तरबूज और खरबूज की उन्नत खेती की तकनीक

By | 2017-04-07

तरबूज और खरबूज जायद मौसम की प्रमुख फसल हैं। इसकी खेती मैदानों से लेकर नदियों के पेटे में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। ये कम समय, कम खाद और कम पानी में उगाई जा सकने वाली फसलें हैं। उगने में सरल, बाजार तक ले जाने में आसानी और अच्छे बाजार भाव से इसकी लोकप्रियता बढाती जा रही हैं इसके कच्चे फलो का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता हैं। पके हुए फल मीठे, शीतल, दस्तावर एवं प्यास को शांत करते हैं।

तरबूज और खरबूज

भूमि का चुनाव

तरबूज और खरबूज के लिए उचित जल निकासी वाली बलुई दोमट मिटटी सर्वोतम हैं। मृदा का पी. एच. मान 6 से 7 तक होना चाहिए। अधिकतर नदियों के कछार में इन फसलों की खेती की जा सकती हैं।

भूमि की तैयारी

सामान्यतः तरबूज और खरबूज को गड्डो में लगाया जाता हैं। गड्ढे बनाने पूर्व खेत में दो बार हल एवं दो बार बखर या डिस्क हेरो चलाकर भूमि को अच्छी तरह भुरभुरी बना लेना चाहिए।

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तरबूज और खरबूज की उन्नत प्रजातियां

तरबूज और खरबूज फसल की अधिक पैदावार लेने के लिए उनत जातियों को ही उगाना चाहिए।

तरबूज

सुगर बेबी

इसके फल 2-3 किलो वजन के मिठे तथा बीज छोटे व् कत्थई रंग के होते हैं।

अर्का ज्योति 

फल गोल, हरी धरी युक्त, मिठे व् 4-6 किलो वजन के होते हैं।

दुर्गापुर मीठा

फल 6-8 किलो वजनी, हराधारी युक्त होता हैं। इसका गुदा रवेदार स्वादिष्ट होता हैं।

अर्का मानिक

यह किस्म एन्थ्रेक्नोज, बुकनी रोग तथा पौध गलन रोग की निरोधक हैं।

अन्य किस्मे

पूरा बेदना, असाही यामाटो, दुर्गापुर केसर आदि।

खरबूज

पूसा शरबती

यह शीघ्र पकने वाली किस्म हैं। फल गोल व मिठास मध्यम होती हैं।

पूसा मधुरस

फल गहरी हरी धारीदार एवं पीला हरा, छिलका युक्त होता हैं।

हरा मधु

फल बड़े, मिठे, हरी धारीदार पिले रंग के होते हैं।

दुर्गापुर मधु

इसका फल बहुत मीठा एवं हल्का पीला रंग का होता हैं।

पूसा रसराज

इस किस्म का फल चिकना, धारीदार रहित होता हैं। इसका गुदा मीठा व रसदार होता हैं। इसकी उपज 200-250 क्विंटल/हेक्टेयर होता हैं।

अन्य किस्में

अर्का जित, स्वर्णा, अर्का राजहंस, पंजाब सुनहरी, लखनऊ बट्टी, लखनऊ सफ़ेद, शारदा एवं एनडीम 1 व 2 आदि।

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फसल चक्र

भिंडी- मटर- तरबूज

बेंगन- मटर- तरबूज

जे.बी. 64 बेंगन- तरबूज

मिर्च- तरबूज

टमाटर-फ्रेंचबीन- तरबूज

सोयाबीन- हरी प्याज- तरबूज

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बीजोपचार

बीजो को बोने से पहले थायरम 2-3 ग्राम/ किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।  बीज को 24- 36 घंटे तक पानी में भिगोकर रखने के बाद बुवाई करने से अच्छा अंकुरण होता हैं एवं फसल 7-10 दिन पहले आ जाती हैं।

बोने का समय

तरबूज और खरबूज को दिसंबर से मार्च तक बोया जा सकता हैं किन्तु मध्य फरवरी का समय सर्वोत्तम रहता हैं। उत्तरी पश्चिमी राजस्थान में वर्षा ऋतू में मटीरा/ मतीरा किस्म की फसल ली जा सकती हैं।

बीजदर

बीजदर तरबूज के लिए 6- 8 किग्रा तथा खरबूज के लिए 4- 6 किग्रा बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए आवशयक होती हैं।

