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जौ की उन्नत खेती और उत्पादन तकनीक

Written by bheru lal gaderi

जौ(Barley) एक महत्वपूर्ण खाद्यान फसल है। भारत में जो को गरीब की  फसल के रूप में समझा जाता है क्योंकि इसकी खेती के लिए कम लागत की आवश्यकता होती है। यह एक ऐसी फसल है, जिसको उन क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक उगाकर अधिक पैदावार ली जा सकती है, जहां पर गेहूं की अधिक पैदावार नहीं ली जा सकती है।

जौ की उन्नत खेती

ये क्षेत्र है :-

  • बारानी क्षेत्र जहां पानी के साधन नहीं है और है तो बहुत ही कम मात्रा में।
  • रेतीली, खारी और कमजोर जमीन वाले क्षेत्र।
  • मोल्या रोग से ग्रस्त होने वाले क्षेत्र

जौ की उन्नत किस्में

किसी भी फसल में उत्पादन बढ़ने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन्नत किस्मों की होती है। अतः किसानों को अपने क्षेत्र में बोई जाने वाली उन्नत किस्मों की जानकारी अवश्य होनी चहिये।

जौ की उन्नत किस्में

बुवाई की स्थिति

सिंचित/असिंचित

किस्में बुवाई का उचित

 समय

बीज की मात्रा

(किलो में)

पंक्ति से पंक्ति की दुरी (से.मी.)

सामान्य बुवाई सिंचित आर.डी.2035,

आर.डी.2503,

आर.डी.2552,

आर.डी.-2592,

मध्य अक्टुंबर से नवम्बर तक

100

22.5

बारानी क्षेत्र के लिए असिंचित आर.डी.-2508

आर.डी.-2624

आर.डी.-2660

मध्य अक्टुंबर से नवम्बर प्रथम सप्ताह तक

125

30

ऊसर क्षेत्र के लिए डी.एल.- 88

आर.डी.-2552

एन.डी.बी.-1173

मध्य अक्टुंबर से नवम्बर तक

125

25

मोल्या (सूत्रकृमि) ग्रसित क्षेत्र के लिए आर.डी.-2052

आर.डी.-2035

आर.डी.-2592

मध्य अक्टुंबर से नवम्बर तक

125

25

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जौ की प्रजातियां में उत्तरी मैदानी क्षेत्रों के लिए ज्योति, आजाद, के -15, हरीतिमा, प्रीति, जागृति, लखन, मंजुला, नरेंद्र जौ-1,2 एवं 3, के-603, एन. डी. बी. -1173 तथा छिलका रहित जौ गीतांजलि मुख्य है।  ये सभी किस्में छः धरी युक्त की किस्में है।

खेत की तैयारी

खेत अच्छी तरह से तैयार करें। आखरी जुताई से पहले भूमिगत कीड़ो की रोकथाम के लिए क्यूनॉलोफॉस 1.5% चूर्ण 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलायें। खेत को समतल बनाना बहुत आवश्यक है। ऐसा करने से कम पानी से भी उचित सिंचाई की जा सकती है।

जैविक खाद एवं उर्वरक

उचित ढंग से पक्की हुई गोबर की खाद 8-10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम से कम तीन वर्ष में एक बार बुवाई से एक माह पूर्व अवश्य दे।

सामान्य रूप से उर्वरक खेत मिट्टी की जांच के बाद डालना चाहिए। फिर भी सिंचित क्षेत्र में 80 किलो नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए जबकि असिंचित क्षेत्र में यह मात्रा 40 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। फॉस्फोरस एवं पोटाश उर्वरकों की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा को बुवाई के समय देना चाहिए शेष आधी नत्रजन खड़ी फसल में पहली और दूसरी सिंचाई के बाद दे। नत्रजन उर्वरक की मात्रा 6 पंक्तियों में छिड़कर कर दे। जिंक की कमी वाली भूमि में अच्छे उत्पादन के लिए १० किग्रा जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर डालना चाहिए। असिंचित क्षत्रों में सभी उर्वरकों की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही दे।

बीज उपचार

बीज से फैलने वाली बीमारियां जैसे – आवृत कण्डवा एवं पत्तिधारी रोग से फसल को बचने के लिए बीज को 2 ग्राम मैंकोजेब या 3 थाइरम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करके ही बुवाई करना चाहिए। जहां अनावृत कण्डवा का प्रकोप हो वहां कार्बोकीस्न (विटावेक्स) + थाइरम (1+1 ग्राम) प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके ही बोयें।

यदि मिट्टी में दीमक का का प्रकोप हो तो 400 मि.ली. क्लोरोपायरीफास 20 ई.सी. को आवश्यकतानुसार पानी में घोलकर 100 किलो बीज पर समान रूप से छिड़ककर बीजों को उपचारित करें एवं छाया में सुखाकर ही बुवाई करे।

