रमुख तिल उत्पादन राज्य है।  मध्यप्रदेश में तिल का क्षेत्रफल 1.72 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 0.43 लाख टन है।  प्रदेश की औसत उपज केवल 2.46 क्विंटल प्रति हेक्टेयर ही है।  मध्यप्रदेश में तिल की खेती बिना उचित आदान के अनउपजाऊ पर किसानो द्वारा की जाती है। अनुसंधान से पता चला है की उपज में वृद्धि की काफी संभावनाए है, तिल की उपलब्ध नवीनतम तकनीक से अधिकतम उत्पादन कैसे प्राप्त किया जा सकता है। जो निम्न प्रकार है-

तिल

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भूमि:-

हल्की रेतीली, दोमट मिट्टी तिल उत्पादन के लिए उपयुक्त होती है।

जुताई:-

भूमि की तराई के लिए दो जुताई हल से, एक बखरनी एवं एक पाटा लगाना आवश्यक है जिससे भूमि बुवाई के लिए तैयार हो जाती है।

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बोने की विधि:-

तिल की बुवाई कतारों में करनी चाहिए जिससे खेत में खरपतवार एवं अन्य कृषण क्रिया में आसानी होती है।इसलिए तिल की बुवाई 30 से.मी. कतार से कतार एवं 15 से.मी. पौध से पौध की दुरी एवं बीज की गहराई 2से.मी. रखी जाती है।

बोने का समय:-

मानसून आने पर या जून के प्रथम सप्ताह में अवश्य कर देनी चाहिए।

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बीज दर:-

5किलोग्राम/हेक्टेयर

उन्नत किस्में

प्रजाति

अवधि तेल (%)

उपज क्वी./हेक्टेयर

टी.के.ज़ी.-21

75-80

55

8-10

टी.के.ज़ी.-22

80-90

53

8-9.5

टी.के.ज़ी.-306

80-90

55

8-10

जे.टी.एस.-8

85-90

55

8-10

जी.टी.-1

80-90 52

10-11

जी.टी.-10

100-109

55

8-9

ओ.टी.-7

80-90

54

8-9

एन.-32

90-100

53

7-8

 

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बीज उपचार:-

थिरम दवा 3 ग्राम/की.ग्रा. बीज एजड़ो स्पाइरिलम+पी.एस.बी. कल्चर 20 ग्रा. 1 की.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करके ही बीज को बोना चाहिए।

उर्वरक की मात्रा:-

तिल में 60 की.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 की.ग्रा. फास्फोरस, 20 की.ग्रा. पोटाश देने की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति के लिए 130की.ग्रा. यूरिया, 240की.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट एवं 32 की.ग्रा. पोटाश की आवश्यकता होती है।

उर्वरक देने का समय:-

फास्फोरस, पोटाश की पूरी मात्रा व नत्रजन की आधी मात्रा बोने के समय, नत्रजन की शेष मात्रा में बुवाई के 30 दिन व 45 दिन पर देना चाहिए।

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खरपतवार प्रबंधन:-

एलाक्लोर 10% दानेदार 2की.ग्रा./हे. सक्रिय तत्व, अंकुरण पूर्व डालना चाहिये. उसके साथ टरगासुपर 1 ली. प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव कर सकते है बुवाई के 20-25 दिन पर संकरी पत्ती वाले खरपतवार के लिए कर सकते है।

बीमारी:-

  1. पोध अंगमारी:-

इस रोग के प्रभाव से पोधो पर बड़े चकते दिखाई देने लगते है, रोकथाम के लिए एक साल का फसल चक्र अपनाये बोने से पहले थाईरम से उपचार करें बीमारी देखते ही पत्तियों पर 0.25% कोपर ओक्सीक्लोराइड या 0.25% मेन्कोजेब का छिडकाव करें.

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  1. जीवाणु अंगमारी:-

पत्तियों पर जल कण जेसे छोटे बिखरे हुए धब्बे धीरे-धीरे बढ़कर भूरे हो जाते है यह बीमारी चार से छः पत्तियों की अवस्था में देखने को मिलती हें बीमारी नजर आते ही स्ट्रेप्टोसाक्लिन (500 पी.पी.एम.) पत्तियों पर छिडकाव करें इस प्रकार 15 दिन के अन्तर पर दो बार छिडकाव करें।

  1. तना और जड़ सडन:-

रोग का प्रकोप होने पर पोधे सूखने लगते है तथा तना उपर से निचे की और सड़ने लगता है इस रोग की रोकथाम के लिए बीजोपचार जरूरी है।

  1. चूर्णी फफूंद:-

जब फसल 45 से 50 दिन की हो जाती है तो पत्तियों पर सफेद चकते पड़ जाते है इससे पतियाँ गिरने लगती है इस रोग के नियंत्रण के लिए पत्तियों पर 0.2 घुलनशील सल्फर (वेत्सल्फसल्फक्स) का छिडकाव फुल आने और फली बनने के समय करें।

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तिल का पत्ती मोड़क और फली छेदक कीट:-

प्रारम्भिक अवस्था में कोमल पत्तियों को खता है तथा बाद में फुल, फली एवं दाने को खाता है इसके नियंत्रण के लिए फुल आने की अवस्था में 15 दिन के अन्तराल से मोनोक्रोटाफ़ॉस 36एस.एल. 750मी.ली. प्रति हेक्टेयर 750 लिटर पानी में घोलकर तीन बार छिडकाव करें।

तिल हाक मॉथ:-

इसकी सुंडी पत्तियों को खाकर उन्हें खराब कर देती है इसलिए किट का प्रकोप नजर आते ही 5% कार्बोरिल 20की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें।

बिहार रोमिल केटरपिलर:-

प्रारम्भिक अवस्था में इस किट के लार्वा कुछ पोधो पर इकट्ठा होकर पत्तियों को खाते है बाद में बढ़े होकर पोधों को नष्ट कर देते है इस किट के नियंत्रण के लिए क्विनाल्फोस 25 इ.सी. 1 ली. पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें।

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फसल की कतई एवं गहाई:-

पोधों की पत्तियां जब पिली पड़ने लगे जब फसल की कटाई करना अत्यंत आवश्यक है नही तो फलियों से दाने चटक कर जमीन पर गिर जाते है। कटाई करने के उपरांत कुछ दिन के लिए एक जगह रख कर सुख लिया जाना चाहिए इसके उपरांत गहाई करके स्वच्छ एवं साफ बोरो में भंडारित करना चाहिए।

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