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टमाटर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

Written by bheru lal gaderi

सब्जियों में टमाटर (tomatoes)का प्रमुख स्थान है। इसे संपूर्ण विश्व में उगाया जाता है। भारत में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, बंगाल, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और झारखंड टमाटर उत्पादन में प्रमुख राज्य है।

टमाटर

मध्यप्रदेश में शिवपुरी, झाबुआ, खरगोन, खंडवा जिले में टमाटर प्रमुखता से उगाया जाता है। शिवपुरी जिले की बात की जाए तो टमाटर का क्षेत्रफल 15000 हेक्टेयर से अधिक हो गया है। टमाटर शिवपुरी जिले की प्रमुख नगदी फसल हो रही हैं, जो किसानों के जीविकोपार्जन ही नहीं आय सृजन का भी प्रमुख साधन सिद्ध हो रही है। यहां से टमाटर का निर्यात झांसी, कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर, दिल्ली, ग्वालियर, तथा नेपाल तक हो रहा है।

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कैसी हो जलवायु:-

टमाटर की फसल पर मौसम का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इसका पौधा अधिक सर्दी, गर्मी, वर्षा को सहन नहीं कर सकता है। अच्छी फसल के लिए 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान एवं 50 से 60% आद्रता वाला मौसम उपयुक्त रहता है। पाले और जलमग्न  दशाओं में पौधे शीघ्र नष्ट हो जाते है। व्यवसायिक खेती के लिए मृदा में उचित नमी एवं खुली धूप चाहिए।

मृदा स्थिति:-

उचित जल निकास वाली जैविक पदार्थों से भरपूर रेतीली दोमट मिट्टी 6-7 पीएच मान वाली मृदाओं में अच्छा उत्पादन मिलता है।

टमाटर की उन्नत किस्में:-

टमाटर की परिमिति और अपरिमित वृद्धि वाली उन्नत किस्में व संकर किस्में उपलब्ध हैं। क्षेत्र की अनुकूलता व व्यापारिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए प्रजातियों का चयन करें।

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प्रमुख किस्में:-

काशी अमृत:-

अपरिमित किस्म है, फल गोल 108 ग्राम वजन के तथा उत्पादन क्षमता 650 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।

काशी विशेष:-

यह परिमित किस्म है, फल 80 ग्राम औसत वजन भार वाले, रोपाई के 70 दिन बाद फल मिलना शुरू, पर्णकुंचन विषाणु रोग के प्रति अवरोधी हैं। उत्पादन क्षमता 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टर।

काशी हेमंत:-

परिमित किस्म से 80-85 ग्राम वजन के फल, औसत उत्पादन क्षमता 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

पूसा रूबी:-

यह एक अग्रणी किस्म है।  फल रोपाई के 60-65 दिन बाद प्राप्त होने लगते हैं। 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टर पैदावार मिलती है।

अर्का सौरभ:-

यह किस्म सेमि डिटरमिनेट है। फल मोटे गूदे वाले गोल, बड़े आकार के लंबी परिवहन दूरी के लिए उपयुक्त होते हैं। औसत पैदावार 300 से 500 क्विंटल प्रति हैक्टर दे देती है।

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संकर किस्में:-

पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड-4, पूसा हाइब्रिड-8, अर्का सम्राट, अर्का रक्षक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थाओं से विकसित प्रमुख किस्में हैं। जिनकी औसत पैदावार 350 से 850 क्विंटल प्रति हेयर तक है।

प्राइवेट संकर किस्में:-

अभिलाष, शिवम, जेके,  रतन, सम्पूर्णा, यू एस-440, लक्ष्मी, सिद्धार्थ, यू एस, चिरायु-592,962, सुप्रिया एवं अविरत प्रमुख किस्में है। जो किसानों द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में अनुकूलता के अनुसार उगाई जा रही है।

