ज्वार की उन्नत खेती एवं अधिक उत्पादन तकनीक

By | 2017-07-08

ज्वार भारत में उत्तरी राज्यों की एक प्रमुख चारे की फसल हैं। इसे विभिन्न राज्यों में खरीफ, रबी तथा जायद तीनो ऋतुओं में उगाया जाता हैं। उतर प्रदेश में इसे जून- जुलाई, दिल्ली में जून के तीसरे सप्ताह से चौथे सप्ताह तक, मध्यप्रदेश में जून के अंतिम सप्ताह तक, तमिलनाडु में सितम्बर तथा जुलाई का तीसरा सप्ताह तथा आंध्रप्रदेश में जून- जुलाई, अगस्त का अंतिम सप्ताह से सितम्बर का प्रथम सप्ताह, सितम्बर के मध्य से सितम्बर के अंत तक में खेती की जाती हैं।

ज्वार

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कम वर्षा तथा शुष्क कृषि क्षेत्रों के लिए यह बहुत उपयोगी चारे की फसल हैं। इसलिए इसको यहां की सबसे उपयोगी फसलों के लिए जाना जाता हैं। भारत के मध्य तथा दक्षिणी विभागों बरानी क्षेत्रों में इसकी खेती अधिक की जाती हैं। इसके दानो से चपाती, दलियां, खीर, भुना- तला दाना बनाया जाता हैं।

उत्पति तथा वितरण:-

ज्वार की उत्पति के संबंध में वैज्ञानिको का अलग- अलग विचार हैं। डी- कन्डोल 1884 तथा हुकर ज्वार का जन्म अफ्रीका मानते हैं, जबकि बेबीलीव (1926-35) के अनुसार इस फसल का जन्म स्थल अफ्रीका का आबिसिनिया प्रदेश हैं।

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बाल 1910 के अनुसार ज्वार का जन्म स्थान भारत हैं। विश्व में ज्वार की खेती करने वाले देशों में अफ्रीका, भारत, चीन तथा अमेरिका का प्रमुख स्थान हैं। इसके अतिरिक्त ईरान, तुर्किस्तान, पाकिस्तान, कोरिया, ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी यूरोप के कुछ हिस्सों में ज्वार की खेती की जाती हैं।

जलवायु:-

यह वर्षा आधारित खेती की प्रमुख फसल हैं जिसे सूखे में भी उगाया जा सकता हैं। इसकी खेती 400-1000 मिमी. वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। देश के विभिन्न भागों में जून से अक्टुम्बर के मध्य अधिक वर्षा होती हैं, जिससे असिंचित अवस्था में इसकी खेती मुख्य रूप से खरीफ में हो पाती हैं।

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आन्ध्रप्रदेश में यह खरीफ तथा रबी दोनों मौसमों में उगाई जाती हैं। कर्नाटक तथा महाराष्ट्र में 70-75% खेती रबी मौसम में हैं। तमिलनाडु में यह तीनो मौसमों में उगाई जाती हैं। ज्वार का अंकुरण 200 सेल्सियस से अधिक तापक्रम पर चौथे दिन हो जाता हैं।

मिट्टी तथा उसकी तैयारी:-

एक जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करने के बाद 2-३ जुताइयाँ देशी हल तथा कल्टीवेटर से करके मिटटी को भुरभुरी बना लेते हैं। प्रत्येक जुताई के पश्चात् पाटा लगाना अतिआवश्यक होता हैं, जिससे मिटटी भरभूरी हो जाती हैं तथा मिटटी में पर्याप्त नमि भी संरक्षित हो जाती हैं।

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खाद एवं उर्वरक:-

कम उर्वरकता की मिट्टी में 10-15 टन प्रति हेक्टेयर कम्पोस्ट खाद देने की आवश्यकता पड़ती हैं। संकर प्रजातियों में 100-150 की.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर देने की आवश्यकता होती हैं। देशी प्रजातियों में कम नाइट्रोजन की आवश्यकता होती हैं। मीठी सूडान घास (एस.एस.जी. -59-3) में 120 की.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर देना लाभकारी होता हैं।

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ज्वार के फसल- चक्र में बरसीम अथवा संजी को लगाने से अकार्बनिक खाद की मांग कम हो जाती हैं। इसके लिए 30-40 की.ग्रा. फास्फोरस तथा 20-25 की.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना आवश्यक होता हैं। अधिक नाइट्रोजन के साथ कम फास्फोरस को प्रयोग करने से पौधों में हाइड्रोसायनिक अम्ल (एस.सी.एन.) की मात्रा बढ़ जाती हैं। इसकी मात्रा 25-30 दिन के पौधे में अधिक होती हैं। गर्मी व सूखे की स्थिति में पौधों में हाइड्रोसायनिक अम्ल की बढ़ोतरी होती हैं। हल्की मिट्टी में नाइट्रोजन २ बार तथा गीली मिट्टी में बुवाई के समय ही दिया जा सकता हैं।

