ट्राइकोडर्मा जैव -उर्वरकों के उपयोग का कृषि में महत्व

By | 2017-05-01

ट्राइकोडर्मा विरिडी ट्राइकोडर्मा हारजिएनम आदि ऐसे मित्र फफूँद हैं जो स्वयं के विकास से पौधों के मृदा व बीज जनित रोगो के रोग कारको को सकारात्मक रूप से बढ़कर जकड़ लेते हैं और उसकी कोशिका झिल्ली को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।भूमि जनित फफूंद रोग जैसे जड़गलन, उखटा, झुलसा, तना, गलन एवं अन्य भूमिगत के जैविक नियंत्रण में मत्वपूण भूमिका अदा करते हैं। इनका प्रयोग बीजोपचार से फसलों को बचाने के लिए नहीं, अपितु इसका व्यावसायिक रूप से उत्पादन करके अतिरिक्त आय भी प्राप्त की जा सकती हैं। ट्राइकोडर्मा रोगजनक फफूँदों के लिए विषयुक्त उत्पाद भी पैदा करते हैं। जैसे: ट्राइकोडर्मिन, ट्राइकोविरिडिन, डरमेडिन आदि जो की बोए गए बीजों को सतह पर सुरक्षा कवच बनाकर मृदाजनित रोग कारकों से सुरक्षा प्रदान करता हैं।

ट्राइकोडर्मा

पादप परजीवी निमेटोड

मूलगांठ निमेटेड आदि से सुरक्षा करता हैं, यह उनके अण्डों के कवच एवं इल्लियों की क्यूटिकल भी एंजाइम से विघटन एवं विसरणीय विषैले उत्पादों के  जैव संश्लेषण से उनकी शारीरिक क्रियाशीलता में बाधा उत्पन्न करता हैं। इसी कारण यह रोगजनक सूत्रकृमि की रोकथाम हेतु भी प्रयोग किया जाता हैं।

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ट्राइकोडर्मा की आवश्यकता

इसकी आवश्यकता महसूस होने के कई कारण हैं। जिनमे रासायनिक फफूंदनाशी को अंधाधुंध प्रयोग से पर्यावरण का प्रदूषित होना, रासायनिक फफूंदनाशियों का महंगा होना, खाने के पदार्थों पर उनके हानिकारक अवशेष मिलना, मित्र फ़फ़ूँदो व कीटों का नष्ट होना एवं रोग उत्पन करने वाले फफूंदों में इन फफूंदनाशियों के प्रति प्रतिरोधकता उत्पन्न होना जिसके फलस्वरूप बिमारियों का सही प्रकार नियंत्रण नहीं हो पाना प्रमुख हैं।

ट्राइकोडर्मा से किन फसलों का उपचार करें

कपास, चना, सरसों, अरहर, जीरा, दलहनी फसलें, केला, मुंग, काली मिर्च, गोभी, खीरा, गाजर, टमाटर, धनिया, बेंगन, अदरक, भिंडी, पुदीना, कॉफी, चाय, तम्बाकू, हल्दी, सोयाबीन, मूँगफली, धान, सूरजमुखी, सभी अनाज, निम्बू वर्गीय सब्जियों, फलों फल वृक्षों आदि के सभी प्रकार के पौधों की बिमारियों के रोकथाम हेतु इसका प्रयोग किया जाता हैं।

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ट्राइकोडर्मा से किन बिमारियों की रोकथाम करें

ट्राइकोडर्मा फफूंद पीथियम वंश के रोग जनक फफूंदों जैसे : फाफटोफ्थोरा, राइजोक्टोनिया, बटाटीकोला, स्क्लेरोशियम, मैक्रोफोमिना, स्पिजिस तथा फ्यूजेरियम ओक्सीस्पोरम आदि रोगजनकों हेतु हानिकारक पाया गया हैं। इसके अतिरिक्त ट्राइकोडर्मा का प्रयोग कोलर रॉट रोग, फुट रॉट, केप्सूल रॉट रोग तना गलन एवं उखड़ा रोग आदि के नियंत्रण हेतु करते हैं।