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सिंचाई

जौ की इन किस्मों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। सामान्यतः हल्की दोमट मिट्टी में 4-5 सिंचाई की और भारी मिटटी में 2-3 सिंचाई की आवश्यकता होती है। बुवाई के 25-30 दिन पश्चात् पहली सिंचाई दे। इसके पश्चात् बालिया आने पर एवं दाने की दूधिया अवस्था में पानी की कमी नहीं रहनी चाहिए।

निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार प्रबंधन

प्रथम सिंचाई के 10-12 दिन के अंदर कम से कम एक बार निराई-गुड़ाई कर खरपतवार अवश्य निकाल देवें।

चौड़ी पट्टी वली खरप्तवारों को नष्ट करने हेतु बुवाई के 30-35 दिन अन्य किस्मों में 40-50 दिन के बिच 2,4-डी एस्टर साल्ट 500 ग्राम/हेक्टेयर या 750 ग्राम 2-4 डी एमाइन साल्ट या 250 ग्राम मेटाक्सीरॉन खरपतवा नाशक रसायन का 500-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

गुल्ली डंडा व जंगली खरपतवार का प्रयोग जिन खेतों में गत वर्षों में अधिक रहां हो उनमे बुवाई के 30-35 दिन बाद आइसोप्रोट्जूरॉन या मेटाक्सीरॉन या मेंजोबेंजाथायोजुरॉन नामक खरपतवारनाशी 750 ग्राम (हल्की मिट्टी के लिए) तथा 1.250किलोग्राम सक्रिय तत्व (भारी मिट्टी के लिये) पानी में घोलकर एक समान छिड़काव करें। यह ध्यान रहें की छिड़काव समान रूप से हो, कहीं भी दोहरा छिड़काव न होने पाये।

जौ में पौध संरक्षण

फली बीटल एवं फिल्ड क्रिकेट्स कीट ग्रस्त खेतों में क्यूनालफॉस 25 ई.सी. या मेलाथियॉन 50 ई.सी., 800-1000 मी.ली. प्रति हेक्टेयर की दर से सुबह शाम छिड़काव करें।

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मकड़ी मोयला व तेला

मकड़ी का प्रकोप दिखाई देते ही फार्मोथियॉन 25 ई.सी. या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. या डाईमिथोएट 30 ई.सी. एक लीटर/हे. या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. एक लीटर/हैक. या मेलाथियॉन 50 ई.सी. एक डेढ़ ली./हैक. की दर से छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार 15 दिन बाद छिड़काव दोहराएं।

दीमक

जौ की खड़ी फसल में दीमक के प्रबंधन हेतु क्लोरोपायरिफॉस 20 ई.सी. चार लीटर प्रति हैक्टेयर सिंचाई के साथ दें। दीमक का प्रकोप फुटान के समय एवं बालियाँ निकलते समय अधिक होता हैं।

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रोग प्रबंधन

रोली रोग

रोली के लक्षण दिखाई देते ही 25 किलो गंधक का चूर्ण प्रति हेक्टेयर की दर से सुबह अथवा शाम को भुरकाव करें  15 दिन के अंतराल पर उसे 4 बार करें या रोग प्रारम्भ होते ही मेंकोजेब 1.250किलो 20.% या बेलिटोन 500 ग्राम 0.1% घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़के।

मोल्या रोग

इसमें रोगग्रस्त पौधे छोटे रहकर पीले पड़ जाते है एवं जड़ो में गांठे बन जाती है। इस रोग की रोकथाम हेतु।

  1. रोगग्रस्त खेतों में एक या दो साल तक गेहूं अथवा जौ की फसल नहीं ले।
  2. जो की मोल्या रोग  रोधी किस्में बोन के लिए प्रयोग लें।
  3. फसल चक्र में चना, प्याज, धनिया, मेथी, आलू या गाजर की फसल ले।
  4. रोग की रोकथाम हेतु मई-जून की कड़ी धुप में एक पखवाड़े के अंतराल से खेतो की दो बार गहरी जुताई करें।
  5. अनावृत रोग एवं पत्तिधारी रोग
  6. रोग दिखाई देते हो रोगग्रस्त पौधे को उखाड़कर नष्ट करें ताकि रोग का फैलाव न हों।

कटाई-गहाई

जौ की फसल की कटाई उचित समय पर करें। विभिन्न क्षेत्रों में कटाई के लिए मार्च के अन्त तक एवं मध्य अप्रेल तक तैयार हो जाती है। जौ की बालिया अधिक सूखने पर दाने गिरने लगते है तथा कई बार बालिया ही टूटने लगती है। जौ के दाने आस-पास की नमी भी जल्दी सोंख लेते है, इसलिए अधिक पकने से पहले ही काट लेना चाहिए।

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भण्डारण

गहाई के बाद भण्डारण हेतु सूखे स्थान पर रखें। भण्डारण के समय दानों में नमि की मात्रा 10% से अधिक न रखें।

उचित मात्रा में नमी के साथ भंडारण करने से दाने की गुणवत्ता बानी रहती है तथा कीटों के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है।

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