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ग्रीन हाउस में टमाटर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

Written by bheru lal gaderi

संरक्षित खेती का मुख्य उद्देश्य बागवानी फसलों विशेषता सब्जी (टमाटर, शिमला मिर्च, खीरा) व फल वाली फसलों को वातावरण की प्रतिकूल परिस्थितियों तथा कीड़े-मकोड़ों, विषाणु रोग आदि से सुरक्षित रख कर उत्पादन करना होता है। आज देश में लगातार बढ़ते औद्योगीकरण से शहरीकरण का पूरा दबाव भी कृषि योग्य भूमि पर ही पड़ रहा है तथा विशेष रूप से यह दबाव बड़े शहरों के चारों और तरफ कृषि योग्य भूमि को प्रभावित कर रहा है।

टमाटर

Image Credit – earthtimes.org

ठीक इसी प्रकार कृषि क्षेत्रों के हिस्से के जल पर भी लगातार इस विकास का दबाव पड़ रहा है। सरंक्षित खेती के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों जैसे भूमि एवं जल के सदउपयोग की पूर्ण संभावना रहती है।

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टमाटर की संरक्षित खेती तकनीक:-

यह तकनीकी निश्चित तौर पर पादप सुरक्षा काफी मजबूत आधार हैं। इसके द्वारा विभिन्न कीड़े मकोड़ों, रोगों के नियंत्रण हेतु उपयोग में लिए जाने वाले अन्धाधुंध कीटनाशकों के उपयोग को काफी हद तक घटाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त फसलों की अत्यधिक ठंड, गर्मी, ओलावृष्टि, वर्षा तथा तेज हवा से भी काफी हद तक सुरक्षा संभव होती हैं।

सब्जी उत्पादन द्वारा अपने खेतों में सब्जियों की उत्पादकता में 3 से 5 गुना वृद्धि के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती हैं। यही नहीं संरक्षित खेती द्वारा प्राकृतिक संसाधनों जैसे- भू-जल तथा उर्वरकों की मात्रा में भी भारी बचत संभव है। फसलों की अवधि में वृद्धि करने तथा उन्हें मौसम से पहले या बाद में उगाने हेतु उनका सरंक्षित उत्पादन ही एकमात्र उपाय है।

यह तकनीक नगरीय क्षेत्रों में खेती करने वाले युवा किसानों के लिए बड़ी उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। लेकिन संरक्षित खेती की आर्थिक सार्थकता व खेती हेतु संरक्षित संरचना व उत्पादन तकनीकी क्षेत्र विशेष की जलवायु व उच्च गुणवत्ता वाली सब्जी हेतु उपलब्ध बाजार पर निर्भर करती है।

इस तकनीक को अपनाने से ग्रामीण क्षेत्रों के बेरोजगार युवकों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकते हैं। खुले खेतों में खेती करने की अपेक्षा अधिक लाभ कमा सकते हैं। यही नहीं अधिकतर ग्रामीण युवक जिनकी आज परंपरागत खेती करने में रूचि नहीं है उनको इस प्रकार की नवीनतम खेती की तरफ आकर्षित करना संभव है। आज देश के बड़े शहरों और विदेशों में उच्च गुणवत्ता वाली सब्जियों की मुख्य मौसम से पहले तथा बेमौसमी बढ़ती मांग को देखते हुए भी इस प्रकार की सरंक्षित सब्जी उत्पादन तकनीकी को अपनाना हमारे सब्जी उत्पादकों के लिए आवश्यक हो जाता है।

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ग्रीन हाउस का प्रकार व लागत:-

कई प्रकार के ग्रीन हाउस में से एक प्रमुख है- प्राकृतिक रूप से वायुसंवाहित, शून्य उर्जा ग्रीनहाउस जिसको बनवाने पर लगभग 700-800 रुपए प्रति वर्ग मीटर का खर्चा आता है।

ग्रीन हाउस हेतु सिंचाई प्रणाली:-

कम दाब सिंचाई प्रणाली जिसमें 1000 लीटर पानी की टंकी को 1.5 से 2.0 मीटर ऊंचे प्लेटफार्म पर रखा जाता है तथा यह 1000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाले ग्रीनहाउस की सिंचाई के लिए पूर्णतया सक्षम है।

