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जैव उर्वरक एवं जैव नियंत्रण द्धारा आधुनिक खेती

जैव उर्वरक
Written by bheru lal gaderi

सम्पूर्ण विश्व में स्वस्थ जीवन एवं पर्यावरण की आवश्यकता महसूस की जा रही हैं। हमारे देश में हरित क्रांति को फसल बनाने हेतु रासायनिक उर्वरकों एवं कृषि रसायनों का उपयोग बढ़ा, फलतः अनाज के उत्पादन में तो हम आत्मर्निभर हो गए, परन्तु अनाज गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य, पशु-पक्षियों, मछलिया लाभदायक कीटों, मृदा जल तथा वातावरण पर भी दूषित प्रभाव पड़ा। इस कुप्रभाव से बचाने के लिए आज जैविक खेती की आवश्यकता महसूस की गई, क्योंकि जैविक खेती से उत्पादन को बिना प्रभावित किए हुए खद्यानों की गुणवत्ता में सुधार होता हैं और इस प्रकार के उत्पादों का अच्छा मूल्य प्राप्त कर कृषक अधिक से अधिक लाभ कमा सकते हैं। जैविक खेती में जैव उर्वरक का महत्वपूर्ण स्थान है।

जैव उर्वरक

जैव उर्वरक

जैव उर्वरक जीवाणु खाद हैं जिसके उपयोग से 30-40 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर भूमि को प्राप्त होती हैं और उपज में 10-20% बढ़ोतरी होती हैं और साई फसल अमृत के उपयोग में 20-25% तक उपज बढ़ जाती हैं। रसायनिक उर्वरकों के पूरक तो हैं ही साथ ही उनकी क्षमता भी बढ़ाते हैं। फास्फोबेक्टीरिया के उपयोग से फास्फोरस की उपलब्धता में 20-30% की बढ़ोतरी हो जाती हैं।

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मुख्य जैव उर्वरक निम्नलिखित है।

क्र.

जैव उर्वरक का नाम

उपयुक्त फसलें संस्तुति प्रयोग विधि

आवश्यक मात्रा

1. फसल अमृत सभी फसलें फलदार एवं जंगल वृक्ष मृदा उपचार 5-10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर
2. ए.यु. रैजोगोल्ड प्लस (राइजोबियम) सभी दलहनी फसलें बीजोपचार 200 ग्राम  प्रति 10 कि.ग्रा.बीज
3. ए.यु. ऐजोटो गोल्ड प्लस (एजेक्टोबेक्टर) दलहनी फसलों को छोड़कर सभी फसलों के लिए बीजोपचार ,जड़ उपचार एवं मृदा उपचार 200 ग्राम  प्रति 10 कि.ग्रा.बीज 5कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर
4. ए.यु. ऐजोगोल्ड प्लस दलहनी फसलों को छोड़कर सभी फसलों के लिए बीजोपचार ,जड़ उपचार एवं मृदा उपचार 200 ग्राम  प्रति 10 कि.ग्रा.बीज 5कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर
5. ए.यु. फोस्फोगोल्ड प्लस (फास्फो बैक्टीरिया) दलहनी फसलों सहित सभी फसलों के लिए बीजोपचार ,जड़ उपचार एवं मृदा उपचार
6. ए.यु. के. गोल्ड प्लस (एसीटोबैक्टर) गन्ना एवं चुकुन्दर मृदा उपचार 5कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर
7. एजौला धान फसल के साथ 20-25

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जैविक खाद

सम्पूर्ण फसल आहार

यदि जैविक खाद लाभदायक जीवाणुओं की सहायता से तैयार की गई हैं। जिसमे वर्मीकम्पोस्ट तथा सूक्ष्म जीवो का मिश्रण रहता हैं यह खाद पौधों को सभी 16 प्रकार के जरूरी तत्वों का उपलब्ध कराती हैं। इसके उपयोग से 20-25% उत्पादन में वृद्धि होती हैं। पौधों की जड़े मजबूत तथा शाखाए अत्यधिक विकसित होती हैं। फूल तथा पत्तियों का गिरना रुक जाता हैं। अन्य खादों की अपेक्षा यह पांच गुना अधिक लाभकारी होती हैं।

