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ड्रिप सिंचाई प्रणाली से कम लागत में अधिक उत्पादन

ड्रिप सिंचाई प्रणाली
Written by bheru lal gaderi

ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से पौधों के जड़ क्षेत्र में नियंत्रित मात्रा में पानी देने से इसके अपव्य को रोका जा सकता है। सीमित जल संसाधन से अधिक से अधिक सिंचाई करके जायदा लाभ प्राप्त किया जा सकता है। देश में क्षेत्रफल की दृष्टि से सूक्ष्म सिंचाई में सर्वाधिक अग्रणी राज्य क्रमश: महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश तथा गुजरात है।

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

Image credit Jain Irrigation

ड्रिप सिंचाई प्रणाली Drip Irrigation System

यह सिचाई प्रणाली एक आधुनिक पद्धति है जिससे पानी को मुख्य स्रोत से पौधों की जड़ो तक विभिन्न उपकरणों की सहायता से एक तय मात्रा में उपलब्ध कराया जाता है।

ड्रिप सिंचाई प्रणाली की आवश्यकता Need off drip irrigation system

सिंचाई में पानी और उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से कई प्रकार की पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है जैसे भूजल स्तर का लगातार कम होना, नहर के पानी का लगातार उपयोग करने पर जल प्लावन एवं लवणता की समस्या आदि। गैर पारम्परिक फसलों जैसे पुष्प, फल एवं सब्जियों के अंतर्राष्टीय मानकों के आधार पर उत्पादन लेने के लिए सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली आवश्यक है।

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सिंचाई के साथ उर्वरकों का प्रयोग Use of fertilizers with irrigation

ड्रिप सिंचाई प्रणाली में सिंचाई के साथ-साथ घुलनशील उर्वरकों एवं विभिन्न पोषक तत्वों का प्रयोग किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को फर्टिगेशन कहते है।

फर्टिगेशन Fertigation

फर्टिगेशन से उर्वरकों की खपत 25-30% तक कम हो सकती है। जल एवं पोषक तत्वों का समन्वय अधिक पैदावार एवं गुणवत्ता की  कुंजी है। फर्टिगेशन में उर्वरकों को पूर्वनियोजित सिंचाई में देते है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली से जल एवं उर्वरक उपयोग दक्षता अधिक होने के कारण 40-60% कम पानी एवं 20-40% कम उर्वरक प्रयोग करके भी अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। जल एवं उर्वरक की बचत के साथ-साथ उत्पादकता एवं गुवत्ता में भी वृद्धि की सकती है।

ड्रिप सिंचाई प्रणाली के लाभ Benefits of drip irrigation system

इस पद्धति से कम पानी में अधिक क्षेत्र में सिंचाई कर कृषि उत्पादन सम्भव है।

  • एक समान जल वितरण होता है तथा उत्पादन ज्यादा होता है।
  • पानी देने के लिए नालियाँ बनाने की आवश्यकता नहीं होती, अतः अधिक श्रम की बचत होती हैं।
  • पोषक तत्वों, पानी एवं हवा का पौधों की जड़ो में समुचित समिश्रण संभव होने से पैदावार एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
  • केवल जड़ो में पानी देने से खरपतवार नियंत्रण में कम व्यव होता है।
  • ड्रिप पणाली से पौधों की जड़ो में ही खाद का एक समान वितरण होने से उर्वरकों की बचत होती है।
  • इस पद्धति से उबड़-खाबड़ खेत में भी सिंचाई प्रणाली की जा सकती है।

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ड्रिप सिंचाई प्रणाली के प्रकार Types of drip irrigation systems

इनलाइन ड्रिप सिंचाई Inline drip irrigation

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

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इसमें पाइप (लेटरल) के अंदर एक निश्चित दुरी (1फ़ीट,2फ़ीट) के अंतराल पर ड्रिपर लगे होते है। ड्रिपरो से जल बून्द-बून्द के रूप में पौधों की जड़ो के आस-पास गिरता है। इसमें पानी का डिस्चार्ज पर ड्रिपर 0-2 लीटर तक प्रति घंटा होता है। इसका प्रयोग मुख्यतया सघन फसलों और सब्जियों की खेती में किया जाता है।

ऑनलाइन ड्रिप सिंचाई Online drip irrigation

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

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इस सिंचाई प्रणाली का प्रयोग मुख्य रूप से बगीचों में होता है। इसमें लैटरल पर पौधों की दुरी के अनुसार छेद करके ड्रिपर को लगा देते है ड्रिपरो से जल बून्द-बून्द के रूप में पौधों की जड़ो के आस-पास गिरता है। इसमें पानी का डिस्चार्ज पर ड्रिपर 2-20 लीटर तक प्रति घंटा होता है।

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ड्रिप सिंचाई प्रणाली के मुख्य भाग The main part of the drip irrigation system

ड्रिप सिंचाई प्रणाली को मुख्य रूप से तीन बड़े भागों में बाटा  जा सकता है।

हेड असेंबली (Head Assembly)

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

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इस भाग में पानी को छानने का काम होता है जिसके लिए विभिन प्रकार के फिल्टर का प्रयोग किया जाता है साथ ही फर्टिगेशन काम भी यही से किया जाता है। इसमें निम्न लिखित उपकरणों का उपयोग किया जाता है।

डिस्क फिल्टर/स्क्रीन फिल्टर (Disk filter/screen filter)

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

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इन फिल्टर का मुख्य कार्य पानी के साथ आने वाले कचरे को छानकर साफ पानी की सप्लाई करना है।

हाइड्रो साइक्लोन/सैंड फिल्टर (Hydro cyclone/sand filter)

