जैव विविधता और आर्थिक मूल्य एक परिपेक्ष्य, महत्व

By | 2017-05-02

जीवन की विविधता पृथ्वी पर मानव के अस्तित्व और स्थाईत्व को मजबूती प्रदान करती हैं। समृद्ध जैव विविधता अच्छा स्वस्थ्य, खाद्द्य सुरक्षा, आर्थिक विकास, आजीविका सुरक्षा और जलवायु की परिस्थितियों को सामान्य बनाए रखने का आधार हैं। भारत एक प्राकृतिक सम्पन्न देश हैं और प्राचीनकाल से भारत प्राकृतिक संसाधनों का एक प्रमुख अंग हैं। पृथ्वी पर मानव, वनस्पतियों तथा सभी जीवों के समुच्चय वैविध्य को जैव विविधता के नाम से जाना जाता हैं। पृथ्वी पर जैविक स्त्रोत मानव के आर्थिक एवं सामजिक विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

जैव विविधता

जैव विविधता का महत्व

जैव विविधता पृथ्वी की प्राकृतिक जीव सभ्यता हैं। यह मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति का मूल स्त्रोत होने के साथ- साथ इस ग्रह की उत्तरजीविता के लिए भी अनिवार्य हैं। जैव विविधता अपने आप में एक जीवन बिमा के समान हैं। विश्व में जैव विविधता का वार्षिक योगदान लगभग 330 अरब डॉलर हैं।

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जैव विविधता

ह्रास एवं संरक्षण

भारत जैव विविधता और इससे सम्बंधित न केवल पारम्परिक ज्ञान से संपन्न हैं बल्कि हमारा देश जैव विविधता के संरक्षण के प्रति जागरूकता में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा रहा हैं फिर भी जैव विविधता के संरक्षण अभी लापरवाही को देखते हुए इस परिपेक्ष्य में समय दर समय सम्मेलन आयोजित किये जाते हैं और इन सम्मेलनों का मुख्य लक्ष्य जैव विविधता का संरक्षण रखा जाता हैं। विश्व में जैव विविधता के धरोहर में अग्रणी रहते हुए भी भारत में प्रतिदिन जैव विविधता मूल्य ह्रास होता जा रहा हैं एवं संकट ग्रस्त प्रजातियों की सरक्षण में वृद्धि होती जा रही हैं।

जैव विविधता किसी भी क्षेत्र के आर्थिक विकास को स्थायित्व प्रदान करती हैं अतः अर्थशास्त्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि विज्ञानं आधारित गहन कृषि आधारित विकासशील देश जिसमे भारत जैसे कम भूमि वाले देश शामिल हैं। पर्यावरण स्थिरता का ह्रास किये बिना उत्पादकता वृद्धि ही उत्पादन बढ़ाने की एक मात्र उम्मीद हैं।

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संसाधनों का दोहन

इसका  दोहन मुख्यतः संसाधनों का ह्रास घटते हुए जल स्तर बढ़ता हुआ मनुष्य (भूमि अनुपात का हास्), प्रतिव्यक्ति भूमि उपलब्धता में कमी (0.14 हेक्टेयर 2000 ए. डी.) 0.10 हेक्टेयर (2025 ए. डी.) शहरीकरण, मनुष्यों की आवश्यकता बढ़ती हुई कार्बन उपगटन की मांग इत्यादि। इसमें कोई शक नहीं हैं की अगर चीन ९४ मिलियन हेक्टेयर बुवाई क्षेत्र में 400 मेमेट्रिक खाद्द्यान उत्पादन कर सकता हैं तो भारत 66 मिलियन हेक्टेयर एकल सिंचित क्षेत्र सहित 142.5 मिलियन हेक्टेयर कुल फसलीय क्षेत्र से सदी के अगले तिमाही में वर्तमान स्तर से दो गुना उत्पादन कर सकता हैं।