ग्रीन हाउस में टमाटर उत्पादन हेतु उपयुक्त किस्में:-

ग्रीन हाउस में टमाटर (tomato) उत्पादन हेतु केवल असीमित बढ़वार करने वाली किस्में जिनका फल भार लगभग 100 से 120 ग्राम तथा उनमें उच्च बाजार हेतु सभी महत्वपूर्ण गन निहित हों, का चयन किया जाना चाहिए अभी तक प्रचलित किस्मों में अर्का सौरभ, अंगूरलता, पंत बहार, अर्का रक्षक के परिणाम सबसे अच्छे रहे हैं तथा यह किस में पूर्णतया ग्रीन हाउस में लंबी अवधि तक 9 से 10 तक उत्पादन के लिए उपयुक्त है। तथा चेरी टमाटर की विभिन्न किस्मों में चेरी टमाटर-1 भी एक महत्वपूर्ण किस्म है।

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टमाटर पौध की आवश्यकता व पौध उगाना:-

ग्रीन हाउस में टमाटर उत्पादन हेतु पौध को संरक्षित क्षेत्रों में उगाया जाता है तथा यह सुनिश्चित किया जाता है कि पूर्णतया विषाणु रोग रहित व स्वस्थ हो और बीज बोने के लगभग 25 से 30 दिन बाद रोपाई योग्य हो जाती हैं। इस प्रकार 1000 वर्ग मीटर के ग्रीन हाउस में लगभग 2400 से 2600 पौधों  को लगाया जाता है। हमेशा क्यांरियाँ जमीन से उठी हुई बनाई जाती है तथा क्यारियों की लंबाई पूर्णतया ग्रीन हाउस के डिजाइन पर निर्भर करते हैं, लेकिन यह ध्यान रखा जाता है कि ग्रीन हाउस में उपलब्ध स्थान का अधिकतम उपयोग फसल उत्पादन के लिए होना चाहिए।

कटाई छटाई व सहारा देना आदि शस्य क्रियाएं:-

टमाटर के पौधों को रोपाई के 20 से 25 दिन बाद क्यारियों के ऊपर लगभग 8 फीट की ऊंचाई पर क्यारियों की लंबाई के समांतर लगे ओवरहेड तारों के साथ बंधी हुई रसियों के साथ लपेटा जाता है तथा साथ ही साथ पौधों में एक मुख्य शाखा को छोड़कर समस्त अन्य शाखाओं को कटाई छटाई करके हटा दिया जाता है।

कटाई-छटाई कि यह प्रक्रिया लगातार लगभग 15 से 25 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार की जाती हैं। यह ध्यान रखा जाता है कि मुख्य शाखा पर आने वाले फूलों के गुच्छों को कटाई-छटाई या पौधों को लपेटने के दौरान कोई नुकसान ना पहुंचे तथा जब पौधे ओवरहेड तारों की ऊंचाई तक बढ़ जाते हैं तो उन्हें प्रत्येक कटाई-छटाई के समय एक से 2 फीट नीचे उतार दिया जाता है तथा इस प्रकार पौधे क्यारियों के चारों ओर ही एक प्रक्रिया के अनुसार स्थापित किए जाते हैं।

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ग्रीन हाउस में टमाटर का परागगण:-

टमाटर एक स्वपरागित फसल होने के बाद भी ग्रीन हाउस में विशेष सहायक परागण की आवश्यकता पड़ती हैं। इसका मुख्य कारण ग्रीन हाउस में हवा का बहाव नहीं होने के कारण परागकोष से परागकण नहीं निकलते अतः ग्रीन हाउस में या तो वाइब्रेटर या एयर ब्लोअर्स का उपयोग कर परागण के कार्य में सहायता की जाती है। लेकिन इजराइल या कई पश्चिमी देशों में ग्रीनहाउस टमाटर की फसल में बम्बल मक्खियों को उपयोग में लाया जाता है जो ग्रीन हाउस टमाटर उत्पादन के लिए सबसे सक्षम परागणकर्ता है।