उपयोग विधि

फलदार वृक्षों जैसे संतरा, अंगूर, आम, निम्बू इत्यादि में प्रयोग के लिए 5 किग्रा. साई फसल अमृत को 100किग्रा. पकी गोबर की खाद में मिलाने के उपरांत 4-6 दिन तक छायादार स्थान पर रख दे। ततपश्चात प्रति वृक्ष एक किग्रा. मिक्चर का उपयोग करें। नर्सरी के पौधों के लिए 100ग्राम मिक्चर का उपयोग प्रति गमले की दर से वर्ष में दो बार उपयोग करें।

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खेत में उपयोग

दलहन, तिलहन, अनाज, सब्जियों, कपास, गन्ना, आलू सभी प्रकार की फसलों में 10 किग्रा/हैक. की दर से 200-250 किग्रा. सड़ी गोबर की खाद में मिलाने के बाद 4-6 दिन तक छायादार स्थान पर रखने के पश्चात खेत की अंतिम जुताई या बुवाई के समय बिखरा दें।

जैव उर्वरकों का उपचार कैसे करें?

बीज उपचार

50 ग्राम गुड़ को आधा लीटर पानी में गर्म कर घोल बनाए। घोल के ठंडा हो जाने के पश्चात बाल्टी में पलट दे फिर 200 ग्राम जैव उर्वरक को मिलाए  बाल्टी में  10 किग्रा. बीज डालकर हल्के हाथों से अच्छी प्रकार मिलाए ताकि सभी बीजों पर जैव उर्वरक समान रूप से लग जाए। उपचारित बीज को छाया में सुखाकर तुरंत बुवाई करें।

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जड़ उपचार

यह विधि रोपाई वाली फसलों के लिए उपयुक्त हैं। 4किग्रा. जैव उर्वरक का 20-25 लीटर पानी में घोल बनाए। घोल में 500 ग्राम गुड़ का कोई अन्य चिपचिपा पदार्थ उपयोग करें। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त पौधों की जड़ को 20-30 मिनट तक घोल में डुबोए। उपचारित पौध की शीघ्र रोपाई करें। ‘

उपचार मृदा

मृदा उपचार हेतु 5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से जैव उर्वरक का प्रयोग करें। जैव उर्वरक को 80-100 किग्रा. गोबर की पक्की खाद अथवा 60-60 किग्रा. कम्पोस्ट प्रति वर्ग मित्र कम्पोस्ट में अच्छी तरह मिलाए। इस प्रकार तैयार मिश्रण को बुवाई के समय भी 24 घंटा पूर्ण तक हेक्टेयर क्षेत्रफल में समान रूप से छिड़के अथवा जड़ में डालें।

विशेष

नाइट्रोजन जैव उर्वरकों के साथ फास्फोबेक्टीरिया का प्रयोग आवश्यक हैं अत्यंत लाभकरी भी हैं। अलग-अलग दलहनी फसलों के अनुरूप ही राइजोबियम कल्चर का उपयोग अधिक होगा।

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जैव उर्वरकों के उपयोग से लाभ

कम खर्च में उत्पादन बढ़ाने का कार्य करने वाले जैव उर्वरक सस्ते होते हैं । जैव उर्वरक वायुमंडल की नाइट्रोजन फसल को उपलब्ध कराते हैं। मिट्टी की अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील बनाते हैं तथा अगली फसल को भी पहुंचाते हैं। जैव उर्वरक वृद्धिकारक हार्मोन्स उत्पन्न करते हैं जिनसे पौधों की वृद्धि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता हैं। मृदाजन्य रोगों पर नियंत्रण, सूक्ष्म जीवों की संख्या में आशातीत वृद्धि तथा पर्यावरण सुरक्षा जैव उर्वरक के अन्य प्रमुख लाभ हैं। जैव उर्वरक रासायनिक उर्वरकों का स्थान नहीं ले सकते। है इनकी आवश्यक मात्रा को कम कर सकते हैं।