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बोने की विधि

निम्न लिखित विधिया हैं तरबूज और खरबूज को लगाने की  –

उथला गड्डा विधि

इस विधि में 60 सेमी. व्यास के 45 सेमी. गहरे एक दूसरे से 1.5-2.5 मीटर की दुरी पर गड्डे खोदते हैं। इन्हे एक सप्ताह तक खुला रखने के बाद खाद एवं उर्वरक मिलाकर भर देते हैं। इसके बाद वृहताकार थाला बनाकर 2-2.4 सेमी. गहरे 3-4 बीज प्रती थाला बोकर महीन मृदा या गोबर की खाद से ढक देते हैं। अंकुरण के बाद प्रति थाल 2 पौधे छोड़कर शेष उखाड़ देते हैं।

गहरा गड्ढा विधि

यह विधि नदी के किनारो पर अपनाई जाती हैं। इसमें 60-75 सेमी. व्यास के 1-1.5 मीटर की दुरी पर गड्डे बनाये जाते हैं। इसमें सतह से 30-40 सेमी. की गहराई तक मृदा, खाद एवं उरवर्क का मिश्रण भर दिया जाता हैं। शेष क्रिया उथला गड्ढा विधि अनुसार ही करते हैं।

इस विधि में 2 मीटर चौड़ी एवं जमीन से उठी हुई पट्टियां बनाकर उसके किनारे पर 1-1.5 मीटर की दुरी पर बीज बोते हैं।

खाद एवं उरवर्क

तरबूज और खरबूज के लिए 250-300 गोबर की खाद/कम्पोस्ट, 60-80 किलो नत्रजन, 50 किलो एवं फॉस्फोरस एवं 50 किलो पोटाश , 1 हेक्टेयर के लिए आवशयकता होती हैं। गोबर की खाद/कम्पोस्ट, पोटाश स्फुर की सम्पूर्ण एवं नत्रजन की 1/3 मात्रा बोने के पहले देते हैं।

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सिंचाई

ग्रीष्म ऋतू की फसल होने के कारण एवं बलुई दोमट मृदा में उगाई जाने के लिए सिचाई की कम अंतराल एवं आवशयकता होती हैं। नदी के किनारे उगाई गई फसल को पोधो के स्थापित होने तक ही सिचाई की आवशयकता होती हैं। अन्य स्थानों पर 3-4 दिन में सिचाई करनी चाहिए।

निंदा नियंत्रण

जब पौधे छोटे रहे उस समय तक दो बार अच्छी तरह गुड़ाई कर खेत के पुरे खरपतवार निकाल देने चाहिए। बेले बढ़ने पर खरपतवारो की वृद्धि रुक जाती हैं। निंदा नियंत्रण के लिए एलाक्लोर 50 इसी 2 लीटर सक्रिय तत्व 1 हेक्टेयर या ब्यूटाक्लोर 50 इसी/लीटर 2 सक्रीय तत्व प्रति हेक्टेयर दर से बोनी के बाद एवं अंकुरण पूर्व छिड़काव कर मृदा में मिला दे छिड़काव हेतु 500 लीटर पानी एवं फ्लेट नोजल का उपयोग करे।

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हार्मोन उपचार

पौधों पर 2 एवं 4 पत्तियों की अवस्था पर इथ्रेल के 250 पीपीएम सांद्रण वाले घोल के छिड़काव से अधिक उपज प्राप्त होती है।

पौध सरंक्षण

किट

कद्दू का लाल कीड़ा

इसकी इल्लिया जड़ो को नुकसान पहुँचती है। बीटल/श्रंग पत्तियों को खाकर छेद बना देते है।

रोकथाम

कर्बरील 5% डस्ट 20 किलो 1 हेक्टेयर की दर से भुरकाव करे। कर्बरील 50% घुलनशील चूर्ण का 1200-1500 मी. ली. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करे

फल की मक्खी:-

इसकी इल्ली फलो छिद्र बनाकर खाती हैं। जिससे फल खाने योग्य नहीं रह जाते हैं।

रोकथाम:-

मेलाथियान 50 ईसी या एण्डोसल्फान 35 इसी 1000 मि. ली. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करे। जहरीला प्रपंच, किस्मे 10 लीटर पानी 1 किलो गुड़, 50 सी. सी. सिरका तथा तथा 20 मि. ली. मेलाथियान 50 ईसी मिला होता हैं, को चौड़े मुँह वाले पात्रों में रखे। इसमें आकर्षित होकर मरी गिरेगी व् मरी हुई मक्खियों को निकाल कर मिटटी में दबा दे। फल मक्खी से ग्रसित फलो को नष्ट कर देना चाहिए।