घटती हुई भूमि उपलब्धता प्रति मनुष्य एवं बढ़ती हुई मानव जनसंख्या आज के वक्त अर्थशास्त्रियों के लिए अतिआवश्यक बिंदु हैं जो की उनको बढ़ती हुई जनसंख्या के भोजन उपलबधता एवं उनके जीवन के समुच्चित विकास का विस्तृत उल्लेख करता हैं। साथ ही देश की विकास दर, विभिन्न उद्योगों के लिए पर्यावरणीय एवं उत्पादन हीनता, कृषि एवं सम्बंधित क्षेत्र की उत्पादन घटोत्तरी बहुत ज्यादा प्रभावित होती हैं।

जैव विविधता हास के तत्व

जैव विविधता के खतरे में मुख्यतः विकास का दबाव, अतिक्रमण, शोषण, मानव प्रेरित आपदाए, मानव संसाधन का प्रबंधन एवं राजनीती और निति के मुद्दे शामिल हैं। इनमे विकास का दबाव मुख्यतः निर्माण, वन आधारित उद्योग, सिंचाई परियोजनाए, खनन, तेल ड्रिलिंग, संसाधन निष्कर्षण तथा सड़क और परिवहन आदि हैं। जैव विविधता का आर्थिक मूल्य बहुत हैं पर आज हो रहे जलवायु परिवर्तन, विकास के कारण ख़त्म हो रही हैं और आज वही एक वैश्विक मुद्दा बन गया हैं।

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आर्थिक मूल्य और प्राकृतिक पूंजी

जिव विज्ञानियों ने अग्रणी वैश्विक अर्थशास्त्रियों के साथ निर्धारित करने के लिए सहयोग शरू किया हैं की प्रकृति की सम्पदा और सेवाओं को कैसे मापा जाए और इन वैश्विक बाजार लेन- देन में इन मूल्यों को स्पष्ट किया जाए। इस लेख प्रणाली को प्राकतिक पूंजी कहा जाता हैं।

निहित प्राकृतिक अर्थव्यवस्था मानवता को बनाए रखने में आवश्यक भूमिका निभाता हैं। जिसमे वैश्विक परिवेशीय, रसायन, परागकण फसल, कीट नियंत्रण, मिट्टी के पोषक तत्वों को आवर्तन, हमारी जल आपूर्ति का शुद्धिकरण, दवाओं की आपूर्ति, स्वास्थ्य लाभ और जीवन सुधार की अपरिभाषित गुणवत्ता शामिल हैं। बाजार तथ प्राकृतिक पूंजी और सामाजिक आय असमानता और जैव विविधता हानि के बिच एक रिश्ता सहसम्बन्ध मौजूद हैं इसका मतलब यह हैं की जहाँ सम्पत्ति की अधिक असमानता हैं उन स्थानों में जैव विविधता क्षति की दरे भी अधिक हैं। हालाँकि प्राकृतिक पूंजी की प्रत्यक्ष बाजार तुलना मानव दृष्टि से अपर्याप्त होने की सम्भावना हैं, परिस्थितिक तंत्र सेवाओं का का एक माप योगदान की मात्रा को वार्षिक तोर पर अरबों डॉलरों में होने का संकेत देता हैं

उदाहरणार्थ उत्तरी अमेरिका के जंगलों के एक खंड का वार्षिक मूल्य 250 बिलियन डॉलर निर्धारित किया गया हैं, एक और उदाहरण में मधुमक्खी परागण से प्रति वर्ष 10-18 मिलियन डॉलरों के बिच मूल्य होने का अनुमान हैं।

मानव समाज की मांग पृथ्वी की जैव पुनर्योजी क्षमता से अधिक होने के कारण ग्रहों की यह समृद्धि अविश्वसनीय दर पर खेती की जा रही हैं। जबकि जैव विविधता और परिस्थितिकी प्रणालियाँ लचीली हैं, उन्हें खोने का खतरा हैं की मानव प्रौद्योगिकीय नवाचार के माध्यम से कई परिस्थितिकी तंत्र के कार्यों की पुनर्रचना नहीं कर सकते हैं।

सारांश

अतः जैव विविधता के महत्व को देखते हुए उसका आर्थिक तथा प्राकृतिक मूल्य एक अत्यंत ज्वलित समस्या हैं और उसके सही पैमाने को समझना वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं जो आज की बढ़ती हुई जनसंख्या को भोजन उपलब्धता तथा प्राकृतिक संसाधनों के सही संरक्षण को चुनौती देता हैं।

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