जैव नियंत्रक

इन नियंत्रक के अंतर्गत कीटनाशक एवं जैविक एजेंट आते हैं।

जैविक किट/रोग नाशक

ऐसे उत्पाद हैं जो जिव-जन्तुओ, सूक्ष्म जीवो तथा पेड़-पौधों से प्राप्त किए जाते हैं। यह उत्पाद पर्यावरण एवं सव्स्थ्य को बिना हानि पहुंचाए फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले किट एवं व्याधियों का नियंत्रण करते हैं तथा कुछ ही दिनों में भूमि एवं जल से मिलकर पारिस्थितिक तंत्र का अंग बन जाते हैं।

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जैविक एजेंट

ऐसे कीड़े-मकोड़े एवं जिव जंतु जो दूसरे जंतु को खाकर अथवा फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों पर अंडे देकर अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं।

एन.पी.वी.

यह कीड़ों में एक घातक बीमारी फैलाने वाला विषाणु हैं जो अति संक्रमशील होता हैं। इसके छिड़काव से कीड़े मर जाते हैं। परन्तु लाभदायक कीटों पर किसी भी प्रकार का कुप्रभाव नहीं डालता हैं।

उपयोग

250 गिडार (इल्ली) से बने एन.पी.वी. प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें। इसे 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

त्रिवेणी (बिवेरिया)

यह फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले विभिन्न कीटो के नियंत्रण हेतु उपयोग की जाने वाली एक प्रकार की मित्र फफूंदी हैं।

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कार्यशीलता

आलू का कटुआ, धान का भूरा फुदका, चना, कपास, टमाटर और अरहर का फली छेदक, सफेद मक्खी, महू थ्रिफ्स, दीमक, छाल वाले कीटों के रोकथाम हेतु प्रभावी हैं।

भूमि में उपयोग

50 किलोग्राम अच्छी पकी गोबर में 3 किलोग्राम त्रिवेणी को छायादार स्थान में अच्छी तरह मिलाकर 10-15 दिन तक रखे और मिश्रण को एक हेक्टेयर खेत में खेत की आखरी जुताई अथवा बुवाई के समय बिखेर दे। जिससे मिट्टी में पड़े हुए लार्वे, अंडे संक्रमित होकर मर जाते हैं।

छिड़काव हेतु उपयोग विधि

3 किलोग्राम त्रिवेणी पाउडर को 750-1000 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। छिड़काव के 24-48 घंटे के अंदर संक्रमित होकर मर जाते हैं। दस दिन के अंतराल पर कुल तीन छिड़काव करें।

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त्रिवेणी से होने वाले फायदे

  • पर्यावरण अनुकूल एवं अवशेष रहित।
  • पशु, पक्षी, जानवर एवं मनुष्यों के लिए सुक्षित।
  • आसानी से उपयोग में लाया जा सकने।
  • फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के लाभ प्रौढ़ावस्था तक प्रभावी।
  • लेपिडोप्टेरा गण के कीटों के प्रति विशेष रूप से प्रभावी।

ट्राइकोडर्मा और अन्य जैविक पदार्थों का मिश्रण

मिश्रण

ट्राइकोडर्मा मिट्ठी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले मित्र फफूंद है।

संस्तुति

दलहनी फसलों (चना, मटर, मसूर, मुंग, अरहर) तिलहनी फसलों (मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल) कपास, धान, मक्का, गेहूँ, गणना, पोस्ता।

सब्जियां

आलू, मिर्च, बैंगन, प्याज, टमाटर, फूल गोभी आदि।

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फल

आम, अमरुद, संतरा , नीम्बू, पपीता, आदि के फफूंद जनित रोगों के नियंत्रण हेतु।

मृदा जनित रोग जैसे – उकठा, सूखा, गलन, जड़ गलन, तना अंगमारी, आर्द्रपतन आदि रोगो के नियंत्रण में विशेष प्रभावी।