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रोग

बुकनी रोग (पावडरी  मिल्ड्यू)

इसमें पत्तियों पर सफ़ेद पाउडर जमा हो जाता हैं। जिससे प्रकाश संश्लेषण में बाधा आती हैं व पैदावार कम हो जाती हैं।

रोकथाम

इसकी रोगथाम के लिए डायनोकेप 0.05% घुलनशील गंधक 0.3% अथवा कार्बेन्डाजिम 0.1% का 2-3 बार 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।

डाउनी मिल्ड्यू

इसमें पत्तियों की ऊपरी सतह पर पिले या हलके लाल-भूरे धब्बे पड़ जाते हैं तथा निचली सतह पर गुलाबी चूर्ण जम जाता हैं।

रोकथाम

इसके नियंत्रण के लिए जाइनेब या मैंकोजेब की 0.3% सांद्रण वाली दवा का 7-10 दिन के अंतराल पर आवशयकता अनुसार 3-4 छिड़काव करें।

एन्थ्रेक्नोज

इसमें पत्तियों पर कोणीय या गोल भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जिनके एक दूसरे से मिलने पर झुलसने का लक्षण प्रकट होता हैं। फल पर भी भूरे काले धब्बे बनते हैं यह बीमारी अधिक आद्रता वाले वातावरण में अधिक पनपती हैं।

रोकथाम

इसके नियंत्रण  के लिए बीजो को कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम दवा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बोये। बेलो पर 0.2% मैंकोजेब या कार्बेन्डाजिम 0.1% दवा का छिड़काव करे।

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फ्यूजेरियम विल्ट

यह रोग पोधो को अंकुरण से लेकर किसी भी अवस्था पर प्रभावित कर सकता हैं। पौध अवस्था में आद्रगलन होकर पोध मर जाती हैं। परिपक्व अवस्था में पत्ती पर शीर्ष जलन के लक्षण आते हैं। बाद में पौधे मुरझाने लगते हैं। तथा अंततः उसकी मृत्यु हो जाती हैं।

रोकथाम

बीजो को 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम दवा से प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोये इस बीमारी से संक्रमित जमीन में 3-4 वर्ष तक  कोई भी फसल न ले। मृदा में केप्टान 0.3% दवा को छिड़ककर मिला दे।

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फलों की तुड़ाई

फलों की सही अवस्था पर तुड़ाई करना बहुत महत्वपूर्ण हैं। फलों के पकने की पहचान निम्नलिखित तरीको से करते हैं।

तरबूज

फलो को अंगुलियों से धप- धप की आवाज निकले तथा दाल ( डंडरेल ) सुख जावे

फल का पेंदा जो भूमि में रहता हैं यदि सफ़ेद से पीला हो जाये तो फल पका हुआ समझना चाहिए।

दबाने पर यदि फल दब जाता हैं एवं हाथो से ज्यादा ताकत नहीं लगानी पड़ती हैं तो फल पका हुआ समझना चाहिए।

प्रत्येक किस्म के फल पकने का समय अलग- अलग रहता हैं साधारणतः फल लगने से पकने तक 30-35 दिन लगते हैं। तुड़ाई  के समय फल के करीब 4-5 से. मी. डंठल लगा रहने पर फल में सड़न व्याधि नहीं आती हैं।

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खरबूज

परिपक्वता के समय फल के आधार भाग में पुष्प दंड के निकट एक गोलाकार दरार दिखाई देने लगती हैं। पूर्ण पकने पर फल बेल से आसानी से अलग हो जाता हैं।

पुष्प वृंत के आधार  का रंग हरे से मॉम के रंग का होने लगता हैं।

फलो से एक विशेष प्रकार की गंध आने लगती हैं।

फलो के छिलके का रंग हरा से पीला होने लगता हैं तथा फल पकने पर नरम हो जाता हैं

उपज

ऊपर दिए गए तरीके अनुसार खेती करने से तरबूज की 400 से 600 क्विंटल एवं खरबूज की 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

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