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

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इन फिल्टर का मुख्य कार्य पानी के साथ आने वाली बारीक मिट्टी व रेत के कणों को पानी अलग करना है। इनका उपयोग मुख्यत बोरवेल और नहर के पानी को साफ करने में किया जाता है क्योंकि इनमे मिट्टी और रेत के कणों की मात्रा ज्यादा होती है।

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फर्टिलाइज़र टैंक/वेंचुरी मनिफॉल्ड (Fertilizer tank/Venturi Manifold)

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

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इसका उपयोग फसल में सिंचाई के दौरान उर्वरक और पौष्टिक तत्वों को तरल रूप में देने के लिए किया जाता है। इसके लिए तय मात्रा फर्टिलाइजर,दवाइयों को पानी में घोल कर फर्टिलाइजर टेंक में डाल दिया जाता हे जो धीरे-धीरे पानी के साथ पौधों की जड़ो तक पहुँचती है।

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एन.आर.वी. (None Return Valve)

यह पानी को पंप की तरफ जाने से रोकती है।

बायपास असेबंली (By Pass Assy)

इसका उपयोग पानी की मात्रा अधिक होने पर ज्यादा पानी को पुनः  स्रोत में डालने में किया जाता है।

थ्रोटल वाल्व (Throttle valve)

इस वाल्व का प्रयोग पानी के प्रेशर और मात्रा को कम या ज्यादा करने में किया जाता है।

एयर रीलीज वाल्व (Air Release Valve)

एयर रीलीज वाल्व का मुख्य कार्य पंप के चालू और बंद होने के दौरान पाइप लाइन से हवा को बाहर निकलने में किया जाता है।

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प्रेशर गेज (Pressure Gauge)

प्रेशर गेज का प्रयोग सिंचाई के दौरान पानी के प्रेशर को नापने में होता है। इसके लिए हेड असेंबली में 2 प्रेशर गेज का प्रयोग किया जाता है। एक को हाइड्रो साइक्लोन/सैंड फिल्टर पर और दूसरे का डिस्क फिल्टर/स्क्रीन फिल्टर पर किया जाता है यदि स्क्रीन फिल्टर कचरे के कारण बराबर काम नहीं कर रहा है तो दोनों प्रेशर गेज को चैक करने पर पता चल जाता है की दोनों का प्रेशर बराबर है की नहीं।

वाटर कैरियर सिस्टम (Water Carrier System)

इस भाग में पानी को हेड असेंबली से पाइप लाइन से लैटरल तक पहुंचाया जाता हैं।

मेन पाइप लाइन (Main pipeline)

मेन पाइप लाइन को हेड असेंबली से जोड़कर पानी को सब मेन पाइप लाइन तक पहुंचाया जाता है।  मेन पाइप लाइन पर खेत के क्षेत्रफल के अनुसार वाल्व लगाकर अलग-अलग भाग बनाये जाते है ताकि कम पानी होने पर सुविधनुसार छोटे-छोटे टुकड़ो में भी सिंचाई की जा सके।

सब मेन पाइप लाइन (Sub- Main Pipeline)

सब मेन पाइप लाइन का कार्य पानी को लैटरल तक पहुँचना है। सब मेन पाइप लाइन पर छेद करके राइजर को जमीन से बाहर निकाला जाता है जो कनेक्टर की सहयता से लैटरल से जुड़ते है।

वाटर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (Water Distribution System)

यह ड्रिप सिंचाई प्रणाली का अंतिम भाग है इसमें लैटरल और ड्रिपर आते है जो पौधों की जड़ो तक पानी पहुँचाते है।

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ड्रिप सिंचाई की कार्यप्रणाली (Drip Irrigation Functionality)

ड्रिप/माइक्रो पद्धति में हेड असेंबली को सिंचाई स्रोत से जोड़ दिया जाता है। यह पानी हेड असेंबली में यह डिस्क फिल्टर/स्क्रीन फिल्टर  से होकर गुजरता है और हर तरह की अशुद्धियों से मुक्त हो जाता है। इसके बाद यह पानी लैटरल से ड्रिपर के माध्यम से पौधों की जड़ो तक पहुँचता है।

प्रबंधन एवं  देखभाल (Management and Care)

लम्बे समय तक बिना किसी बाधा के ड्रिप सिंचाई सिस्टम को काम  में लेने के लिए नियमित रूप से देखभाल करनी चाहिए।

  1. फिल्टर्स की रबड़, वाल्व और विभिन्न फिटिंग की जांच नियमित रूप से करते रहना चाहिए। यदि उनमे किसी प्रकार का रिसाव हो तो तुरंत ठीक करना चाहिए।
  2. सब मेन लाइन में दबाव 1 किलोग्राम प्रति सेंटीमीटर होना चाहिए।
  3. सभी ड्रिपर्स में समान पानी का बहाव होना चाहिए।
  4. ड्रिपर्स से नम होने वाली जगह का लगातार निरक्षण करते रहना चाहिए आसमान होने पर तुरंत कारवाही करे।
  5. यदि ड्रिप कुछ दिनों के लिए बंद रहे तो पुनः चालू करने से पहले ड्रिपर को साफ कर लेना चाहिए।
  6. लैटरल को खेत से हटाते समय बड़े आकार में मोड़ना चाहिए।
  7. बरसात के समय लैटरल को खेत से हटा लेना चाहिए।

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निष्कर्ष

ड्रिप सिंचाई प्रणाली की उपयोगिता विशेषकर सब्जियों एवं वानिकी/बागवानी फसलों आदि में अधिक पाई गई है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी और गैर सरकारी प्रसार संगठनों के माध्यम से उचित अनुदान देते हुए सूक्ष्म सिंचाई पद्धति को सर्वाधिक लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया जाये, जिससे किसानों को अधिक लाभ मिल सके और पानी की भी बचत की जा सके।

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