उपयोग विधि

बीज उपचार

बीज उपचार के लिए 8-10 ग्राम एयूडर्मा को 50 ग्राम गुड़ की सकरी में ठंडा होने के उपरांत प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिलाएं।  बीज को छाया में सूखने के बाद बुआई करें।

भूमि उपचार

4-5 किग्रा पाउडर को 60 किग्रा. पाकी गोबर की खाद में मिलाकर एक सप्ताह तक छाया वाले स्थान में रखें। ततपश्चात 1 हेक्टेयर खेत में बिखेर कर जुताई करें। बागवानी में प्रयोग हेतु 200 ग्राम एयू डर्मा पाउडर प्रति पेड़ की दर से साल में दो बार मानसून की शुरुआत एवं समाप्ति पर उपयोग करें।

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पौधशाला उपचार

नर्सरी हेतु 500 ग्राम एयूडर्मा को 100 लीटर पानी में घोल बनाकर बीज की बुवाई के बाद 10 वर्गमीटर क्षेत्रफल की नर्सरी में डाले ताकि घोल 10 से.मी. की गहराई तक पहुंच जाए।

कंद उपचार

कंद उपचार के लिए एयूडर्मा के घोल (500 ग्राम एयूडर्मा पाउडर का 100 लीटर पानी में घोल) में कंद डूबा कर बुवाई पूर्व छायादार स्थान पर सूखा लें।  पौधों की जड़ उपचार के लिए पौधों को रोपने के जड़ को 50 ग्राम एयूडर्मा पाउडर को 10 लीटर पानी में घोल में उपचारित कर रोपाई करें।

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एजोलीना 300 नीम तेल पर आधारित

संस्तुति

यह नीम तेल आधारित जैवकीट नाशक है। जिसकी संस्तुति फसलों को हानि पहुंचाने वाले चेपा तथा सुंडी कीटों के लिए की गई है। एक लीटर ऐजोलीन को 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव शाम के समय करें। इस छिड़काव से फसल परीस्थिति की तंत्र में पाए जाने वाले मित्र कीट पूर्ण रूपेण से सुरक्षित रहते है।

सावधानियां

यदि कीनाशक को निगल लिया गया हो तो जहर के लक्षण दिखने पर डॉक्टर को तुरंत बुलाए।

इसे त्वचा के सम्पर्क में नहीं आने देना चाहिए। उपयोग के बाद हाथों को साबुन से अच्छी प्रकार से धो ले।

खाद्य सामग्री तथा बच्चों से दूर ठन्डे तथा हवादार जगह पर ताला लगाकर रखें।

इसका छिड़काव शाम के समय करें।

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बेसिलस यूरिजियोसिंस (बीटी)

यह एक प्रकार का जीवाणु है जो कि लेपिडोप्टराल वर्ग की सुंडियों के मिडगर में विष उत्पन कराता है जिससे सुंडियो की मृत्यु हो जाती है।  यह बहुभक्षी कीटों पर विशेष रूप से फली भेदक, तम्बाकू की सुंडी, अर्धलुपक, तना छेदक आदि का प्रभावी नियंत्रण करता है, इस प्रकार यह कपास, अरहर, चना, अलसी, तिल, सरसों, धान आदि फसलों की रक्षा पर्यावरण को बिना क्षति पहुंचाए करता है। साथ ही साथ फसलों के मित्र कीटों को सरंक्षण भी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त यह कपास के गुलाबी कीट, पत्तीलपेटक कीट को भी नियंत्रित करता है।

प्रयोग विधि

500-700 ग्राम बी.टी. को 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर 10 दिन के अंतराल पर तीन बार छिड़काव करना चाहिए।

जीव नियंत्रकों प्रयोग से लाभ

  • पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचता है।
  • मानव स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
  • आर्थिक रूप से लाभकारी है।
  • पारिस्थितिकीय तंत्र का अनुरक्षण करता है।
  • कृषि लागत मूल्य को कम करता है।
  • उत्पाद गुणवत्तयुक्त होते है एवं उनका प्राकृतिक स्वाद बना रहता है।
  • पुनरुथान, प्रतिरोध एवं परावर्धि कीट उत्पाद को कम करता है।

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