लेकिन भारत में अधिक गति से हवा फेंकने वाले यंत्र को सुबह के समय गर्मी के मौसम में 8:00 से 9:00 बजे तक तथा सर्दी के मौसम में 9:00 से 10:00 बजे तक मध्यम गति पर चला कर परागण करने के सबसे अच्छे परिणाम मिलते हैं। इस प्रकार के यंत्र बिजली चलित या बैटरी चलीत दोनों प्रकार के होते हैं तथा एक व्यक्ति 1000 वर्ग मीटर के ग्रीन हाउस में लगभग एक से डेढ़ घंटे में पूरा प्रागगण का कार्य कर सकता है।

सिंचाई व उर्वरक देना:-

आमतौर पर फसल को खाद, उर्वरक व पानी देना भूमि के प्रकार मौसम तथा फसल की अवस्था पर निर्भर करता है। वैसे फसल को लगातार एक अंतराल पर पानी दिया जाता है तथा उसके साथ ही पूर्णतया पानी में घुलनशील उर्वरकों का घोल जो सामान्यतः नत्रजन फास्फोरस और पोटाश को 5:3:5 अनुपात में मिलाकर विभिन्न अवस्थाओं पर विभिन्न मात्रा में दिया जाता है।

वैसे रोपाई से फूल आने तक 4.0 से 5.0 घन मीटर पानी प्रति 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में एक बार में दिया जाता है तथा गर्मी के मौसम में सप्ताह में 3 बार तथा सर्दी के मौसम में सप्ताह में दो बार सिंचाई की जाती है। इसके साथ ही सिचाई जल में उपरोक्त घोल की 1.0 लीटर मात्रा प्रति घन मीटर पानी मिलाकर दी जाती हैं।

फूल आने से फल लगने तक पानी की मात्रा 5.0 से 6.0 घन मीटर तथा उर्वरकों का गोल 2.0 से 2.5 लीटर/घन मीटर प्रति वर्ग मीटर की दर से सिंचाई प्रणाली के द्वारा दिया जाता है। फाल स्थापना से पूर्ण विकास अवस्था तक 5.0 से 6.0 घन मीटर पानी ही दिया जाना चाहिए।

फल पकने से तोड़ने तक पानी पुनः 5.5 से 6.0 घन मीटर तथा उर्वरकों के गोल की 2.5 से 3.0 गहन लीटर मात्रा प्रति घन मीटर पानी में मिलाकर हो जाती हैं। आमतौर पर गर्मी के मौसम में फर्टीगेशन 3 से 4 दिन के अंतराल पर तथा सर्दी में 2 से 3 दिन के अंतराल पर किया जाता है उस क्षेत्र विशेष के मौसम भूमि के प्रकारों पर निर्भर करता है।

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उर्वरकों का स्टॉक घोल बनाना व फर्टीगेशन:-

1000 लीटर क्षमता की टंकी में स्टॉक घोल बनाने के लिए यूरिया, फास्फेट, 17:44:00 कि 100कि.ग्रा. सल्फेट ऑफ पोटाश 00:00:50 की 100कि.ग्रा. तथा यूरिया की 75 कि.ग्रा. मात्रा को पानी में घोला जाता है। पहले टंकी में 200 से 300 लीटर पानी भरकर उसमें इन उर्वरकों को डाला जाता है तथा फिर इन्हे डंडे की सहायता से अच्छी प्रकार घोल कर टंकी को पूरा पानी से भरकर पुनः घोल बनाया जाता है।

उपरोक्त प्रथम दोनों उर्वरक शत प्रतिशत पानी में घुलनशील है तथा उन्हें इफको फर्टिलाइजर कंपनी द्वारा बाजार में उपलब्ध पानी में घुलनशील उर्वरकों के मुकाबले काफी कम दामों पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इस प्रकार इस स्टॉक घोल से फसल की रोपाई के बाद प्रारंभिक अवस्था में 1.0 लीटर मात्रा को 1000 लीटर एक घन मीटर सिंचाई जल की मात्रा में घोलकर ड्रिप सिंचाई प्रणाली द्वारा दिया जाता है, जिसे फर्टीगेशन कहते हैं तथा इसके बाद इस गोल की मात्रा 2.0 से 2.5 लीटर तथा फसल पूर्णतया फ़्लान में हो तो  3.0 से 3.5 लीटर मात्रा पानी प्रति घन मीटर पानी में घोलकर दिया जाता है। समान्यतया गर्मी के मौसम में 3 बार लेकिन फर्टिगेशन दो बार किया जाता है।