इन बिमारियों के बचाव हेतु ट्राइकोडर्मा का व्यवसायिक उत्पादन किया जाता हैं। इसका प्रयोग व्यापक रूप से बढ़ा हैं। यह जैविक फफूंदनाशक तथा रासायनिक फफूंदनाशकों की अपेक्षा दीर्घकालीन प्रभाव वाला तथा न्यूनतम मूल्य वाला हैं। यह पर्यावरण का मित्र हैं, इसका प्रयोग कार्बनिक खाद के साथ किया जा सकता हैं। यह तेजी से फैलने वाला फफूंद हैं।इस कारण अन्य रोगजनक जिन्हे वृद्धि हेतु ऑर्गेनिक कार्बन की आवश्यकता होती हैं प्रतिस्पर्दा में वह पिछड़ जाते हैं, जिसके फलस्वरूप फसलों की रोगो से सुरक्षा हो जाती हैं। इसकी मात्रा अधिक हो जाने पर फसल पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता हैं। इसके अलावा यह अन्य लाभप्रद परजीवियों एवं मित्र कीटों पर भी विपरीत प्रभाव नहीं डालता हैं।

ट्राइकोडर्मा कल्चर की प्रयोग विधियाँ

बीज उपचार

ट्राइकोडर्मा कल्चर को 4 से 8 ग्राम ंत्र प्रति किलो बीज एवं मध्य आकार के बीज हेतु 4 ग्राम तथा बड़े आकार के बीज जैसे : मुगफली, अरंडी हेतु 8 ग्राम की दर से 10 मिली. पानी में बीज के साथ मिलाकर उपचार करके बुवाई करनी चाहियें। ट्राइकोडर्मा बीज को एक सुरक्षात्मक कवच प्रदान करता हैं, जिससे बीज जनित एवं मृदा जनित रोगों से बीज की सुरक्षा हो जाती हैं। बीजोपचार के बाद बनी कल्चर की मात्रा को एक तगारी गोबर की सड़ी हुई महीन खाद के साथ समान रूप से खेत की मिट्टी में मिला देना चिहिए।

जड़ उपचार

250 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति 10-20 लीटर पानी में मिलाये व प्रत्यारोपित किये जाने वाले पौधों की जड़ों को 30 मिनट तक कन्द, राइजोम एवं कलम को उस घोल में 15 से 30 मिनट तक डुबोकर रखे, उसके पश्चात् खेत में लगाएं।

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मृदा उपचार

इसमें जैविक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि होती हैं। मित्र फफूंद का माइक्रोफ़्लोरा समृद्धि एवं इसके अधिक लाभ हेतु नमीयुक्त 100-150 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद महीन खाद में एक किलोग्राम ट्राइकोडर्मा संवर्ध मिलाकर ढेर बनाकर थोड़ा दबा दे तथा पॉलीथिन से ढककर दो सप्ताह के लिए रखें। हर तीन दिन के बाद खाद को हिलाकर ऊपर- निचे करें ऐसा करने से ट्राइकोडर्मा गोबर खाद में भली- भाती मिलकर अपनी संख्या में बढ़ोतरी करता रहता हैं। बीज बुवाई से पहले खेत में इस खाद के ढेर पर पाटा लगवा दे अथवा एक फसल में निंदाई- गुड़ाई के पूर्व समान रूप से बिखेर दे। यह सेप्रोफिटिक फफूंद हैं अर्थात मृत जैव अवशेषों पर पनपते हैं।

यह अम्लीय एवं उदासीन मृदा में अच्छी तरह से वृद्धि करते हैं एवं नम अवस्था में भलीभांति पनपते हैं। ट्राइकोडर्मा मृदा जनित रोगकारकों विशेषतः राइजोक्टोनिया सोलेनाई एवं पीथियम वंश की फफूंदों की क्रियाओं को दबा देते हैं साथ ही रोपित शिशु पौधों की जड़ों में फैलकर पौधों की रक्षा कॉलोनी बनाकर करते हैं।

पर्णीय छिड़काव

8-10 दिनों के अंतराल में 3-4 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति लीटर पानी के हिसाब से 3-4 बार छिड़काव करना चाहियें।  प्रत्येक  छिड़काव के पश्चात् स्प्रेयर नोजल की सफाई अवश्य करें।

सिमित क्षेत्रों में

पौधे लगाने के गड्ढों में या गमलों में 10-15 ग्राम ट्राइकोडर्मा संवर्ध प्रति किलोग्राम मिट्टी के हिसाब से मिलाकर 10 दिनों के लिये छोड़ दे। तत्पश्चात पौधों को रोपण करना चाहियें।

सावधानियाँ

कल्चर को सीधी धुप एवं गर्मी वाले स्थान से बचाकर रखे।

प्रयोग हेतु अंतिम तिथि से पूर्व ही काम में लेवें।

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