नर्सरी प्रबंधन:-

एक हेक्टर में रोपाई के लिए 225 वर्ग मीटर क्षेत्र में को तैयार करने की आवश्यकता होती है। सामान्यतया 7.5 x1.0 x0.15 मीटर आकार की क्यारियां तैयार की जाती है। 3 किलोग्राम गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट प्रति वर्ग मीटर की दर से मिट्टी में अच्छी तरह मिला देते हैं। नर्सरी तैयार करने वाली भूमि को फफूंदनाशक (कार्बेंडाजिम या फॉर्मेल्डिहाइड) रसायन के 0.1% घोल से उपचारित कर ले। सामान्य खुली परागित किस्मों के लिए 120 से 125 ग्राम तक बीज की आवश्यकता होती हैं। तैयारियों में 5.5 सेमी की दूरी पर 1 सेमी गहरी लाइन खींचकर बोये। दो से तीन पत्ती आ जाए तब एम-45 का छिड़काव करें।

शेडनेट/लोटनल/नेटहाऊस में पौध तैयार करना अधिक सुरक्षित होता है। इसमें कोकोपिट ट्रे में पौध तैयार की जा सकती हैं। जिससे परिवहन (लाने-ले जाने) में सुविधा अधिक रहती हैं।

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रोपाई:-

बीज बुवाई के 4 से 5 सप्ताह में पौध रोपण के लिए तैयार हो जाती है। रोपाई से पौध को 0.1% कार्बेन्डाजिम के घोल में डूबाना चाहिए। रोपाई पंक्तियों और पौधे की आपसी दूरी क्रमश 60 से 75 सेमी व 45 से 60 सेमी प्रति हेक्टर, औसतन 35000 पौधे अच्छी उपज के लिए आवश्यक होते हैं।

अच्छी पैदावार व गुणवत्ता के फल लंबी अवधि तक प्राप्त करने के लिए उपाय ऊंची हुई मेड़ों पर ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग के साथ बांस या लकड़ी के सहारे (स्टेकिंग) करना चाहिए। यह प्रक्रिया शेडनेट हाउस में कम क्षेत्र में उन्नत तकनीक से अच्छी फसल ली जा सकती है।

फसल की देखरेख:-

टमाटर का पौधा जकड़ा जड़ वाला होता है, यानि जड़ भूमि की ऊपरी सतह पर ही रहती है। अतः निराई-गुड़ाई करते समय जड़ों की क्षति नहीं हो इसका ध्यान रखना चाहिए। नियंत्रित सिंचाई जरूरी हैं। कम व अधिक दोनों ही सिचाई हानिकारक हो सकती है। ध्यान रहे कि मृदा में हल्की नमी हमेशा बनी रहे क्योंकि किसी भी स्थिति में तुरंत पानी देने से फल फट जाते है।

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एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन:-

खाद व उर्वरकों का उपयोग सामान्यतः 200 क्विंटल गोबर की खाद, 90 से 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 से 60 किलोग्राम फास्फोरस, 50 से 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। गोबर की खाद फास्फोरस और पोटाश की संपूर्ण मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई के समय खेत में अच्छी तरह से मिलाएं। नाइट्रोजन की मात्रा को दो बराबर भागों में बांट कर रोपाई के 25 से 30 और 45 से 50 दिन बाद देना चाहिए। प्रर्णीय छिड़काव जल विलेय उर्वरकों का या फर्टिगेशन तकनीक के माध्यम से सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति की जा सकती है।

सिंचाई:-

अच्छी उपज के लिए सिंचाई का विशेष महत्व है। सिंचाई ड्रिप पद्धति से करने से अधिक उत्पादन के साथ खरपतवारों का प्रकोप कम होता है। इसमें फर्टिगेशन भी किया जा सकता है, जो समय-समय पर आवश्यकतानुसार जरूरी होता है। ग्रीष्मकालीन फसल में 6 से 7 दिन वह शरद कालीन फसल में 10 से 15 दिन के अंतराल से सिंचाई करनी चाहिए।