सर्दी के मौसम में सिंचाई व फर्टिगेशन दोनों सप्ताह में दो बार किया जाता है, लेकिन सिंचाई व फर्टिगेशन कि अवधि व मात्रा पूर्णतया मौसम, फसल, किस्म, भूमि के प्रकार व फसल उगाने के तरीके पर भी निर्भर करती हैं। द्वितीयक तत्व तथा सूक्ष्म तत्वों को आवश्यकता अनुसार फसल में दिया जाता है। लेकिन ध्यान रहे कभी भी कैल्शियम व सल्फेट रखने वाले उर्वरकों को एक साथ एक टंकी में नहीं दिया जाता है। इन्हें अलग से बाल्टी इत्यादि में घोलकर सीधे फर्टिगेशन में दिया जाना चाहिए।

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पादप संरक्षण:-

आमतौर पर ग्रीन हाउस टमाटर में किसी प्रकार के कीटों व रोगों का प्रकोप नहीं होता है। लेकिन कभी-कभी विषाणु रोगों का यदि कुछ पौधों पर प्रकोप हो तो उन्हें अविलंब उखड कर नष्ट कर देना चाहिए अन्यथा यह कटाई छटाई यंत्रों के साथ दूसरे पौधों पर फेल सकता है।

इसकी रोकथाम हेतु यह भी आवश्यक है कि जो श्रमिक ग्रीन हाउस में रोजाना कार्य करते हैं, वह किसी प्रकार के तंबाकू आदि का प्रयोग ग्रीन हाउस के अंदर ना करें तथा हाथों को साबुन से धो कर ही कार्य करें। प्रत्येक दिन कटाई छटाई में प्रयोग होने वाले यंत्रों को भी रोग रोहित किया जाना चाहिए। ऐसे श्रमिक ग्रीन हॉउस में कार्य करने के बाद ही खुले खेतों में कार्य करें।

फलों की तुड़ाई, ग्रेडिंग, बेचना व उपज:-

बड़े आकार की किस्मों के फलों को सामान्यतः चाकू के साथ ही तोड़ा जाता है। तुड़ाई कैंची या तेज धार वाले चाकू से की जानी चाहिए। जिससे टमाटर के पौधों व अन्य फसलों को नुकसान ना हो। फलों को पूर्ण रुप से पकने की लाल रंग अवस्था पर ही तोड़ा जाता है तथा तुड़ाई के बाद रंग, आकार व भार के अनुसार ग्रेडिंग करके उच्च बाजार में बेचा जाता है।

यदि फलों को एक या दो दिन बाद बेचना हो तो उन्हें गर्मी में 8 से 10 सेंटीग्रेड तापमान पर रखा जाता है। सर्दी में उन्हें सामान्य कमरे के तापमान पर भी रखा जा सकता है। आमतौर पर एक अच्छे वातावरण नियंत्रित ग्रीन हाउस से 10 से 15 टन टमाटर की उपज प्रति 1000 वर्ग मीटर के ग्रीन हाउस से प्राप्त की जा सकती हैं। लेकिन उपज पूर्ण रूप से जलवायु, किस्म, व फसल प्रबंधन पर निर्भर करती हैं।

चेरी टमाटर से 2.0-3.0 टन तक उपज प्राप्त की जा सकती हैं। उसमें टमाटर उच्च गुणवत्ता वाला होता है, अतः उत्पादकों को बड़े शहरों के उच्च बाजार में बेच कर अधिक लाभ कमाना चाहिए। यह तकनीक शहर के चारों और खेती करने वाले के लिए काफी हद तक लाभदायक हो सकती हैं।