बीज दर:-

मानसून के पश्चात् ज्वार फसल की बुवाई करने से उनके तनो पर हानिकारक मक्खियों का प्रकोप कम होता हैं। तथा उत्पादन भी अधिक मिलता हैं खरीफ में 20-25 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा जायद में भी 30-40 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती हैं।

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पूसा चरी तथा विदिशा 60-1 प्रजातियों में 55-65 किग्रा. जैसे:- जे.एस.-2 एस.एल-44 प्रजातियों के प्रति हेक्टेयर 35-40 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती हैं। प्रति एक लाख अस्सी हजार से दो लाख तक पौधों की संख्या होने पर सर्वाधिक चारे की उत्पादन मिलती हैं। रबी ज्वार बीस हजार पौधे की संख्या होनी चाहिए।

बीज शोधन:-

बुवाई के पूर्व बीज का शोधन फफूंदी नाशक रसायन जैसे:- एग्रोसॉन, सेरेसोन अथवा केपटोन आदि से करना चाहिए। इसके लिए 2-2.5 ग्राम रसायन प्रति किग्रा. बीज की दर से आवश्यक होता हैं।

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प्रजातियां:-

ज्वार की प्रमुख जातियों उसके लिए संस्तुत क्षेत्रों को विवरण तालिका में दिया गया हैं।

तालिका :- ज्वार की प्रमुख प्रजातियां एवं संस्तुति क्षेत्र

मौसम

प्रजातियां

संस्तुति क्षेत्र

खरीफ एच.सी. – 171 उत्तरी राज्यों तथा पंजाब हरियाणा, राजस्थान एवं पश्चिमी उत्तर-प्रदेश आदि
एच.सी. – 260
एच.सी. – 308
पी.सी. – 6 उत्तर-प्रदेश के दक्षिणी प्रांत, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश आदि।
पी.सी. – 23
एक से अधिक कटाई
सी.ओ. – 59-3

(मीठी सूडान)

पंजाब हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर-प्रदेश, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु
एक्स – 250
एम.एफ.एस.एच.-03
855-एम.एफ.पी. चरी-23
पंत चरी-3
जायद एस.एस.जी.-988-898 पंजाब हरियाणा, , मध्यप्रदेश, उत्तर-प्रदेश,
पी.सी.-23
जे.सी.-69

 

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बुवाई विधि:-

खरीफ में ज्वार के लिए पक्ति से पंक्ति की दुरी 45 सेमी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 10-12 सेमी. रखते हैं। इस विधि में बीज की गहराई 2.5 सेमी. से अधिक नहीं रखनी चाहिए। अधिक गहराई में बीज का अंकुरण नहीं होता।

सिंचाई:-

खरीफ ज्वार की फसल वर्षा आधारित होती हैं। अतः सूखे की स्थिति  में 15-20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। यदि सूखा अधिक हो तो, सिंचाई की अवधि को कम या अधिक कर लेने से उत्पादन सर्वाधिक मिलता हैं। जायद की फसल में 10 दिन के अंतराल पर पहली एवं दूसरी सिंचाइयाँ 15-20 दिन के अंतराल पर शेष सिंचाइयों को करनी चाहिए जिससे खेत में नमी सदैव बनी रहें।

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फसल चक्र:-

अच्छे गुणवत्ता वाले चारे के लिए द्विदलीय चारे की फसल के साथ खाने वाले चारे की फसल को लगाना चाहिए। इस पद्धति से हरे चारे की पौष्टिकता तो बढ़ती ही हैं साथ ही हरा चारा सुपाच्य हो जाता हैं। इसके लिए कुछ प्रमुख फसल चक्र इस प्रकार हैं।

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मिट्ठी सूडान- बरसीम, ज्वार+लोबिया (एच.एफ.सी.- 42.1) बरसीम, ज्वार – लूसर्न, ज्वार (दाना) – लूसर्न- मक्का (हरा चारा), ग्वार+ज्वार- जौ

किट एवं रोग नियंत्रण:-

वर्षाऋतु की फसलों में रोग तथा किट पतंगों का प्रकोप अधिक होता हैं। इसके लक्षण एवं निदान निम्न हैं।

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तना छेदक:-

ठस किट की सुन्डिया तनों में छेद करके अंदर के मुलायम भाग को खा जाती हैं जिससे पौधे खोखले हो जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए बुवाई से 20-25 दिन बाद लिंडेन (6%) अथवा कार्बोफ्यूरान (3%) दाने का 20 किग्रा./हैक. की दर से खेत में छिटकना आवश्यक हैं।