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पौधे की वृद्धि नियंत्रणों का उपयोग:-

टमाटर में वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग पौध वृद्धि, उपज गुणवत्ता, शीघ्र फलन कम और अधिक तापमान पर फल लाने के लिए लाभकारी पाए गए हैं। जिब्रेलिक एसिड 10 पी.पी.एम., एन.एन.ए  ४५, पी.पी.एम. के पर्णीय छिड़काव से उपज में वृद्धि पाई गई है। तुड़ाई

टमाटर की तुड़ाई की अवस्था उसकी उगाने के उद्देश्य बाजार मांग, परिवहन दूरी पर निर्भर करती है। टमाटर के फलों की छुड़ाई निम्नलिखित अवस्थाओं में की जाती है।

  1. परिपक्व हरी अवस्था में दूरस्थ बाजारों में भेजने के लिए।
  2. हल्की लाल अवस्था समीपस्थ बाजारों में भेजने के लिए।
  3. लाल पाकी अवस्था स्थानीय बाजार और संसाधन के लिए।

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श्रेणीकरण:-

बाजार की मांग के अनुरूप टमाटर का श्रेणीकरण किया जाता है। भारतीय मानक ब्यूरो ने टमाटर को सुपर, सुपर फैंसी और कमर्शियल में विभाजित किया है।

भंडारण:-

टमाटर को परिपक्व अवस्था पर 12 से 13 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर सौ गेज मोटी पॉलिथीन में 4 से 5 सप्ताह तक भंडारण किया जा सकता है।

उपज:-

टमाटर की उपज उसकी किस्मों पर निर्भर करती है। खुली परम्परागत किस्में औसतन 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और संकर किस्मे 400 से 850 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है।

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टमाटर में नाशीजीव एकीकृत प्रबंधन:-

  1. गर्मी के महीने में जुताई करके एक बार सिंचाई करें तथा इसके बाद खून एक दो बार जुताई करें।
  2. जून के अंतिम सप्ताह के बाद हरी खाद के लिए सनई या ढेंचा की बुवाई करें।
  3. हरी खाद का जुताई मिट्टी में पलटने के बाद ट्राईकोडर्मा 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।
  4. पौधशाला में मिट्टी का सौर्यीकरण सफेद पॉलीथिन से ढँककर अवश्य करें।
  5. रोग रहित बीज तथा स्वस्थ बीज को ही लगाएं।
  6. पौधशाला में नीम की खली 50 से 100 ग्राम प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र के हिसाब से प्रयोग करें।
  7. खरीफ की पछेती एवं रबी वाली टमाटर की फसल विषाणु रोग से बचाने के लिए करें।
  8. टमाटर के बीज को ट्राईकोडर्मा 1% तथा इमिडाक्लोप्रिड 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से शोधित करे।
  9. पौधशाला में एक या दो बार स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 150 पी.पी.एम. घोल का अच्छी तरह से छिड़काव करें।
  10. नर्सरी को नायलॉन की जाली से ढक कर रखें।
  11. पौध तैयार होने के बाद रोपाई के समय इमिडाक्लोप्रिड 25 प्रतिशत की दर से 30 मिनट जड़ को डुबोकर तथा ट्राइकोडर्मा के 1% घोल में 10 मिनट डुबो ले।
  12. रोपाई के लगभग 20 दिन बाद जड़ के पास ट्राइकोडर्मा के 1% घोल की दर से भिगावें तथा 15 दिन बाद पुनः दोहराएं।
  13. गुरचा, उकटा या अन्य बीमारी वाले संक्रमित पौधों को फसल की प्रारंभिक अवस्था में उखाड़ कर जला दे।

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प्रस्तुति:-

डॉ. पुनीत कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख एवं डॉ. एम. के. भार्गव, वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र- शिवपुरी (म.प्र.)

साभार:-

विश्व कृषि संचार

वर्ष-20, अंक-4, सितंबर-2018

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