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फल उपज:-

1000 वर्ग मीटर ग्रीन हाउस से लगभग 10 से 15 टन टमाटर 9 से 10 महीने की अवधि वाली फसल से प्राप्त किया जा सकता है। जबकि चेरी टमाटर की उपज 2 से 3 टन प्रति 1000 वर्ग मीटर रहती हैं।

टमाटर की फसल के प्रमुख रोग एवं रोकथाम:-

आर्द्र गलन (डेम्पिंग ऑफ):-

यह रोग नर्सरी में पौधों की छोटी अवस्था में लगता है। इसके प्रकोप से पौधा का जमीन की सतह पर स्थित तने का भाग काला पड़कर गलने लग जाता है और नन्हे पौधे गिरकर मरने लगते हैं। यह रोग भूमि एवं बीज के माध्यम से फैलता है।

रोकथाम:-

बुवाई से पूर्व बीजों को 3 ग्राम थायरम या 3 ग्राम कैप्टान प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बोयें। नर्सरी आस-पास की भूमि से 4 से 6 इंच ऊपर उठी हुई भूमि में बनाएं। नर्सरी में बुवाई के पूर्व  थायरम या ग्राम कैप्टान 4 से 5 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से भूमि में मिलाएं।

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झुलसा रोग (ब्लाईट):-

इस रोग से टमाटर के पौधों की पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। जिससे पौधा सुखकर  मर जाता है।

झुलसा रोग (ब्लाईट) दो प्रकार का होता है:-

अगेती झुलसा रोग:-

इस रोग में डब्बों पर गोल गोल छल्लेनुमा धारियां दिखाई देती है। धब्बे के चारों ओर का क्षेत्र पीला होने लगता है तथा कई दफे आपस में मिलकर पतियों को सूखा देते हैं। कभी-कभी ऐसे धब्बे टनों पर भी बढ़ने लगते हैं, जिससे पूरा पौधा सूख जाता है।

पिछेती झुलसा:-

यह रोग बाद की अवस्थाओं पर आक्रमण करता है तथा नम एवं ठंडे वातावरण में काफी नुकसान पहुंचाता है। इस रोग से पतियों पर जलीय, भूरे रंग के गोल से अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं। जिसके कारण अंत में पत्तियां पूर्ण रूप से झुलस जाती हैं।

रोकथाम:-

मेंकोजेब २ ग्राम या कॉपर आक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। छिड़काव 10 से 15 दिन के अंतराल पर फल आने पर करें।

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पर्ण कुंचन व मोजेक रोग:-

यह विषाणु जनित रोग हैं। पर्ण कुंचन रोग के कारण पौधों के पत्ते सिकुड़ कर मुड़ जाते हैं तथा छोटे व भूरे रंग युक्त हो जाते हैं। मोजेक रोग के कारण पत्तियों पर गहरा एवं हल्का पीलापन लिए हुए हरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। उक्त रोग को फैलाने में कीट अहम भूमिका निभाते हैं।

रोकथाम:-

बुवाई से पूर्व कार्बोफ्यूरान ३-G 8 से 10 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से भूमि में मिलाएं। पौध रोपण के 15 से 20 दिन बाद डाइमेथोएट 30 ई.सी. 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।  यह 15 से 20 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार दोहराएं। फूल आने के बाद उपरोक्त कीटनाशक दवाओं के स्थान पर मेलाथियान 50 ई.सी. 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

 जड़ गांठ रोग:-

इस रोग के कारण पौधे की वृद्धि रुक जाती है। जिससे पत्तियां पीली होकर गिर जाती है। फूल बहुत कम मात्रा में बनते हैं।

रोकथाम:-

रॉपौधों ग्रसित पौधे को उखड दे। मृदा को कार्बोफ्यूरान एक से 2 किलोग्राम सक्रिय तत्व से उपचारित करें।

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लेखक:-

श्री हरी दयाल चौधरी

उद्यान विज्ञानं विभाग

श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय

जोबनेर

राजस्थान

Email – haridayal.choudhary@gmail.com

स्रोत:-

फसल क्रांति

वर्ष-05 , अंक- 01, जनवरी-2018

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