प्ररोह मक्खी:-

इस मक्खी का आकर घरेलू मक्खी से छोटा होता हैं। इसके शिशु (मेगेट) बीज के अंकुरण के समय से ही फसल को हानि पहुँचाना प्रारम्भ कर देते हैं। इन मक्खियों के रोकथाम के लिए एक लीटर मिथाइल-ओ-डिमेटान (25 इ.सी.) अथवा मोनोक्रोटोफास(36 डब्ल्यू.एस.सी.) 500 लीटर प्रति हेक्टेयर पानी में घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव करना चाहिए।

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इयर हेड मिज:-

इसके प्रौढ़ मिल लाल रंग की होती हैं, जो पुष्प तंत्र पर अंडे देती हैं। लाल मेगेट्स दानों के अंदर रहकर उसका रस चुस्ती हैं। जिससे दाने सुख जाते हैं। इसके निदान के लिए कार्बाइल (50%) चूर्ण की 1.25 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर खेत में छिड़काव के लिए पर्याप्त होता हैं।

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यह बहुत ही छोटा, आठ पैर वाला कीड़ा होता हैं। यह पतियों के निचली सतह पर जाले बुनकर उल्टी के अंदर रहकर पतियों के रस को चुस्ती रहती हैं। इससे ग्रसित पत्तियां लाल रंग की होकर सुख जाती हैं। इससे निदान के लिए डाईमेथोएट (30 इ.सी.) एक लीटर अथवा डायजिनान (२० इ.सी.) 1.5-2.0 लीटर 00-5004 लीटर पानी में घोल लेते हैं। यह एक हेक्टेयर खेत के लिए पर्याप्त होता हैं।

खरपतवार एवं उसका नियंत्रण:-

खरीफ की फसल में खरपतवार अधिक उगते हैं। फसल की प्रारम्भिक अवस्था में निकाई करने से खरपतवार नियंत्रण हो जाते हैं। एक किग्रा. एट्राजिन करने से भी खरपतवार का नियंत्रण हो जाता हैं। ज्वार की फसल में जॉनसन घास (वरु घास) को प्रकोप होने पर फसल-चक्र) में परिवर्तन कर इस घास को नियंत्रित किया जा सकता हैं।

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कटाई:-

बुवाई से 35-40 दिन बाद पहली कटाई करनी चाहिए। इसके बाद की कटाइयां 25-30 दिन के अंतराल पर करते रहना चाहिए। सूडान घास (एस.एन.जी.-59-3) की एक से अधिक कटाईयां की जाती हैं। इस घास से वर्ष भर चारे की उपलब्धता बनी रहती हैं इस प्रजाति की पहली कटाई बुवाई से 55-60 दिन बाद की जाती हैं और इसके बाद की कटाइयाँ 540-4 दिन बाद  करते रहना चाहिए। प्रत्येक कटाई 5 सेमी. की ऊंचाई पर की जानी चाहिए जिससे पौधे में पुनर्विकास अच्छा होता रहें। कम उर्वराशक्ति वाली भूमियों के जायद फसल की कटाई बुवाई लगभग 50-60 दिन बाद तथा शेष कटाईयां 25-30 दिन बाद करते रहना चाहिए।

उपज:-

ज्वार की फसल से 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरे चारे का उत्पादन प्राप्त होता है।

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बीज उत्पादन:-

उत्तरी भारत में ज्वार से पर्याप्त बीज का उत्पादन नहीं होता हैं। जे.एस. 20 प्रजाति से उत्तरी भारत में कम उपज मिलती हैं, जबकि दक्षिणी भारत में 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज की उपज होता हैं। यदि सूडान घास के पेड़ी वाली फसल को फरवरी माह में खाद एवं सिंचाई अच्छी तरह दिया जाए तो गर्मी में पर्याप्त बीज का उत्पादन हो जाता हैं। जून के प्रथम पखवाड़े की बुवाई की तुलना में अधिक बीज उत्पादन होता हैं। सूडान घास (एस.एस.जी.-59-3) की बुवाई कर देने से अधिक बीज का उत्पादन मिलता हैं।

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भंडारण:-

ज्वार के सूखे बीज जिसमे 12% से अधिक नमी न हो उसे किसी नमी रहित स्थान पर भंडारित करते हैं। घर अथवा बर्तन जहां पूर्व में भंडारण किया गया हो, उसे मेलाथियान के 1% घोल से दीवारों पर छिड़काव करके किट रहित कर लेना चाहिए। बीज वाले बर्तन में ई.डी.बी. एम्पुल की एक तोड़ कर प्रति क्विंटल बीज की दर से अनाज में डाल देना चाहिए। इससे अंदर की गैस बाहर नहीं निकलती। इससे अंदर के कीड़े मर जाते हैं तथा साथ ही साथ बाहर के कीड़े भी अंदर प्रवेश नहीं कर पाते या अंदर जाने पर मर जाते हैं।

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